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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 16


नेहरु जी की बात चलते ही मुझे एक घटना याद आती है ।सन1963--64 में नेहरु जी रायपुर आये थे ।गांधीचौक में भाषण था ,उसके बाद चाचा नेहरु भिलाई जाने के लिये खुली जीप में निकले ।रास्ते में जगह जगह पर उनका स्वागत किया गया ।

सुबह की बात है ।हम लोग भी दर्शन करने के लियेआमापारा सेआगे ईदगाहभाठा के बुनकर सोसायटी के सामने खड़े थे ।रास्ते के दूसरी तरफ ठाकुर प्यारेलाल जी चन्द्रवंशी जी खड़े हुये थे ।

बांये तरफ हम लोग खड़े थे माँ काका मै और मेरा छोटा भाई मुन्ना ।वहीँ फर नल था ।नल में कुछ लोग पानी भर रहे थे ।एक यादव महिला "जामा जमुना की दाई " पानी भर रही थी ।वह क्ई घरो में पानी भरती थी

जीप ब्राम्हण पारा चौक पर आई ,वहाँ पर लोग स्वागत करने लगे ।हम सब लोग सावधान हो गये कि अब चाचा नेहरु आने वाले है ।हमारे पास एक महिला हार और गुलाल पीले चांवल थाली में लेकर खड़ी थी ।जीप आ कर हमारे सामने खड़ी हो गई ।बांई तरफ होने के कारण दूसरी तरफ के लोग भी इधर आ गये ।

सब लोग एक एक करके हार पहनाने लगे ।हमारे बाजू की महिला ने भी हार पहना दिया ।जामा जमुना की दाई तो आराम से पानी भरती रही ।उसके लिये शायद काम जरुरी था ।नेहरु चाचा ने अपने गले के हार को निकाल कर मुन्ना को पहना दिया और हम लोगों को हटाते हुये पीछे दाई की तरफ गये ।वह पानी की गुंड उठा कर सिर में रखने से पहले अपने घुटने पर रखी थी। चाचा नेहरु ने उस गुंड को उठा कर दाई के सिर पर रख दिया ।

सब मुस्कुराते ,खड़े देखते रहे ।पलटे और मुन्ना के गाल को छूकर प्यार किये और जीप में बैठ गये ।नीचे खड़े सभी ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और चाचा नेहरु ने भी हाथ जोड़कर नमस्कार किया फिर हाथ उठाकर अभिवादन किया ।गाड़ी आगे बढ़ गई ।नेहरु चाचा जीप में खड़े हुये थे ।

क्ई दिनों तक यही बातें होती रही ।एक पानी भरने वाली महिला की तकलीफ स्वागत से ज्यादा महत्वपूर्ण लगी ।इतनी तेजी थी कि बच्चे को प्यार किये और भिलाई के लिये निकल गये ।

आज के नेता सिर्फ फोटो खिचाने के लिये ही काम करते है । उस फोटो को सारे अखबार में छपना भी जरुरी है ।बिना प्रचार के कोई काम नहीं होता है ।

पहले ऐसा नहीं होता था ।जिन लोगों ने देश के लिये लड़ा था उनके मन में लोगों के प्रति प्रेम की भावना थी ।एक जुड़ाव था जो आज नहीं है ।

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