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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 41


हमारे घर के पास ही सावित्री बर्छिहा दीदी रहती थी ।उन्हें सभी दीदी कहते थे ।वे अनंतराम बर्छिहा की बड़ी बहू थीं ।उनके पति का नाम वीर सिंह बर्छिहा था ।हमारे परिवार के बीच बहुत ही प्यार था ।मैं उनकी बेटी सरोज दीदी के साथ भी कभी कभी कालेज जाती थी ।

वे भी सिलाई कढ़ाई बुनाई में माहिर थीं ।इससे बड़ी बात हमें जीवन मूल्यों से जुड़ी बातें बताते रहती थी ।गरीबी में जीता पूरा परिवार का मन विचारों की अमीरी से भरा था ।कभी एक समय पोहा ही खा कर रह जाते थे पर किसी के आने पर बिना चाय के जाने नहीं देते थे ।छोटा सा कप और कम दूध की चाय में प्यार छलकते रहता था ।

हमारे समाज में महिलाओं के उत्थान के लिये बहुत काम की थीं ।पहले की सातवीं तक पढ़ी सावित्री दीदी की शादी में एक चरखा ही दिया गया था ।देश प्रेम की बातें सुनने को मिलती थी ।माँ के लिये वे माँ की तरह थी जो मानसिक सहारा देने को हमेंशा खड़ी रहती थी ।मैने अपने जीवन में उनको देख कर बहुत कुछ सीखा पैसे के बिना जीवन नहीं चलता पर कैसे खुश रहा जा सकता है ।मेरी माँ ने भी अपने कठिन समय में उनकी सोच को सामने रख कर ही आगे बढ़ी ।हम लोगों ने उन्हें इतनी गरीबी में जीते हुये देखा था कि दूसरा व्यक्ति उस हालात में दम तोड़ देता ।

उनके देवरानी की मृत्यु के बाद उनकी दो बेटियां भी साथ में आ गई थी ।एक फोटो स्टूडियो से ही घर का खर्च चलता था ।बड़ा बेटा नौकरी में गया पर सारा पैसा शराब में उड़ा देता था । सकारात्मक सोच से परिवर्तन आता है यह भी मैने देखा ।बहत जल्द अपना मकान बेच कर दूसरी जगह टिकरापारा मे बस गये ।धीरे धीरे स्थिती सुधर गई पर दीदी नहीं रही ।हम सब उन्हें याद करते है ।अनंतराम बर्छिहा स्वतंत्रता सेनानी का परिवार निकम्मे बेटो की वजह से जूझता रहा ।खेत बिक गये ।एक नारी की समझदारी ने अपने बच्चों को कितनी कठिनाई से खड़ा किया यह सभी को प्रेरणा देता रहा ।

माँ के जीवन में कुछ समय के लिये ही पर दीदी का साथ बहुत मायने रखा ।हम बच्चों को उनसे देश प्रेम की भावना भी मिली संस्कार संस्कृति की जानकारी भी मिली और जीवन के कठिन समय में लड़ने की प्रेरणा भी मिली ।

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