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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 7


मेरी सफलता के पीछे मेरे पति और बेटे का हाथ है ।मै गोष्ठीमें जाती थी तो मुझे खाना बना हुआ मिलता था ।मै शाम को ही लेखन करती हूँ ।लिखते लिखते रात हो जाय तो बेटा बार बार मेरे पास आता पर कुछ बोलता नहीं , मैं कहती अभी रोटी बनाती हूँ ।एक बार उठने के बाद लिंक टूट जाता है ।उस समय मेरे पति रोटी बनाते और थाली लेकर मेरे सामने टेबल पर रख देते ।खाते खाते लिखो कहते तो मेरे आंसू निकल जाते ।मुझे लेखन के क्षेत्र में बहुत सहयोग दिया ।आज बेटा भी मेरे लिखते तक खाने के लिये रुका रहता है ।भले बिस्कुट खा लेगा ।

बचपन में पिता का मार्ग दर्शन रहा ।माँ मेंरी पुरानी चौथी तक ही पढ़ी थी पर उसे पढ़ने मे रुची थी ।काका ने कल्याण बंधाया था ।बाद में धर्मयुग हिन्दूस्तान भी मंगाते थे ।मेरी माँ घर का काम निपटाने के बाद पेपर पढ़ती थीं पत्रिकायें पढ़ती थी ।उसमें दी गई स्वेटर की डिजाइन , पाक विधियां सभी कुछ आजमाती थी ।काका हमें भी प्रोत्साहित करते थे ।स्वयं खाना बनाने लग जाते थे ,बीसो प्रकार की चटनी बनाते थे ।माँ को कभी चटनी बनाने नहीं देते थे ।मुझे भी साथ मे बैठा कर सिखाते थे ।

पढ़ाई के समय भी माँ बराबर पूछते रहती क्या पढ़ रहे हो ?हर विषय को समझना चाहती थी ।पढ़ते समय कभी भी कोई काम नहीं बताती थी ।घर में भी बराबर सहयोग मिलता था ।मै वाद विवाद की या भाषण की तैयारी करती थी तो घर पर घड़ी देखकर जोर जोर से बोलती थी ।माँ अपनी समझ से उसमें कुछ न कुछ जोड़ देती थी ।

काका ने मेरे विचारों को समृद्ध किया तो माँ ने उसे सहेजने के लिये समय दिया ।माँ ने अपने ज्ञान को बढ़ाने के साथ साथ उस ज्ञान का उपयोग हमारे संस्कारों को बढ़ाने में किया ।शादीके बाद पुराने विचारों की सास के सामने मैने अपनी शिक्षा को एक किनारे रख दिया पर पति और ससुर ने मुझे आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया ।सरकारी नौकरी लगी व्याख्याता बनने के बाद बिमार होने के कारण इस्तीफा देना पड़ा और लेखन शुरू हो गया।

आकाशवाणी ,गोष्ठी सभी जगह कदम बढ़ने लगे ।जब हम लोग स्वयं के मकान गीतांजली नगर में आ गये तब भी लेखन सतत चलता रहा ।बेटे के होने के बाद समय कम मिलता था तो शाम को मेरे पति बच्चे को सम्हालने का काम करते थे ।मुझे अपने पढ़ने लिखने में कभी रुकावट महशूस ही नहीं हुई ।

आज दस पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है ।सारी पुस्तकें काका माँ और मेरे पति के जाने के बाद छपी ।पर सारा श्रेय इन तीनो को ही जाता है ।ज्ञान ,संस्कार,प्रेरणा,और सहयोग के बिनाआज मैं यहाँ तक पहुंच नहीं पाती ।आज मेरे साथ मेरा बेटा खड़ा है सहयोग करने के लिये ।

इलेक्ट्रॉनिक के जमाने मे शायद मैं एक कदम भी चल नहीं पाती पर अपूर्व बेटे ने मुझे इस दुनिया तक पहुँचा दिया ।आज मैं घर तक नहीं पूरी दुनियां से जुड़ गई ।एक सफल नारी के पीछे पुरुष का हाथ होता है ।मुझे तो पूरा सहयोग मिला पर योग्यता भी जरुरी है ।बिना योग्यता के कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता है।

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