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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 55


शकुन मेरे चाचा की लड़की थी ।चाचा के दो बच्चे थे एक लड़का और एक लड़की ।शकुन दीदी ने मेट्रिक की पढ़ाई पूरी की थी चाचा ने शादी तय कर दी ।भिलाई के पास मोखली गांव के दाऊ थे ।लड़का बी काम कर रहा था ।उसका नाम खम्हनलाल था ।उसी गाँव मे बड़े पिताजी की बेटी की शादी भी हुई थी ।वह जीजाजी भी बी काम कर रहे थे ।दोनों साथ ही थे ।दूसरी दीदी का नाम मोंगरा था ।

शादी बहुत धूम धाम से हो गई ।सास परेशान करती थी शकुन दीदी का एक बेटा हो गया ।वह एक साल का हो गया ।अब दीदी का दूसरा बच्चा होने वाला था ।उनकी सास के तंग करने की सीमा पार हो रही थी ।उसकी सास अपने पति को भी बहुत तंग करती थी ।उसकी सास तालाब जाते समय मोंगरा दीदी का घर पार करती थी ।मोंगरा दीदी का घर साफ सुथरा रहता था ।घर के बाहर गोबर से लीपा हुआ रहता था रंगोली डली रहती थी ।हर तीज त्यौहार पर घर आंगन चमकते रहता था ।जितना मोंगरा दीदी का घर चमकता उतना ही शकुन दीदी का शरीर काला होता ।माँ बेटा मारते थे खाना नहीं देते थे ।उसके ससुर बहु की तरफ बोलते तो बेटा उन्हें भी मारता था ।एक बार अपने पिताजी को गाय के खुंटे पर बांध दिया था ।

शकुन दीदी बहुत ही सीधी थी ।ससुर बहु दोनों एक दूसरे के सहारे रहते थे ।उनके ससुर कहते थे कि तेरे रहने से मुझे खाना तो मिलता है ।दीदी ने कभी मुंह नहीं खोला ।उनका आठवां महिना चल रहा था ।एक दिन उसकी सास ने तालाब जाने के पहले दीदी को पकड़ कर "एल्ड्रीन" कीटनाशक पीला दिया ।उसके कमरे के बाहर से एक काम करने वाली मजदूर महिला देख रही थी ।शीशी बाहर फेक दी ।

दीदी बहुत सा धोने का कपड़ा लेकर तालाब के लिये निकल गई ।रास्ते में लड़खड़ा कर गिर गई। लोग उठा कर उसे घर पहुंचा दिये ।शरीर काला पड़ने लगा था ।हमारे गाँव में खबर दी गई ।पर मायके वालों के पहुंचने के पहले ही उसे जला दिया गया ।जलते समय बहुत तेज आवाज आई और पेट फट गया ।पेट का बच्चा दूर फिका गया ।वह भी बेटा था ।

घर के लोग वापस आ गये ।दूसरे दिन तालाब की सारी मछलियां मर कर तालाब में तैर रही थी ।शायद वह एल्ड्रिन की शीशी को सबूत मिटाने के उद्देश्य से तालाब में फेक दिया गया होगा जिससे मछलियां मर गई ।लोगों की बातों के आधार पर पुलिस केस हुआ ।दसवें दिन हमारे घर से कोई नहीं गया जो भी नेंग की चीजें थी उसे नौकर के हाथ भिजवा दिये ।

एक चिट्ठी काका के घर पर आई थी ।उसमें दीदी ने लिखा था कि "मुझे आकर ले जाओ , मुझे बहुत तंग कर रहे हैं ।मेरे जान को खतरा है ।"यह चिट्ठी उसके मरने के दिन ही मिली ।चाचा तब हमारे घर पर आये थे सन् 1974 मार्च की घटना थी ।चाचा जब उनके गांव गये तो दीदी के ससुर जोर जोर से रोने लगे और बताये कि मैने उसे मार डाला । यह चिट्ठी मुझे डालने के लिये दी थी पर मै अपने स्वार्थवश इसे नहीं डाला ।शकुन चली जाती तो मुझे खाना कौन देता वही तो थी जो मेरा ध्यान रखती थी । चाचा पुलिस पूछताछ के दौरान गये थे तब चिट्ठी के बारे में पूछे क्योंकि उसमें एक माह पहले की तारीख डली थी ।

पुलीस ने कुछ नहीं किया ।पर चाचा याद करते थे कि बड़े पिताजी ने मना किया था पर मैने नहीं सुना ।यह घटना चाचा के दिल में ऐसी चुभी कि हमेंशा हंसते रहने वाले चाचा हंसना भूल गये आने वाले साल में सन 1975 की होली के बाद चाचा की हार्ट फेल से स्कूल के टेबल पर मृत्यु हो गई ।वे तब माना हाई स्कूल में प्राचार्य थे ।एक साल में दो मौत पर पुलिस न तो तालाब की मछली मरने का कारण ढ़ुढ़ पाई और न दीदी के नीले पड़े शरीर का कारण।

एक दाऊ परिवार का बेटा क्या करता है ।जिसका बाप कुछ बोल नहीं सका ।संस्कार माँ देती है ।एक औरत ने किस प्रकार अपने पति पर कहर ढाया बाद मे बहु पर, बेटे को संस्कार माँ का मिला यदि पिता का मिलता तो शायद कुछ तो संवेदना होती ।पिता तड़फता रहा जिसे एक बार खुंटे पर भी बांधा गया जिसे बहु ने छुड़ाया ।बहु ने इस घटना के बाद कितनी पीड़ा सही होगी ।जब ससुर और बहु साथ रो रहे थे ।बहु की मार पर ससुर पीड़ा से उछल रहे थे ।

मरती संवेदना की घटना जिस पर पूरा छेत्र रोया ।जिसे सालों लोग याद करते रहे ।इस घटना ने मेरे मन मे शादी शब्द से घृणा पैदा कर दी ।अच्छी बाते जितना असर करती हैं उससे ज्यादा खराब बातें करती है ।लोगों का सुखी परिवार नहीं दिखाई देता था पर मुझे दीदी का काला शरीर ,मार के निशान और पेट से छिटका बच्चा ही काल्पनिक रुप से दिखाई देता था ।

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