रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 22


मैं अब आधा किलो मीटर भी नहीं चल पाती हूँ तो मुझे अपने पुराने दिन याद आने लगे है ।बचपन के ही नहीं अभी दो साल पहले तक तीन चार किलो मीटर आराम से चल लिया करती थी । पांच रुपये के आटो से पूरे रायपुर को नापा करती थी ।सारे साहित्यिक कार्यक्रमों मे उपस्थित रहा करती थी ।अब नहीं ।

दानी स्कूल जाने के लिये साढ़े छै बजे ही निकल जाती थी ।बूढ़ा तालाब की तरफ का गेट खुला नहीं रहता था ।मैं गेट पर चढ़ कर कूद जाती थी ।स्कूल में कोई नहीं आया है यह देख कर खुश हो जाती थी । मेरे बाद लोग आते थे ।

छुट्टी होने की घंटी बजते ही मैं तेजी से निकलती थी ।मेरी सहेली उषा गौराहा रुक कहती तो मेरा जवाब होता " जल्दी चल पहले निकलेंगे। " गेट तक आते क्ई बार पीछे पलट कर देखती थी की मेरे पीछे कितने लोग हैं और कितनी दूरी पर है ।मैं अपने घर ईदगाहभाठा तक दस से ग्यारह मिनट में पहुंच जाती थी ।

खेल के नाम पर दौड़ में ही भाग लेती थी ।चलने दौड़ने के अलावा हर काम में तेजी मुझे पसंद थी । मेरे इस तेजी पर लोग हमेंशा कुछ न कुछ बोलते थे । ग्यारहवीं में बिदाई समारोह में मुझे " हवा के साथ साथ , घटा के संग संग " टाइटल मिला तो सभी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी ।

पैदल चलना मुझे बहुत पसंद है । क्ई बार मैं चार पांच किलोमीटर पैदल ही चल कर आना जाना कर लेती थी ।अक्सर अपने देशबंधु प्रेस से आमापारा तक पैदल और भगतसिंह चौक से शंकरनगर पैदल ही आना जाना कर लेती थी ।

गणेश देखने पूरा रायपुर पैदल ही घूमते थे साथ में माँ भी रहती थी ।यह तेजी मुझे मेरे काका से मिली थी ।वह चलते कम और दौड़ते ज्यादा थे ।वह भी पैदल बहुत चलते थे ।साइकिल से अपने गांव पाटन तक करीब तीस किलोमीटर जाते थे ।जब यहां सेंटपाल स्कूल में पढ़ते थे तो गांव से पैदल रायपुर आते थे ।रायपुर में तात्यापारा के कुर्मी बोर्डिंग में रहते थे ।यहाँ से पैदल स्कूल जाते थे ।

काका जीवनपर्यंत चलना छोड़े नहीं ।बियासी साल तक चलना उनके जीवन का एक हिस्सा रहा ।मुझे अपने आप को देख कर लगता है कि मुझे क्यों सजा मिली ,किस गलती की सजा मिली कि मैं चल नहीं पा रही हूँ ।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें