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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 24


तीज का त्योहार आ रहा है ।कपड़ों और चुड़ियों से पूरा बाजार सजा है ।आज तो हम लोग बाजार से चुड़ियां खरीद कर स्वयं पहन लेते हैं ।पहले ऐसा नहीं होता था ।चुड़ियों कि दुकान होती थी वहां पर जाकर चुड़ियां पहनते थे ।महिला और पुरूष दोनों चुड़िया पहनाते थे ।इनको तुर्किन कहते थे । आज भी गांव मे हाट या मेले में ये लोग चुड़ियां पहनाते हैं ।

तीज के पहले माँ चुड़ियां पहनने जाती थी ।रायपुर में चूड़ी लाईन में बहुत सी चुड़ियों की दुकानें थी ।अब कुछ ही दुकानें बची है।माँ जिस दुकान में चुड़ियां पहनती थी वह जमाल भैय्या की माँ की दुकान थी ।जमालुद्दीन भैय्या कालेज में दीदी के जुनियर थे ।

माँ चूड़ी पहनने जाती तो वह नमस्ते करती थी ।माँ को धीरे धीरे चुड़ियां पहनाती थी ।उसके बाद पहले की चुड़ियों को लकड़ी से तोड़ती थी । दोनों हाथों में इसी प्रकार करती थी ।हिंदूयों मे शादी के बाद हाथ बिना चुड़ियों के नहीं रखते है ।वह इस बात का पूरा ध्यान रखती थी ।

चुड़ियां पहनाने के बाद कहती थीं दो दर्जन पूरे हो गये ।अब सुहाग की चुड़ी पहनाती हूँ ।वह दो चुड़ी अलग से पहनाती थी ।सभी को गिनती की चुड़ी पहनाने के बाद दो चुड़ी सुहाग की पहनाती थी ।चुड़ी पहनाने के समय जितनी भी चुड़ीयां टूटती थी उसका हिसाब नहीं होता था ।आज भी गांव में बहुत से लोग चुड़ी तुर्किन से या कोई अन्य चुड़ी पहनाने वालों से पहनते है । आज दूसरे लोग भी यह धंधा करने लगे है ।

चुड़ी पहनाने के बाद माँ उनका पैर छुकर प्रणाम करती थींऔर वह माँ को तुम्हारी चुड़ी अमर रहे या सदा सुहागिन रहो कहती थी ।चुड़ी सुहाग की निशानी है ।चुड़ी पहनाना औरसुहाग की चुड़ी देनाउसके बाद आशिर्वाद देना यह हिंदू संस्कृति है ।पैर छुना भी हिंदू संस्कृति है ।एक तुर्क अपना धर्म भूल कर यहाँ की संस्कृति में रम गये थे क्यों ?व्यापार , व्यवसाय के सामने इंसान को अपना धर्म नहीं काम दिखाई देता है ।

यहाँ पर मुझे इससे ऊपर भी कुछ दिखाई दिया ।सम्मान , एक दूसरे की संस्कृति का सम्मान ।चुड़ी बेचना उनका धंधा है ।पर चुड़ियां तो हिंदू और मुसलमान दोनों धर्म में सुहाग की निशानी है । पैर छुना और आशीर्वाद देना हमारी संस्कृति है जिसे वे लोग आत्मसात कर लिये थे ।यहाँ के लोगों को भी वे अपने ही लगे ।

चुड़ियां फरीदाबाद फिरोजाबाद बैंगलोर में बनती है ।अधिकतर मुसलमान इस व्यवसाय से जुड़े हैं ।हिंदू और मुसलमान दोनों ही नहीं सोचते कि यह चुड़ियां कौन बनाता है और कौन पहनता है दोनों एक दूसरे के सामने आते ही सिर्फ चुड़ियों के बारे में सोचते हैं ।यह तीज और ईद इन चुड़ियों की खनखनाहट से खिलखिला उठती है ।

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