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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 37


काका अपने कालेज में भी बहुत सक्रिय रहते थे ।सुबह दस बजे पहुंच जाते थे ।कहाँ सफाई नहीं हुई है यह देखते थे ।सबसे बड़ी बात वहां का टॉयलेट देखते थे ।साफ न हो तो कहते "लाओ मैं साफ करता हूँ ।" पानी बराबर भरा रहना चाहिए ।एक पतला सा गमछा कालेज में रखते थे ।

मेरे भाई को खिलाने के लिये जो लड़का रखे थे उसे कालेज में आने के बाद चपरासी की नौकरी पर रख लिये थे ।काका के साथ वहीं रहता था ।उसका नाम कुंवरसिंग था । वह घर पर कुछ न कुछ लेने के लिये भी आता था ।
सेमिनार जब चलता था तो काका आठ बजे कालेज चले जाते थे ।सुबह नास्ता भी नहीं करते थे ।
एक माह का सेमिनार रहने पर भी काका अपने घर का खाना ही खाते थे ।दोपहर को बारह एक बजे कुंवर सिंग टिफिन लेने आता था ।वह एक बात रोज बोलता था "साहब दही और सलाद रखने बोले हैं ।"माँ चुपचाप रख देती थी ।काका पूरे समय घूम घूम कर सब का काम देखते रहते थे ।तरह तरह के चार्ट बनाना सिखाया जाता था ।टिचिंग एड पर सेमीनार होता था ।एक चार्ट मुझे आज भी याद है हिंदी विषय का था नौ रस पर ।इसमें रस के भाव को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया था ।विज्ञान के चार्ट भी होते थे ।हर विषय पर सुंदर चार्ट बनाते थे ।

रात को आठ नौ बजे आते थे ।हमारे घर में खाना सात से साढ़े सात बजे तक हो जाता था । हम लोग सो जाते थे ।काका को सुबह ही तैयार होते देखते थे ।माँ काका के बीच बात नहीं हो पाती थी ।कोई बिमार हो ,कोई मेहमान आये काका को किसी से मतलब नहीं रहता था ।कभी कभी "खान साहब " भी काका को लेने और छोड़ने आते थे ।"खान साहब "ड्राइवर थे उनका नाम पता नहीं सब उन्हें इज्जत के साथ खान साहब कहते थे ।काका उस समय "समन्वयक" हो गये थे तो जीप मिली थी ,उसी के ड्राइवर थे ।

कभी कार्यशाला, कभी सेमीनार चलते ही रहता था ।काका को शहर से बाहर भी जाना पड़ता था ।जब मैं हाईस्कूल में आई तो रात को देर तक पढ़ती थी और सुबह देर से उठती थी ।काका बैठक में पेपर पढ़ते रहते हम लोग अपना तैयार होते रहतेथे तो काका से बात किये क्ई दिन गुजर जाता था ।भाई रवि कभी कभी पूछता था कि काका कहां गये है? कब आयेंगे ? माँ कहती यहीं है बहुत काम है कालेज में तो जल्दी चले जाते हैं ।

यह सारा आक्रोश माँ कुंवरसिंग पर निकालती थी ।कभी कहती सब कालेज का खाना खाते है साहब कालेज का पैसा बचाते है? काका हमेंशा कालेज का सामान इधर उधर होने फर चिल्लाते थे ।स्कूल के जांच के लिये जातेथे तो कई गांव में रिस्तेदार थे पर कभी किसी को गाड़ी में नहीं ले गये ।स्वयं और ड्राइवर जाकर खाना खा लेते थे ।मिल कर आ जाते थे ।गाड़ी का पेट्रोल स्वयं के लिये कभी खर्च नहीं किये ।

माँ का सारा गुस्सा कुंवरसिंग झेलता था माँ ने पूछा ये सब के जाने के बाद क्या करते रहते है बड़ी दिलचस्प बात पता चली ।सब के जाने के बाद सारा समान स्वयं चेक करके रखते थे एक भी ब्रश रंग पेपर कम हो तो दूसरे दिन सबको ईमानदारी का पाठ ऐसा पढ़ाते कि गायब सामान दूसरे दिन आ जाता था ।

बस माँ ने कहा अब साहब चपरासी का काम भी करते हैं सरकारी सामान के लिये घर परिवार को छोड़ देते हैं ।अब साहब का बोरिया बिस्तर वही ले जा ।घर आने की जरूरत नहीं है ।कह देना अब टिफिन भी नहीं बनेगा ।सरकारी काम है तो खाना भी सरकार का ही खायें ।

उस दिन काका थोड़ी जल्दी आये पर घर में सन्नाटा छा गया ।अब काका चाय भी नहीं मांगते थे ।टिफिन के लिये कुंवरसिंग कुछ नहीं बोलता था ।माँ पूछती तो कहता था साहब ने कुछ नहीं कहा है ।

यह सन्नाटा काम कम होते ही खतम हो गया ।अब काका भी समझ गये थे के बच्चों को भी उनकी जरुरत है ।कई दिनों तक की दूरी ठीक नहीं है ।उनके इस काम के प्रति ईमानदारी हम तीनो भाई बहनों को विरासत से मिली है ।जिसे हम लोगो ने बनाय रखा ।आज कौन किसके लिये सोचता है ।हमारे काका बहुत संतुष्ट थे वे कहते थे मेरे बच्चों में अच्छी आदतें है मै अब सुख से मर सकुंगा ।यह संतुष्टी उनके चेहरे पर थी ।

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