बुधवार, 20 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 1


आज ईद है ।मै अपनी यादों मे चली गई।मेरा ससुराल रायपुर के राजातालाब में था ।वहाँ चारो धर्म के लोग रहते है ।मुसलमान ज्यादा है ।हमारा घर नूरानी चौक में था ।पास में मस्जिद था ।हमारे घर के सामने मुस्लिम परिवार था ।रोज आना जाना चलते रहता था ।ईद के माह भर पहले से खाला सेव्ईयां बनाती थी।एक गीला कपड़ा पहनकर रोज दोपहर को जब घर में कोई नहीं रहता था तब बनाती थी।ईद पर हमारे घर के बच्चे भी नया कपड़ा पहनते थे।ईद के दिन दोनों घर में चहल पहल शुरु हो जाती ।हम सभी के लिये पुलाव आता था ।हम सब पारी पारी से सेव्ईयां खाने जाते थे ।हमारे घर पर सिर्फ सास के लिये खाना बनता था ।सुबह मस्जिद से आनेसके बाद बच्चे पैर छुने आते थे ।सास सबको आशीर्वाद के साथ ईदी देती थी । दोपहर को एक बांस की नई टोकनी में एक टोकनी सूखी सेव्ई लेकर खाला आती और सास के हाथ में देकर पैर छुती ।सास बहुत सा आशीर्वाद देती एक रहता तेरी चूड़ी अमर रहे ।सब लोग सास को दीदी कहते थे ।छत्तीसगढ़ में मां को दीदी भी कहते है।जाते जाते खाला कहना नहीं भूलती दीदी बनाकर खा लेना ।शाम को दीदी के लिये हम लोग सेव्ई बनाते थे ।शाम को दोनों परिवार के लोग घर के बाहर दरवाजे के पास बैठकर दिनभर ईद कैसी रही यही बातें करते थे ।मेरी सास बहुत पूजा पाठ करती थी ।सुबह दो घंटे की पूजा ,दोपहर को रामायण में व्यस्त रहती थी ।वहछूआ मानती थी इस कारण उनके घर का कुछ नहीं खाती थी ।दीदी के कारण खाला गीले कपड़े पहन कर सेव्ईयां बनाती थी ।अपने घर के बर्तन मे नदेकर नई बांस की टोकनी मे सूखी सेव्ईयां लाती थी और उस सेव्ई को मेरी सास सहेज कर रखती और महिनों खाती थी ।
आज रथ यात्रा भी है मेरी सास बुढ़ापारा रथ देखने जाती थी तो उनके घर के छोटे बच्चे भी जाते थे और आने के बाद सब लोग दीदी से प्रशाद लेते थे और पैर छुते थे ।
अब कालोनी संस्कृति मे इसकी कमी खलती है ।आज मै उस प्यार को खोजती हूँ ।

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