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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 38


कुंवर सिंग का व्यक्तित्व भी खास था ।वह अरविंद नेताम का रिस्ते का भाई था ।यह बात बहुत ही गौरव से बताता था ।नौ दस साल का था जब काका ने भाई को खिलाने के लिये रखा था ।

वह बहुत ईमानदार और मेहनती था ।हॉस्टल में ही रहता था । आठ नौकर रहते थे ।पंडित भी रहते थे ।ये सबकी सेवा करता था ।शाम को शिक्षकों की तेल मालिश किया करता था ।कुछ मंगाने पर उनका सामान भी लाता था ।किसी का सिर दर्द हो तो सिर दबाता था ।

वह सब से कहता था मै भी पढ़ना चाहता हूँ ।मुझे आप लोग पढ़ा दो मै आप लोगों का काम कर दूंगा ।शिक्षक लोग उसकी लगन देख कर पढ़ाने लगे ।काका माँ को पता नहीं था ।हॉस्टल बिक गया ।अब शिक्षकों के लिये किराये के घर लिया गया जहां वे लोग रहते थे ।1962 में यह चायपत्ती बंगला और बिलासपुर का प्राचार्य का बंगला सवा लाख में बेचा गया ।उस बंगले को रज्जाबली फरिस्ता ने खरीद लिया ।स्वार्थवश बेचा गया सरकारी बंगला ,किसी ने बी एड के शिक्षकों के रहने के बारे में नहीं सोचा ।

कुंवरसिंग की सेवा की भावना और पढ़ाई की लालसा बरकरार रही । वह रात को घूम घूम कर पढ़ता रहा बदले में लोगों के काम करते रहा ।एक बार शादी हुई उसे बस्तर के गांव मे रखा था ।पता नहीं क्या हुआ बाद में दूसरी शादी कर लिया ।पहली पत्नी को गांव में रखा था दूसरी पत्नी को रायपुर ले आया ।पढ़ाई का सिलसिला चलता रहा ।

उस समय रात को कक्षायें चलती थी वह 1970 तक पांचवीं पास हो गया ।उसके आगे की पढ़ाई भी वह करने लगा ।हमारे घर आता तो मुझे पढ़ते देख कर बड़े गौरव से कभी इतिहास की बात बताता ,कभी भूगोल की ।एक बार मुझे चुम्बक की बात बता रहा था पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बारे मे बता रहा था ।एक बाल उसने जो बात बताई तो मैं सोचने लगी बिना पढ़ा लिखा ग्रामीण कितना समझदार होता है ।

उसने मुझे सायफन के बारे में बता रहा था ।कुंवरसिंग ने बताया कि इसका उपयोग वह गांव में अपने खेतों पर किया है । मैने पूछा तो वह सीढ़ियों पर बाल्टी में पानी भरकर छोटे पतले पाइप से साइफन के सिद्धांत को समझाते हुये प्रयोग करके दिखाया ।नीचे में रखे बाल्टी को दूसरे का खेत और उपर की बाल्टी को अपना खेत बता कर नीचे के खेत के पानी को अपने उपर के खेत में कैसे पहुंचाया यह इतने आसानी से समझा दिया कि कोई शिक्षक क्या समझायेगा ।उसने बताया की पूरी रात वह अपने खेत में इसी प्रकार पानी भरता रहा ।शिक्षा का उपयोग दैनिक जीवन में करना शिक्षा को सार्थक बनाता है ।

उसके चेहरे की खुशी मुझे आज भी दिखाई देती है ।वह बहुत समझदार हो रहा था ।शिक्षको की संगत उसमें अच्छे संस्कार डाल रही थी पर इस सब के पीछे उसकी सहृदयता थी ।उसके मदद करने का गुण था ।काका के लिये अलग से चपरासी था तो वह स्वयं प्राचार्य से मिल्कर काका के पास आ गया ।काका के अवकाश प्राप्त होते तक काका का काम करता रहा ।

कभी कभी घर का काम भी रविवार को कर देता था ।हमारे घर पर ही खाना खाता था । माँ का व्यवहार हमेंशा उसके लिये बेटे की तर। था तो उसने भी बेटे की तरह ही हम सब के साथ व्यवहार किया । कभी कभी किका को कपड़े के लिये टोक देता था ।कभी टूर पर जाने के कार्यक्रम मे भी बीच में बोल देता था काकि कभी कभी उससे पूछते थे "क्यों कुंवरसिंग सीधे कांकेर जायें की अभनपुर धमतरी के स्कूल को देखते हुये जायें ।"वह काका की दिनचर्या जानता था ।सारे स्कूल निपटाते कांकेर जाओ और आराम से कांकेर से वापस आना ।काका खाने के बाद थोड़ा आराम करते थे ।कांकेर के प्राचार्य से काका की दोस्ती थी वहां वे आराम कर सकते थे ।

एक हास्यास्पद घटना हुई थी ।काका भूल जाते थे । उनको याद दिलाने का काम कुंवरसिंग ही करता था ।काका की हर काम के बारे में वह पूरी जानकारी रखता था ।छोटा सा ग्रंथालय था उसे भी काका देखते थे ।आज का पुलिस मुख्यालय रायपुर के राजधानी बनने के पहले बी एड कालेज था ।काका के कमरे के बाजू में ही क्लास लगती थी ।काका का सामान याने किताबें और चॉक रजिस्टर लेकर कुंवरसिंग जाता था ।एक दिन क्लास से चिल्लाने की आवाज आई " कुंवरसिंग के बच्चे चश्मा लेकर आ। "

सारे विद्यार्थी काका की तरफ देख रहे थे ।कुंवरसिंग दौड़ते आया ।वह क्लास के दरवाजे पर खड़ा होकर हंसने लगा ।काका को गुस्सा आया "हंसता है चश्मा ला "क्लास में सब चुप थे ।कुंवर सिंग हंसते हुये कहता है "आंख में लगा है ।" जोर जोर से हंसने लगा ।काका ने अपने चश्मे को छुया और रजिस्टर खोलने लगे ।सभी हंस रहे थे ।काका कड़ुवाहट सा मुंह बना रहे थे ।

एक दिन इस पूरी घटना का चित्रण कुंवर सिंग हमारे घर पर कर रहा था ।माँ धीरे धीरे मुस्कुरा रही थी माँ हमेंशा कहती थी कि काका के वैगर कालेज बंद हो जायेगा । पूरा कालेज सर पर उठा कर रखे हैं ।काका की व्यस्तता से माँ परेशान रहती थी ।उनका कहना था कि खाना तो ठंडे दिमाग से खाया करो ।

हम लोग हंसते हंसते लोट पोट हो रहे थे ।सबसे बड़ी बात काका भी हंस रहे थे ।काका का व्यवहार दोस्ताना था ।समय समय पर हम लोगों के साथ मजाक भी किया करते थे ।कभी गलती होने पर डांटते भी थे ।पर हमारे परिवार मे बेटियों को नहीं डांटते थे ।

कुंवरसिंग बाद में भी आते रहा ।उसमें पढ़ाई करने के बाद जो आत्म विश्वास जागा था वह साफ दिखाई देता था ।हम लोगों को ज्ञान की बातें बताते रहता था । मुझे लगता था वह बताना चाहता था कि मै भी यह सब जानता हूँ ।बहुत ईज्जत के साथ उसने नोकरी की और अवकाश ग्रहण किया ।

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