रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 57


मेरे लिये बी एस सी पूर्व बहुत ही भारी था ।सन 1974--75 का समय रविशंकर विश्वविद्यालय का नाम हड़ताल के लिये ही प्रसिद्ध रहा ।मार्च की परीक्षा अप्रेल के लिये बढ़ा दी गई ।साल के बीच में कई बार हड़ताल हुई थी ।छात्र नेता ने यही कारण बताया और परीक्षा की तारीख आगे कर ली ।उसके बाद तैयारी नहीं हुई करके म्ई तक बढ़ा लिया गया ।

अब म्ई की गर्मी के कारण परीक्षा जुलाई में रखी गई ।अब पढ़ाई का क्या होगा? तो सभी को प्रोविजनल एडमिशन दे दिया गया ।अब एक समस्या और खड़ी हो गई ।बरसात मे गई गांव शहर से बाढ़ के कारण अलग हो जाते है ।तब बारीश भी बहुत होती थी एक माह की झड़ी हुआ करती थी ।तब पालिथीन याने झील्लियां भी नही हुआ करती थी ।

छतरी लेकर आते जाते थे ।रेनकोट जिसे बरसाती कहते वह भी पहनते थे ।जब तेज बारीश हो तो अपनी चुन्नी से सिर ढकते थे और उसी से अपनी पुस्तकों को ढकते थे ।भीगने पर घर में उसे अलग अलग करके सुखाते थे ।जब धूप निकलती थी तब भी सुखाते थे ।

ऐसी बारीश में परीक्षा कैसे हो सकती है ? यह फिर एक मुद्दा मिल गया परीक्षा आगे सरकाने के लिये ।सितम्बर में परीक्षा की तारीख तय की गई ।परीक्षा में समय सारणी ऐसी थी कि सप्ताह में एक पेपर होता था ।मेरे लिये बहुत बड़ी मुसीबत हो गई । माँ को बुखार आ गया ।

मेरे पेपर शुरु होने के पहले ही माँ बीमार पड़ गई थी ।एक सप्ताह में बुखार नहीं उतरा ।मेरे प्रेक्टीकल की परीक्षा उसी परेशानी में समाप्त भी हो गई ।अब पेपरहोने को था ।डाक्टर ने कहा टाईफाइट हो सकता है , एक सप्ताह में बुखार ठीक हो जायेगा ।पर यह बुखार ज्यों का त्यों बना रहा ।यह बुखार पूरे पांच सप्ताह तक रहा ।उसके बाद कमजोरी में माँ चल भी नहीं पा रही थी । माँ को ठीक होने में तीन महिने लग गये थे ।

मैं सुबह उठ कर खाना बनाती थी ।माँ को गर्म और कड़क रोटी खाने के लिये कहा गया था क्योंकि यह पचने में आसान होता है ।मैं कोयले की सिगड़ी जला कर माँ के कमरे में लाती थी और छोटी छोटी पतली रोटी को कड़क सेक कर माँ कै खिलाती थी ।दोपहर के लिये दो रोटी रख देती थी ।फाफी को बता दी थी की जब माँ रोटी मांगे तो इस रोटी को गैस में गर्म करके दे देना ।माँ दूध नहीं लेती थी। उसे दूध बिल्कुल पसंद नहीं था । माँ को रोटी खिलाना भी कठिन था ।वह तबियत खराब होने पर चाय भी नहीं पीती थी ।शाम को भी वही कुछ करती थी ।जिस दिन घर पर रहती थी तो दोपहर को पढ़ने बैठ जाती थी ।माँ के बाजू में सोती थी और रात को बार बार उठ कर माँ को देखती थी ।एक अनजाना सा भय बना रहता था ।

मैने माँ को सर्दी खांसी में भी सो सो कर खाना बनाते देखा था ।जीवन में पहिली बार इतने लम्बे समय तक बीमार रहीं ।एक माह की झड़ी भी थी ।कपड़े नहीं सुखते थे ।बाहर से भीग कर आती तो सिगड़ी जलते तक गैस में हाथ सुखाती थी तब माँ का बुखार नापती थी ।मेरे रिजल्ट आते तक माँ बिस्तर पर ही रही ।

एडमिशन बाद में ली और कालेज जाने लगी ।प्रेक्टिकल भी बहुत कम कर पाई ।रिजल्ट ऐसा रहा की दिल खुश हो गया ।एम पी क्रानिकल में मेरा नाम आया 64 प्रतिशत से पास हुई थी ।विश्वविद्यालय में प्रथम आई थी ।

मैं कालेज सिर्फ एक माह गई तब तक लैब बंद हो गये थे ।एक दिन जानकारी दी गई ।उसी के आधार पर बी एस सी अंतिम की प्रायोगिक परीक्षा दी थी ।उसके बाद बाकी पेपर भी हो गये ।अप्रैल में सारी परीक्षा समाप्त हो गई ।मै द्वितीय श्रेणी से पास हो गई ।

पर वह दो माह का समय मेरी परीक्षा के साथ साथ मेरे जीवन की भी परीक्षा थी ।और मैं सभी तरह की परीक्षा में पास हो गई थी ।माँ भी अच्छी हो गई ।आस पड़ोस के लोग और रिस्तेदार भी मेरी तारीफ कर रहे थे ।माँ कहती थी कि मैने सोचा नहीं था कि मेरी बेटी इतना कुछ कर लेगी ।खाना बनाने के अलावा पढ़ाई करना फिर परीक्षा भी देना बहुत उसके लिये बहुत बड़ी बात है ।

परीक्षा की तारीख नहीं बढ़ती तो शायद इस परेशानी से आसानी से निकल सकते थे ।पर छात्र नेता की राजनीति से बहुत लोगों ने परेशानी झेली ।यह साल मेरे जीवन के लिये यादगार रहा ।

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