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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 43


माँ में दया और प्यार तो इतना भरा था कि छलकने लगता था ।आपको सब बता चुकी हूँ कि वे बाटते रहती थी ।आठ सौ आम का आचार बनता था ।ईदगाहभाठा के मैंदान में रहने वाले देवार जाति के लोग और बंजारे ,बेलदार के ही काम आता था ।सब्जी ले नहीं पाते थे तो अचार मांगने आ जाते थे

बेलदार चक्की सीलबट्टा ऐसे ही रख जाते थे ।पंजाब के बजारे लोहे के सेव बनाने की मशीन ,चिमटा झारा ,आम काटने का सरौता वैगरह दे जाते थे ।बदले मे आचार या लाखड़ी की दाल लेते थे ।पुराने कपड़े के बदले बर्तन देने वाले जिन्हें बरनी वाले ही कहते है वे भी माँ के पास आते थे ।माँ गांव से रिस्तेदारों के कपड़े मंगा कर बदले में बर्तन लिया करती थी ।

घर में दस किलो उड़द की दाल की रखिया और कद्दू की बड़ी बनती थी ।पापड़ तो तीनो भाई बहन को देती थी ।चांवल के पापड़ ,कोड़्ई ,आलू चिप्स पीपे में भर कर रखती थी ।बस ये सब घर में कोई नहीं खाता था बांटने के काम आता था ।कभी बैठने वाले आ गये तो तल कर देते थे ।

मोहल्ले मे किसी के घर शादी है तो चार काठा याने सोलह किलो लाखड़ी देती थी गरीबों को ।उसे लोग हमारे ही घर के चक्की से दाल बना कर चुनी गाय के लिये छोड़ जाते थे ।किसी के घर मृत्यू हो गई तो भी वही चार काठा लाखड़ी देती थी ।एक कप गंगाजल देती थी ।कोई भी इलाहाबाद जाये माँ उससे गंगाजल जरुर मंगाती थी ।

किसी के घर बच्चा हुआ है तो बीस रखिया की बड़ी और एक कटोरी घी देती थी । माँ का दूध कम आता हो या बच्चे का पेट नहीं भर रहा है तो उसे एक पाव दूध मुफ्त में देती थी ।बच्चा बाहर का खाने लगता था तब बंद करती थी । गाय का घी माता निकलने पर भी शरीर में लगाने के लिये देती थी ।

माँ ने दूध कभी नहीं बेचा ।घर पर मेहमान आने पर चाय की जगह दूध देती थी ।दूध को अधरा रच कर पकाती थी ।गोबर के कंडे को छोटा छोटा तोड़ लेते हैं और उसे गोलाई में एक के ऊपर एक जमाते है ।बीच में कुछ जगह छोड़ देते है जिस पर मिट्टी का पात्र "दुहनी " को रख सकें ।अब बीच में आग जला कर दूध से भरे दुहनी को रख देते हैं ।दूध धीमी आंच मे धीरे धीरे पकता है ।धुयें की खुशबू और औटने के बाद का गाढ़ापन पीने मे बहुत स्वादिष्ट लगता है ।ठंडा होने के बाद गुलाबी रंग के दूध के ऊपर बहुत मोटी मलाई पड़ती है ।इसे माँ जमा दिया करती थी ।

दूध ज्यादा हो तो उसे भी जमा देती थी । दही को मथ कर मक्खन निकाल कर घी बनाती थी।बाकी बचे मठे को बेचा करती थीं ।दही मथने के लिये पांच फीट ऊंचा मथानी था ।दीवार पर दो लोहे के हुक थे ।बड़ा सा बांगा था ।एक दिन में मठा बिक जाता था ।

घर मे कुंदरु की बेल थी ।बहुत फल लगते थे ।भूंसा कीड़ा भी लग जाता था जिसे कम्बल कीड़ा भी कहते है ।इस कीड़े को मारने के लिये सर्फ का घोल उपयोग मे लाते थे । अमरुद अनार और नीबू भी थे ।माँ ये सब तोड़कर घर के गेट के पास एक टोकने में रख देती थी ।मोहल्ले के लोग आते जाते टोकना देखते ही अंदर आ कर जो रहता उसे अपनी जरुरत के अनुसार ले जाते थे । नीबू ही एक दो मांगने पर ही देती थी ।

माँ पूरे मोहल्ले की माँ थी ।गरीब तो उन्हें अपना हितैशी ही समझते थे । माँ जिस दिन खतम हुई तो क्ई घरो में चुल्हे नहीं जले ।एक ऐतिहासिक घटना हो गई कि उस दिन मारवाड़ी शमशान गृह मे जगह नही थी लोग रोड तक खड़े थे ।
दशगात्र के दिन छै लड़के रात के आठ बजे आये ।खाना तो बाहर रखे थे ।वे लोग घर में आ कर भाई बहु से कहते है भाभी जो भी हो थोड़ा सा प्रशाद खा कर जायेंगे ।हम लोग जल्दी कुकर मे खाना बनाये ।खाना बनते तक वे लोग आंगन मे जमीन में ही बैठ गये ।

पूरा मोहल्ला तो रोया ही मैदान में रहने वाले बंजारे भी आकर आंगन में बैठ कर रोते और चले जाते थे ।क्ई लोग तो अनाथ होने की बात करते थे ।बाजार मे सब्जी बेचने वाले भी आंगन में भीड़ लगा कर खड़े हो गये थे ।ऐसा प्यार और ऐसी श्रद्धांजलि हम लोग आज तक नहीं देखे हैं ।

आज कोई कुछ देता है तो बदले में कुछ लेता है ।कोई बिना कुछ लिये , बिना स्वार्थ के किसी की मदद नहीं करता पर माँ ने जो किया एक उदाहरण बन गया है ।आज हमें ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिलता ।यह तो शहर की बात है ।गांव भी इससे कोसों दूर हो चुका है ।माँ ने अपना प्यार और ममता दी बदले में उसे वही मिला ।

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