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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 34


फूलों से मुझे बहुत प्यार रहा । काका सुबह चार बजे उठते थे ।उठने के बाद दातून करने के बाद बाहर से निपटने के बाद तुरंत नहा लेते थे ।उसके बाद घर में जो भी फूल होता तो तोड़ लेते थे ।सुबह उठने पर मुझे फूल पौधे की जगह भगवान पर चढ़े दिखते थे ।चुप देखती थी ।

काका को पेड़ लगाने में , बागवानी में बहुत रूची थी ।माँ बेल वाली सब्जी लगाती थी । अब मैं भी कुछ फूल के पौधौ के कलम या पेड़ लगाने लगी ।गमले भी खरीदे गये ।अधिकतर गुलाब ही थे ।हजारी मोंगरा सफेद पांच पंखुड़ी के फूल बारहों मास रहता था ।चिरइया क्ई रंग के बारीश के दिनों में खिलता था ।बहुत प्रकार के गेंदे लगाते थे । एक छोटी सी बगिया तैयार हो गई थी ।

बरसात में माँ सेम और कद्दू के बीज बोती थी ।हर दिन उनके अंकुरित होने का इंतजार करती ।बीज जब अंकुरित होने के बाद उसके एक एक पत्ते के निकलने का इंतजार करती थी ।छत में चढ़ने के लिये सीढ़ी पर चढ़ कर ऊपर जातींऔर वहाँ से रस्सी लटकाती थी ।मै नीचे से उस रस्सी को पकड़ती थी और एक इंटे से बांध कर उसे बेल के पास रख देती थी ।अब माँ हर दिन उस बेल को छूकर रस्सी से लपेटती थी ।मैं अपने गेंदो का रोपण करती और उसे ही देखती रहती थी ।

काका गुलाब मोंगरे की देखभाल करते थे ।हम सब अपनी बगिया में खुश थे ।छत पर भी बहुत से गमले रख कर क्रोटन और गुलाब लगाये थे । अब काका के नहाने के बाद मैं भी उठ जाती थी ।काका के फूल तोड़ने के पहले मैं फूल तोड़ती थी ।काका खुश हो जाते थे ।उनके पूजा करते तक बिना नहाये पास में बैठ जाती थी ।

नहाने के बाद से ही "भय कृपट कृपाला दिन दयाला " शुरू हो जाता था ।फूल चढ़ाने के बाद एक आसन मृगछाला में बैठ जाते थे ।गीता निकाल कर पढ़ते थे ।रोज एक अध्याय पढ़ा करते थे ।गीता पूरी याद होने के बाद भी खोल कर रखते थे कि कहीं भूल न जाये ।

काका से मैने पूछा कि पूरी गीता कैसे याद है तो काका ने बताया कि उनके पिताजी रामायण पढ़ा करते थे और साथ में गीता के पांच श्लोक भी ।अपने सभी बच्चों को गीता याद करने के लिये कहते थे ।इसी से आदत हो गई है ।काका जब रायपुर सेंटपॉल स्कूल में पढ़ने आये तो दादा जी ने गीता दिये थे कि इसे पढ़ते रहना ।बचपन से यह सिलसिला कभी खतम नहीं हुआ । बियासी साल की उमर तक यह सिलसिला चला ।

काका स्वयं फूल तोड़ने के बदले कोई तोड़ कर दे ऐसा सोचते थे ।मैं हमेंशा फूल तोड़ने को तैयार रहती थी क्योंकि मुझे फूल बचाना रहता था ।जब मैं थोड़ी बड़ी हुई पाचवीं से मेरी दिनचर्या में फूल तोड़ना और हार बनाना सामिल हो गया ।

श्रावण सोमवार ,दिवाली ,उसके बाद अगहन मास के गुरुवार तक यह चलता रहता था । अगहन महिने में सुबह चार बजे तो मैं पूजा करती थी तो गेंदे के फूल बुधवार शाम को ही टोकनी में तोड़कर रखते थे ।रात को माँ और मै गेंदे के हार बनाया करते थे ।हमारे घर में बहुत तरह के गेंदे थे ।रंग और खिलने का ढंग अलग अलग था । काका पूरे ठंड भर खुश रहते थे क्योंकि अलग अलग भगवान के लिये अलग अलग रंग के फूल मिलते थे ।

पूरे जीवन उनकी दिनचर्या नहीं बदली ।भाई के पास नागपुर भरवेली तिरोड़ी जाते तो वहाँ पर भी एक माली रंगबिरंगे फूल और बेल की पत्ती तोड़कर ला देता था ।अपने जीवन के अंतिम समय में सात साल मेरे घर पर भी उनका रहना होता रहा ।हमारे घर फूल कम थे तो कालोनी में दूसरों के घर से मांग कर ले आते थे पर पूजा बिना फूल के कभी नहीं किये ।

आज फूल खरीदते है ।पैसे से आज बहुत कुछ खरीदा जा सकता है पर एक पेड़़ लगा कर उसकी सेवा करना ,रोज कद्दू की बेल को देखना ,कलियों के निकलने का इंतजार करना बहुत ही रोमांचक होता है ।कली का खिलना और फूल से फल बनते हुये देखना बहुत ही खुशी देता है ।उस फल को खाना और उस फूल को भगवान में चढ़ाना मन को संतुष्टि देता है ।

आज बाजार और पैसा इतना बढ़ चुका है कि खिलती कलियों का इंतजार करने वाले नहीं है उसे प्यार करने वाले नहीं है ।घर के कद्दू और बिही के लिये बाट जोहने वाले नहीं है ।माली आकर सब करता है और फूल तोड़कर रख देता है ।लोग मशीन की तरह भगवान में चढ़ा कर चले जाते है ।

कभी फूल के बारे में सोचें कि उसे भी हमारा इंतजार रहता है । काका की अंतिम यात्रा में भी उनके चहेते फूल ही साथ में थे ।

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