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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 52


दीदी को नाटकों का शौक था तो मुझे नृत्य का शौक था ।सन 1965 में रायपुर में नृत्यकला केन्द्र खुला ।कुंजबिहारी अग्रवाल सर नृत्य सिखाते थे ।पुरानी बस्ती में सरस्वती स्कूल के सामने सिखाया जाता था ।वे अब डांस की पोशाक किराए से देते हैं ।

बहुत से स्कूल में सम्पर्क करके बच्चों को नृत्य सिखाने के लिये एकत्र किया गया ।पांच रूपये मासिक फीस थी ।हम लोग अपने स्कूल से पांच लोग गये थे ।शाम को पांच बजे जाते थे ।एक घंटे कत्थक सिखते थे । घर आते तक सात बज जाता था ।थोड़ी देर पढ़ाई करने के बाद खाना खा कर सो जाते थे ।

सुबह सात बजे स्कूल जाते थे ।बारह साढ़े बारह बजे आने के बाद पढ़ाई और गृह कार्य कर लेते थे ।शाम को मैं घुंघरु लेकर निकल जाती थी ।कुछ दिनों के बाद जगह बदल गई ।पुरानी बस्ती और कुशालपुर के बीच एक नये बने मकान मे केंद्र खुल गया ।बच्चे भी बहुत हो गये थे ।

एक दक्षिण भारतीय शिक्षक भी थे ।वे कथाकली मणीपुरी नृत्य सिखाते थे ।हम लोग आदीवासी नृत्य भी सिखते थे ।एक साल के बाद गंधर्व संगीत और नृत्य विद्यालय की तरफ से परीक्षा दिये मैने नृत्य का प्रथमा उत्तीर्ण कर लिया ।उसके बाद तो हमारे कार्यक्रम देने के दिन आ गये ।रायपुर के नया मंदिर मे नृत्य का कार्यक्रम रखा गया खालसा स्कूल रायपुर में भी रखा गया था ।धमतरी में भी कार्यक्रम देने गये थे ।

बचपन से मटकते रहती थी ।इस मटकने के चक्कर मे क्ई बोनचाईना के कप प्लेट तोड़ी थी ।माँ कोई भी सामान मंगाती तो मै सामान को उछालते हुये हाँथों को इधर उधर करते और पैर से ताल देते ही जाती थी ।इसी कारण माँ ने नृत्य सिखने भेज दिया ।यहाँ तो मुझे हाथ पैर चलाने के लिये एक दिशा मिल गई थी ।मै हमेंशा अपने रिहर्सल करते रहती थी ।दो साल नाचते कुदते बीत गया ।खेल में भी मै दौड़ना ही पसंद करती थी ।हॉकी खेलना शुरु की थी पर बंद करके बैडमिंटन खेली वह भी घर तक ही रह गया ।

जहां नृत्य सिखते थे उस मकान को खाली कराया गया ।मकान या कमरा कहीं मिल नहीं रहा था ।गुरुजी को पता चला कि हमारे घर पर पहिली मंजिल मे एक बड़ा हॉल खाली है ।दूसरे कमरे में मैं पढ़ती थी ।गुरुजी हमारे घर पर आकर काका से बात किये ।काका ने वह हॉल बिना किराया लिये ही गुरुजी को दे दिया ।अब सभी हमारे घर पर सिखने आने लगे ।दो महिने के बाद फिर पुरानी बस्ती में मकान मिल गया तो वहाँ चले गये ।

हमारे घर पर घुंघरु की आवाज सुनकर लोग आ जाते थे ।सिंधी और महार जाति के लोग थे इसके अलावा गाँव की तरह हर जाति के लोग थे ।ठाकुर ,यादव ,ब्राम्हण ,कुर्मी ,नाई के अलावा मुसलमान भी थे ।इस घुंघरु के आवाज की उत्सुकता ने सभी को शांत ही किया ।किसी ने नृत्य को गलत नहीं समझा फिर एक शिक्षित परिवार के घर पर सीख रहे हैं जिसमें उसकी बेटी भी है तो सभी के विचार सकारात्मक ही रहे ।

मै तो नृत्य की ओर ही जाना चाहती थी पर इंसान की हर इच्छा पूरी नहीं होती है ।मेरे भी इस शौक पर ग्रहण लग गया ।दीदी तो जगह जगह भाषण देने जाती थी ।समाज के मंच पर भी जाती थी ।नाटक भी करती थी ।यह समाज के लोग जानते थे ।

हमारे घर पर कुछ लोग गांव से बैठने आये थे । उसी समय मै नृत्य सिखने के लिये निकलने वाली थी ।माँ ने कहा चाय बना कर जाना ।मैने पानी दिया ।चाय बना कर दी ।बुजुर्ग थे प्रश्न करना शुरु कर दिये ।कौन सी कक्षा में हो ? कौन से स्कूल में हो ? खाना बनाती हो ? अभी कहाँ जा रही हो ? मैने कहा " मै अभी नृत्य सीखने जा रही हूँ ।कत्थक सीखती हूँ ।"

"
नाचने के लिये जाती हो " यह शब्द मेरे कान में हथौड़े की तरह पड़ा ।नाच का मतलब मेरे लिये नाचा गम्मत में नाचना होता था ।मैने अपने बालमन से यही सोचा कि नृत्य तो कत्थक कथाकली भरतनाट्यम को कहते है ।मैने सोचा कि मै तो ये सब सीख रही हूँ नाचा का नाच तो नहीं ।मै कप प्लेट उठा कर पलटी ही थी कि उन्होंने कहा कि "मास्टर साहब की एक बेटी मच पर भाषण देती है अब दूसरी नाचेगी ।"

नाचना शब्द का हथौड़ा रह रह कर मेरे दिमाग में पड़ता रहा ।मै अपने केंद्र पहुंच गई ।परीक्षा की तैयारी चल रही थी । शाम को लौटने के बाद माँ को सब बात बताई ।माँ ने कहा गांव मे रहते है पढ़े लिखे नहीं है उनको क्या पता की नृत्य और नाच में क्या अंतर है ? तुम अपना सिखते रहो ।मैं जाते जाते परीक्षा के दिन नहीं गई ।मेरे लिये परिक्षक रुके थे बुलानेसभी आये पर मै नहीं गई ।

यह शब्द मेरे जीवन की सबसे बड़ी ईच्छा को निगल गया ।गुरु जी आये मुझे कहने लगे तुम्हें दूसरे सेंटर से परीक्षा दिला देंगे पर मेरा मन नहीं हुआ ।ग्यारह साल की बच्ची का दिल टूट चुका था उसे जोड़ने का प्रयास सालों चलता रहा ।वह स्कूल शांती नगर में भी खुला था ।तब मेरी शादी हो गई थी ।मेरे पति को पता चला तो वे कहत रहे कि अब सीख लो पर संयोग नहीं बना ।बेटे के होने के बाद बेटे के साथ सिखने जाने की जिद करने लगे ।पर हो नहीं पाया ।मेरा बेटा भी बहुत अच्छा डांस करता था ।

अब जब बेटा एम टेक कर लिया है तो मेरी जिम्मेदारी खतम हो गई है ।एक दिन इस टुटे दिल की बात निकल गई तो बेटा भी कहने लगा सीख लो पर अब पैर का दर्द सीखने में रुकावट बन गया है ।उस घटना के बाद मैने स्कूल कालेज में भी नृत्य में भाग नहीं लिया ।नाटक ही करती थी ।बी एड में जरुर गरबा किया था उस दिन मेरी होने वाली सास ने देखा था ।

यह इच्छा मरी नहीं मैने अपने बेटे में इसे जिवित रखा है हम लोग दोनों साथ बैठ कर टी वी का डांस रियलिटी शो देखते है वह मुझे क्लासिकल डांस लगा कर देखने बैठा देता है ।

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