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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 36


काका किसी को खाली बैठे नहीं देख सकते थे ।अपने जीवन में हमेंशा सक्रिय रहने वाले काका यदि किसी को खाली बैठे देखते तो कुछ न कुछ काम जरुर बता देते थे ।हम लोग बच्चे थे तब स्कूल से आने के बाद खाना खा कर थोड़ी देर खेलते थे फिर अपने पढ़ाई में लग जाते थे ।यदि खाली रहे तो रखा हुआ बर्तन धोने बोलते कभी थोड़ा झाड़ू लगाओ बोलते थे ।घर में काम करने के लिये बाई थी पर हम लोगों को व्यस्त रखते थे ।

स्वयं कभी बगीचे को झांकते ,सुबह की घुड़ाई तो हो गई ,कटाई छटाई भी हो गई पर जा जा कर देखते ।बछड़े से बात करते ।गाय से हाल चाल पूछते और नहीं तो रसोई में झांकते ।काका को रसोई के पास देखते ही माँ का पारा चढ़ जाता था ।माँ कहती "वहाँ क्या काम है ?" काका मुस्कुराने लगते और माँ का मुंह बनने लगता ।

काका को खाना बनाने में रूची थी क्योंकि खाने में रुची थी ।गुलाब जामुन ,गुझिया और खाजा ,अनरसा हमेंशा घर में रहता था । दाल में बहुत सा घी डाल कर खाना पसंद करते थे ।सुबह कितनी भी दाल सब्जी हो आखरी में दूध जरुर लेते थे ।रात को दूध में भिगा कर रोटी खाते थे साथ में सब्जी भी खाते थे ।भाजी और चटनी बहुत पसंद थी ।नागपूर में पढ़ते थे तो उनको वहां का खाना भी पसंद था ।हर चीज में गुड़ या शक्कर डालना पसंद करते थे ।

बी एड कालेज रायपुर के हॉस्टल वार्डन थे तो खाने को कैसे स्वादिष्ट बनाना यह सब खोजते रहते थे ।खाने में उनका प्रयोग हमेंशा सफल रहा ।चटनी के मास्टर थे बीस तरह की चटनी बनानीसाती थी जिसे मौसम के अनुसार हॉस्टल में भी बनवाते थे ।लोग उनसे सलाह भी लेते थे ।कभी कभी तो घर पर सिलबट्टे पर चटनी पिसने बैठ जाते थे ।
दाल को गाढ़ा बनाने के लिये पके चांवल के मांढ़ को डलवाते थे ।इससे शरीर को ताकत भी मिलती है कहते थे ,आज तो यह विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है।

बस माँ का पंगा इसी बात पर होता था ।सब्जी में जाकर गुड़ डाल देते थे ।पकते हुये दाल में मांढ़ डाल देते थे। चुल्हे पर सब्जी और चांवल पकता था और कोयले की सिगड़ी पर दाल बनाते थे ।माँ काका को रसोई के पास देखते ही सतर्क हो जाती थी ।दोपहर को बची रोटियां बाहर की गाय को खिला देते थे ।यह रोज नहीं होता था पर खाली होते ही उनका दिमाग इस तरह के काम की ओर दौड़ता था ।

रिटायर होने के बाद ज्यादा परेशानी रही तो उन्हें माँ ने विवेकानंद आश्रम की लायब्रेरी की ओर भेज दीं ।गर्मी की छुट्टीयों में हमारे लिये शामत रहती थी ।मैं माँ के साथ आचार पापड़ बनाने में मदद करती थी । जहां आराम करने बैठते तो कहते चलो काम बताता हूँ ।बहुत सा नारियल का बूच इकट्ठा करके रखे रहते थे उसे अलग करने का काम देते थे ।भाई तो खिलाड़ी था वह अपने में व्यस्त रहता था मेरे लिये ही य. काम रहता था ।माँ से कहते तो माँ कह देती मुझसे कहोगे तो जलाने का ही काम करुंगी ।

बस चुपचाप मैं काका का काम करते रहती थी ।वैसे भी मैं अपने काका की हर बात सुनती थी तो वे हर काम मुझसे ही कराते थे ।साल भर का इकट्ठा सारा बूच मैं अलग करती थी ।हांथ की उंगलियां दुखने लगती थी ।सारी बूच जब रेशे में बदल जाती थी तब उसे डंडे से मारते थे ।इससे भूसा अलग हो जाता था और रेशे अलग हो जाते थे ।अब मै पुराने कपड़े से तकिये के दाब सिलती थी उसमें काका रेशे को भरते थे ।बढ़िया तकिया बन जाता था ।मैं इस पर कढ़ाई करके कवर लगा देती थी ।

हमारे घर में बहुत मेहमान आते थे ।पाटन दुर्ग भिलाई से रायपुर आने पर बस से उतरते ही पास में घर होने के कारण लोग हमारे घर में ही रुकते थे ।खरीददारी के बाद सिनेमा देख कर रात को रुकते थे ।सुबह की पहली बस से चले जाते थे ।तीज त्यौहार में मेहमानों के आने पर यही तकिया काम आता था ।लोग छुकर पूछते थे "इसमें क्या है?"

काका बहुत गौरव से बताते कि यह नारियल का बूच है ।इसे घर पर ही बनाया गया है ।फिर बात घूम कर उन कीमती सोफे की तरफ चली जाती जिसके गद्दे में रेक्जीन के नीचे यही नारियल का बूच रहता है ।लोगों के लिये ये तकिया नई शोध की तरह था ।इसे लोग देखते और काका बहुत ही मुस्कुरा कर बताते ।माँ का चेहरा तब देखने लायक रहता था ।चेहरे पर मुस्कान की जगह गुस्सा रहता था ।नीचे स्तर की बात थी इतने अमीर मालगुजार की बेटी के घर पर ऐसा तकिया ?

काका ने जब मामा को यह तकिया दिखाया और उन्होंने तारीफ की तब माँ कुछ सामान्य हुई ।कुर्सियों की गद्दी भी बनाये ।मेरे पास भी एक गद्दी और एक तकिया अभी भी है।

दूसरा एक काम और करते थे ।त्रिफला बनाने का ।गांव से आंवला लाते या फिर बाजार से खरीद कर सुखाते थे ।हर्रा बहेरा लाकर सुखाते थे ।ये सब खलबत्ते से कुटते थे ।मुझे कहते थे या फिर बाई से कुटवाते थे स्वयं छानते थे ।ये त्रिफला खाते थे । रात को भीगा कर सुबह कपड़े से छान कर आंखो को धोते थे बाकी त्रिफला को अपने बालों में लगाते थे ।

काका के बाल पक गये थे थोड़ा सा किनारे का बचा था। त्रिफला का ऐसा असर हुआ कि पीछे के बाल काले हो गये ।काका को तो दिखता नहीं था पर मै तो लाडली थी रोज बालों को देखती थी ।एक दिन मैंने कहा कि काका पीछे के बाल काले हो गये तो झेंप कर मुस्कुरा दिये ।माँ ने भी कहा कुछ दिनों से मुझे भी लग रहा है कि बाल काले हो रहे हैं । कईं लोगों के कहने पर काका को विश्वास हुआ पर एक आजूबा हमने देखा ।

अपने अंतिम समय तक चलते फिरते पूजा पाठ करते रहे ।काली मिट्टी और त्रिफला से पूरे जीवन जुड़े रहे ।उनके हाथ की चटनी के लिये आज भी मन तरसता है ।पर पूरे जीवन वे अपने हाथ से खाना बनाने के लिये तरस गये ।बस सब को बताते रहे इसमें ये डालना वो डालना ।

उनकी सक्रियता को सभी आज तक याद करते है ।मैं तो कभी नहीं भूल पाती ।उनके साथ काम करने वाले भी बहुत याद करते है ।

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