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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 33


गणेश देखने का अपना मजा था ।पैदल पूरा शहर नापते थे ।छोटा से रायपुर में बहुत रौनक रहती थी अब भी रहती है पर अब इंसान से ज्यादा गाड़ियां दिखती हैं ।अब चकाचक रौशन शहर में इंसानियत नहीं रहती पर इंसान जरुर रहते है ।

छोटा सा रायपुर जहां पर दानी के घर का गणेश देखने गांव गांव से लोग आते थे ।उसकी सजावट के बीच छोटे से गणेश जी मुसकुराते रहते थे ।चारो तरफ दर्पण के साथ साथ बहुत से चित्र टंगे रहते थे ।सामने की पूरी दीवार पर सीढ़ियों की तरह बना रहता था ।हर सीढ़ी पर तरह तरह के सामान रखे रहते थे ।

कांच के बने खिलौने ,मिट्टी के खिलौने ,प्लास्टिक के खिलाैने ,टिन के खिलौने रखे रहते थे ।छोटे छोटे फूल गुलदस्ते रखे रहते थे ।सजावटी सामान से भरा रहता था ।क्रेफ पेपर को काटकर तरह तरह से सजाया जाता था ।पेपर फोल्डिंग से बने सामान रखे रहते थे । चकाचक लाइटिंग रहती थी ।इसके बाजू की गली में लोहार के घर का गणेश देखने लायक रहता था ।यहाँ पर अक्सर मछली रखते थे ।गणेश उपर में रखते थे ।यहाँ भी इसी तरह की सजावट रहती थी ।कुछ गमले में पौधे लगे रहते थे ।सामने जमीन पर एक टंकी बना उसमें लाल रंग की मछलियां रखते थे ।इसे देखने के लिये बहुत भीड़ रहती थी ।वहाँ से उनके घर के आंगन में जाते थेऔर दूसरे दरवाजे से बिहर आते थे ।पूरे दस दिन उनकी दुकान बंद रहती थी ।

इसी तरह से क्ई घरों में गणेश रखा जाता था । रास्ते में लोग बैठे रहते थे और देखने वाले वरामदे में रखे गणेश को देखकर आगे निकल जाते थे ।हम लोग चार पांच परिवार मिल कर देखने जाते थे ।सिर्फ महिलाओं और बच्चों का समूह ही रहता था ।

हम सब लोग समूह में ईदगाहभाठा से लाखेनगर से होते हुये पुरानी बस्ती पहुँचते थे ।यहाँ पर दानी के घर का गणेश देख कर आगे चले जाते थे बरीब तीन घरों मे गणेश रहता था उसे देखने के बाद क़काली तालाब की तरफ मुड़ जाते थे ।वहां परदो तीन गणेश रहता था ।ककाली मंदिर के पास एक गणेश रहता था ।उसके बाद सदर बाजार से होते हुये हलवाईलाइन फिर गोलबाजार के अंदर मंदिर के पास जाते थे ।यहाँ की झांकी देखने लायक रहती थी ।

यहाँ से शारदा चौक फिर एम जी रोड से फाफाडीह ,रेल्वेस्टेशन से होते हुये गंजपारा तक जाने के बाद थक जाते थे ।अब किसी घर के दरवाजे पर बैठ कर सुस्ताते थे तो उस घर के लोग पानी पिला देते थे ।क्ई घरो के लोग पानी के लिये पूछते रहते थे ।क्ई घर के लोग कुर्सी भी देते थे बैठने के लिये ।क्ई जगह पर दरवाजे पर खड़े लोग अपने घर के अंदर गणेश देखने बुलाते थे ।

यहाँ से निकलने के बाद हमलोग ब्राम्हण पारा आते थे ।यहां पर सभी दिन कुछ न कुछ कार्यक्रम होते रहता था ।यहाँ से विवेकानंद आश्रम के पास से घर आ जाते थे ।धीरे धीरे संख्या और दायरा बढ़ने लगा ।बाद में कार्यक्रम देखने भी जाते थे ।फाडीह और स्टेशन रोड में कवि सम्मेलन होता था ।उसे सुनने के लिये आसपास के गांव शहर के लोग भी आते थे ।हमारे घर दुर्ग भिलाई से लोग आ कर रूकते थे ।

एक अपनापन और प्यार दिखाई देता था ।आज मशीन की तरह देखने जाते है शायद कोई गिर जाये तो उसे कोई उठाने वाला नहीं मिलेगा ।श्रद्धा नहीं घूमने कर देख कर मंनोरंजन करने की जगह हो गई ।जैसे मॉल जाते है वैसे ही यहाँ पर भी घूमने आते है ।कार से नीचे उतरते नहीं है ।मूर्तियों का बढ़ना शायद यही बता रहा है कि अब श्रद्धा नहीं देखने की वस्तु है" गणेश "

मै क्ई वर्षों से गणेश देखने नहीं गई हूँ शायद यही कारण हो ।पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती सजावट और श्रद्धा के नाम पर बोझ ढोते लोग मुझे अपने उस गणेश से दूर कर दिये जो मेरे लिये देखने की चीज नहीं वंदनीय थे ।

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