धनबहार

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शनिवार, 3 अगस्त 2019

कविता - बादलों ने रूख बदला

अगस्त 03, 2019
बादलो ने रुख है बदला ।
धरती से नाता तोड़ा ।
मैंने उससे पूछ लिया ।
क्यों इतनी बेरुखी हमसे ,
राह देखते थक गये हम ,
आ भी जाओ अब ।
बादलों ने दिखाया गुस्सा ,
गड़गड़ाहट से सबको जगाया ।
सुनो सुनो , सब सुनो
तुमने ,लगाये सैकड़ो कारखाने ,
वृक्षों को है काटा ,
कांक्रीट के बनाये जंगल,
बनाये हैं तुमने नकली झरने ,
नकली पौधे नकली वृक्ष ,
मेरा है क्या काम वहाँ ?
धुयें से दम घुटता है ,
बिन हरियाली मन दुखता है ।
जब बरसता हूँ ,
कोसते हो मुझे ।
अपनी गल्तियों पर भी
दोस देते हो मुझे ।
अब न आऊगा मैं ,
तब तक जब तक
न करोगे मांगे पूरी ।
कर लो मुझसे प्यार अब
हरियाली का लगाओ जमघट
क्योकि है मुझे हरियाली से प्यार
धुयें हो बंद ,केमिकल के रास्ते बदलो
आता हूँ मै पास तुम्हारे
आता हूँ मैं पास तुम्हारे ।
सुधा वर्मा ,रायपुर ।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

बरवट के गोठ

अप्रैल 18, 2017

गुरुवार, 12 मई 2016

कविता - आँख मिचौली

मई 12, 2016



कहाँ हो तुम ?
कैसी हो तुम ?
आ भी जाओ ,
कहाँ हो जाती हो गुम?
वाष्प तुम्हे बुला रही हूँ ।
आओ कुछ छण साथ हो लें
तप तप कर बेचैन हूँ
अपनी ही टकराहट से
अपने को ही जला रही हूँ ।
कहाँ गई वह छप्पर ?
सुखरु तुमने खपरे बनाना
क्यों बंद कर दिया ?
मैं कहाँ जाऊं ?
चारो तरफ सीमेंट के
जंगल ही जंगल
किसे अपना घर बनाऊ ?
छप्पर पर बैठा करती थी
खपरों के रंध्रो से
कमरों मे झांका करती थी
दो छण का विश्राम
लिया करती थी ।
लाल मटके के पानी की
ठंडकता को सहसूश करती थी ।
काली मरकी के बासी को
झांका करती थी ।
चुन्नु मुन्नु के साथ
छुपा छुपी खेला करती थी ।
रंध्रो से जब कमरे में जाती तो
मुझे देख अपने हथेलियों से
छुना चाहते थे
बार बार मुझे पकड़ा करते थे ।
मै अटखेलियां करती और
वापस लौट आती थी ।
खप्परों पर विश्राम कर
चुन्नु मुन्नु के संग खेल
मटकों को छूकर
बासी को छांक कर
मै जब वापस लौटती
तो मेरी गरमी शांत हो जाती ।
आज सुखरु खो गया
चुन्नु मुन्नु रहने चले गये
पक्के मकानों में।
सीमेंट के छत पर
सर फोड़ती हूँ
बार बार टकरा कर
अपने आप को कोसती हूँ ।
तप तप कर जल रही हूँ ।
आओ वाष्प एक बार
मेरे साथ  खेल लो
इस आँख मिचौली में
तुम ही रहती हो मेरे साथ
वाष्प की बूंद इठलाती बोली
नहीं धूप तुम और तपो
जितनी सह सकती हो सहो
फिर आती हूँ मैं
खूब खेलेंगे आँख मिचौली
छुपा छुपी
देखना एक दिन तुम्हे मै
आकाश में  बंद कर दूंगी
फिर मै ही रहुंगी ।
आज तुम हो ,कल मैं
यही आँख मिचौली खेलेंगे
आँख मिचौली ।
सुधा वर्मा ,  9-4-2016


गुरुवार, 5 मई 2016

कविता -हाँसत बिहनिया

मई 05, 2016
हाँसत बिहनिया
आगे मोर अंगना
चिर ई चिरगुन चहके लगिन
गुलाब चमेली महके लगिन
धान के बाली सोन कस दिखे लगिस
सुरूज के सोनहा किरन
डारा पाना म नाचे लगिस
नान नान  लहरा ल दऊंड़ा के
तरिया के पानी हांसे लगिस
बछरु मेछरावत हे
बहुरिया लुगरा ल मुंह म
चपक के हाँसत हे
लइका ह कांख कांख के
बोरिंग ल टेरट हे
हंऊला ह पिंवरा दांत ल
निपोरत हे
वाह रे बिहनिया
कइसन खलखला के हांसत हे
हाँसत बिहनिया
बड़ सुग्घर लागत हे
सुधा वर्मा ,रायपुर
1-10-2015

रविवार, 1 मई 2016

कविता -हाँसत धरती

मई 01, 2016

हाँसत धरती
मुस्कावत किसान
धरले नांगर
चलरे किसान
बतर बियासी के बेरा आगे ।
ओढ़ले खुमरी
धरले बेल पान
रद्दा म हावय धतूरा
दूध के धर लोटा
चल चल जाबो सिव धाम
हाँस़त धरती
मुस्कावत किसान
बारी बखरी हरियागे
कका दाई खुशी म मात गे ।
अंगना के मखना छानही म चघगे
बारी के खेखसी फरगे
खीरा ह दांत देखावत हे
अम्मारी पटवा पानी म नहावत हे
चल चलरे किसान
धर के नांगर ब्ईला
अउ धरले तुतारी
नाहवत हे खेत
तहूं नहा ले किसान
हाँसत धरती
अउ मुस्कावत किसान ।
सुधा वर्मा ,रायपुर

कविता -तर्पण

मई 01, 2016

तर्पण --
पिता का कर त्याग
खुशियां मना रहा
पिता गये हरिद्वार का ढोल बजा रहा ।
पांच वर्षों बाद एलान हुआ
पिता ने तोड़ा दम हरिद्वार में
शोक नहीं मनाना है
जो आता है उसे जाना ही है
गीता ने हमें बताया है
आत्मा अमर है ।
पिता जी अमर है
खाना पीना तो फिजूल खर्च है।
पर हर वर्ष होता एक आयोजन
पित्रपक्ष पर गरीबों का भोजन ।
एक दिन पिता ने सोचा
देख आऊं बेटे को
हो अब रंजीस दूर ।कुछ पल जी लूं बच्चों के संग ।
पिता खड़ा द्वार पर
बेटे ने पहचाना नहीं
था उस दिन भोज वहाँ
पंक्ति में बैठ पिता ने
अपने बेटे के हाथों से खीर पूरी पाई ।
बेटे ने कहा सबसे
मेरे पिता कि आत्मा को शांति मिले ,
दुआएं देना
मुझे और कुछ नहीं चाहिये
पिता के मन की शांति चाहिए ।
बेटे के हाथों से खीर पूरी ले तृप्त हुआ मन ।
पिता के अश्रु लगे झरने ।
बेटे ने पूछ लिया , कुछ और चाहिये ?
पिता ने कहा नहीं तुम मुझे मेरा बेटा नहीं दे सकते ।
बुझे मन से लौट गया
पित्र पक्ष का पितर
जिवित ,पर
मन को आंसूऔं के तर्पण से भिगोता
फिर निकालता  , फिर डुबोता
जैसे मन नहीं , काला तिल हो
वह पिता
काला तिल हो / वह पिता ।
सुधा वर्मा , रायपुर
5-10-2015

कविता -नन्ही परी की पहली सुनहरी सुबह

मई 01, 2016

नन्ही परी की पहली सुनहरी सुबह।
बधाई हो तुम्हें इस दुनिया में
आने के लिये
पिता को नन्हे हाथों से छुने के लिये
बाट जोहती माँ को
अपनी किलकारी सुनाने के लिये
अब गुंजेगी तुम्हारे पायल की छुनछुन
सजे कमरा तुम्हारे घरौंदो से
साड़ियों से बनाओगी घर तुम
छोटे छोटे हाथों से
बनेगी रसोई तुम्हारी
आंगन की अल्पनाओं में डडियां खींचती
जीवन को जोड़ना सीखती
रंगोली में रंग भरती
जीवन को रंगने के लिये
अपने को तैयार करती
आ गई नन्ही परी ।
सुनहरे रंगो से भरा हो
जीवन तुम्हारा
सूरज ने भेजा है
आशीष तुम्हें
अपनी पहली
किरण से
हवा ने भेजी है खूशबू
अपने चमन से
चिड़ियो की चहचहाहट ने
जीवन से लड़ने का पैगाम भेजा है
प्रकृत देगी हमेंशा साथ तुम्हारा
क्योंकि सूरज ने सबको
पहली किरण से मुस्कान भेजा है
माँ की मुस्कुराहट हो तुम
पिता का प्यार हो तुम
घर की शान हो तुम
ले लो पहली किरण की
बधाई तुम
ले लो पहली किरण की
बधाई तुम ।
सुधा वर्मा , रायपुर
9-10-2015