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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 42


माँ को फिल्म देखने का शौक था ।शौक ही नहीं बहुत शौक था कह सकते हैं।रायपुर में करीब सात टॉकिज थे राज ,जयराम,बाबूलाल ,अमरदीप, प्रभात ,श्याम ,मनोहर ।

मनोरंजन के नाम पर गांव में नाचा और रामलीला होता था पर शहर में यह सब नहीं होता था ।काका ने कभी फिल्म नहीं देखी थी ।माँ पेपर में पढ़ कर फिल्म की जानकारी लेती थी ।गांव से लोग आते थे तो उनको घुमाने के नाम पर फिल्म ,दूधाधारी मंदिर और गोल बाजार ही था ।

हम मब तैयार होकर फिल्म देखने जाते थे ।कभी कभी काका मुन्ना को सायकिल में बिठा कर छोड़ देते थे ।पैदल ही आना जाना करते थे ।कुछ बड़े हुये तो माँ के साथ अकेले जाने लगे ।कभी कभी हमारे सबसे छोटे चाचा के साथ जाते थे ।दानी राम जो प्राचार्य थे ।

जब मै कालेज में थी तब तो ये ऐसा हुआ कि हर हफ्ते चले जाते थे ।काका ने कभी मना नहीं किया ।फिल्मों के शौक के अलावा माँ फिल्मी दुनिया पत्रिकायें भी पढ़ती थी ।यह हमारे घर नहीं आता था पर दरवाजे पर बैठी माँ के पढ़ने के शौक के कारण बच्चे लाकर दे देते थे ।बाद में भाई मायापुरी लाने लगा ,उसे भी माँ पूरा पढ़ती थी ।

माँ को हर कलाकार के जीवनी की जानकारी थी ।।समाचार भी जानती थी किसकी शादी किसके साथ होने वाली है ।किसके बीच प्यार चल रहा है ।बाद में तो कलाकारों की हस्ताक्षर वाली फोटो भी एकत्र कर रही थी ।मोहल्ले के लड़के मंगाते थे और माँ को दे देते थे ।

माँ का हीरो धर्मेन्द्र था बाद में राजेश खन्ना हो गया । शत्रुघ्न सिंहा की फिल्में भी देखती थी ।राजेश खन्ना के प्रति प्यार ने कभी उसे मेरा हीरो कहने नहीं दिया ।काका बराबर कहते थे राजेश खन्ना की फिल्म लगी है देखने नहीं जाना है ? काका पैसा दे देते थे जाओ देख कर आओ ।काका माँ के मनोरंजन का पूरा ध्यान रखते थे ।

अमिताभ बच्चन आये तो माँ ने उसे बेटा बना लिया ।छत्तीसगढ़ की संस्कृति और संस्कार ने उसे अपना हीरो बनाने नहीं दिया ।उस समय तक घर मे छोटा सा टी वी भी आ गया ।माँ के साथ और बहुत से लोग बैठ कर फिल्म देखते थे ।उस समय का माहौल ही ऐसा था कि जिसके घर टी वी रहता था वहाँ पर आस पास के लोग भी आकर देखते थे ।कभी कभी चाय नास्ता भी कर लेते थे ।

काका देखते नहीं थे पर चलते फिरते पूछते थे "ये कौन है ?ये रो क्यों रहा है ? ये लोग नाचते है तो तुम लोग भी साथ मे थोड़ा नाच लिया करो। बैठे बैठे हाथ पैर दुखता होगा ।"अब पारी माँ कू बम फोड़ने की रहती थी क्योंकि उनकी तन्मयता टूट जाती जाती थी ।माँ कहती कि बैठ कर देखो पूछो मत ।फिल्म खतम होने पर काका माँ को तंग करने के लिये बार बार बीच बीच के सीन के बारे में पूछते रहते थे ।माँ गुस्सा हो जाती थी तब काका कहते " बाई थोड़ा हस भी लिया करो " माँ को प्यार करने का काका का अपना तरिका था जिसे समझ नहीं पाती थी ।

राजे खन्ना तो मेरे हीरो नहीं रहे ।धर्मेन्द्र के दिनसगुजर रहे थे ।अमिताभ को भाई बनाना पड़ा ।माँ का कलाकारों से बनते सम्बन्ध पर सभी खुश होते थे ।वह उनके सुख दुख से जुड़ चुकी थी एक कलाकार की कला का मूल्यांकन हो रहा था । प्रेम चोपड़ा और प्राण को बहुत गालियां देती थी ।इतना आक्रोश कि उनको " रेमटा "बोलती थी ।याने जिसकी नाक बहते रहती है ।

कल पेपर देने जाना है तो आज हम दोनों फिल्म देखने जाते थे ।कालेज से भाग कर फिल्म जाते थे तो माँ हमारे साथ रहती थी ।मै घर आकर माँ को ले जाती थी बाकी सहेलियां टिकट लेकर रखती थी ।सारी मस्ती हम लोग माँ के साथ करते थे ।मां मेरी ही नहीं मेरी सहेलियों की भी दोस्त थी ।सब अपनी परेशानी माँ को बताते थे ।

माँ की मृत्यु 3जुलाई 1992 में हुई ।तब माँ 71 साल की थी ।एक सप्ताह से खाना पीना कम हो गया था । बिस्तर पर सोई रहीं ।सामने टी वी थी ।मैने कहा माँ टी वी देखोगे ।उनके हाँ कहने पर मैने टी वी चला दिया । थोड़ी देर में माँ ने उसे बंद करवा दिया । शाम को उनको दिखाने के लिये डी के अस्पताल में ले जाने वाले थे ।तीन बजे "हाथी मेरे साथी " फिल्म आ रही थी । माँ को मैने कहा माँ फिल्म देखोगे हाथी मेरे साथी आ रही है ।

उसने आंखे खोली और हाथी मेरे साथी कहा और देखने लगी ।आंखे और दिमाग साथ नहीं दे रहा था पर न देखने को कह रहा था ।आंखे खोलती और देख कर बंद कर लेती ।एक घंटे के बाद इशारा की कि टी वी बंद कर दो । मै टी वी बद कर दी ।शाम को अस्पताल ले गये ।जांच के लिये भर्ती कर लिये ।दूसरे दिन कोमा में चली ग्ई ।पर पाच घंटे मे वापस आ गई ।तीसरे दिन पढ़ने को धर्मयुग मांग रही थी जबकी क्ई साल से धर्मयुग की जगह मनोरमा मंगा रहे थे ।

मेरे कुछ पत्रिका रखे थे उन्होने पत्रिका दी ।बिना चश्मे के पढ़ नहीं पाती थी ।पुस्तक पलट कर देखी ।कुछ दिखाई नहीं दिया तो वापस रख दीं ।बहुत सी जांच हुई ।रात भी गुजर गई ।सुबह अस्पताल की सारी लाईट बंद करने को कहने लगी ।हम लोगों ने उन्हें प्राइवेट कमरे मे रख दिया ।सब निश्चिंत होकर घर आ गये काकि ही थे साथ में छै साल की भतीजी थी ।माँ की तीन बजे दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई ।हम सब उन्हें लेने चले गये ।लाईट बंद करवा कर अंतिम यात्रा की ओर संकेत दे रही थी हम लोग समझ नहीं पाये

रथ यात्रा के पहले दिन अपनी अनंत यात्रा पर चली गई ।मुझे आश्चर्य ये हुआ कि रथयात्रा के दिन 1963 में ईदगाहभाठा के घर पर रहने गये थे ।पूरे तीस साल की जीवन यात्रा में अपने घर को शिक्षा का मंदिर बना कर रखा ।गौ सेवा में लगे रहे ।।उस अंतिम यात्रा के पहले अपने पसंदीदा हीरो और उसकी फिल्म भी देख लिये ।यह संयोग ईश्वर का बनाया हुआ था ।अंतिम इच्छा पूछने की हमारी शक्ति नहीं थी ।प्रकृति ने स्वयं उसे पूरा कर दिया ।

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