रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 18


संविधान में है कि हर व्यक्ति को वोट डालने की स्वतंत्रता है ।हमारे घर में यह स्वतंत्रता हमेशा रही ।क्ई घरों में पुरुष ने जिसे वोट डालने कहा उसे ही वोट डालते है ।इस मामले में हमारा घर एक अजूबा था ।

पिता जी का परिवार कट्टर कांग्रेसी रहा ।काका कुछ समय तक आर एस एस में भी रहे ।सभी खादी पहनते थे ।हमारे बड़े पिताजी हेड मास्टर थे वे खादी का धोती कुर्ता पहनते थे ।मामा जी भी हेड मास्टर थे वे भी खादी का धोती कुर्ता पहनते थे ।छोटे मामा जी भी खादी का धोती कुर्ता पहनते थे ।अनन्तराम वर्मा ,वोरा जी के लिये काम करते थे ।पूरी तरह से कांग्रेस को समर्पित थे ।दोनों परिवार का जीवन और वोट कांग्रेस का था ।

मेरी माँ न जाने कब और क्यों जनसंघ के लिये काम करने लगी ।बाद में जनता पार्टी के लिये ।इधर तो नेहरु जी को नाना जी का दोस्त और इंदिरागांधी को बहन कहती थी ।इमरजेंसी में मेरी दीदी की तकलिफ उनसे देखी नई गई ।वे साइंस कालेज में व्याख्याता थी ।हिंदी पढ़ाती थीं। एक साल का बेटा उसे छोड़कर दस से पांच तक कालेज में रहना पड़ता था ।शंकर नगर से साइंसकालेज तक के लिये कोई रिक्शा भी नहीं मिलता था ।उसे माँ के घर छोड़कर कालेज जाती थी ।मैं उस बच्चे को दो बजे कालेज लेकर जाती थी ।

बच्चे और माँ की पीड़ा ने माँ को कांग्रेस से दूर कर दिया ।बड़े पिताजी एक दिन हमारे घर आये थे तो माँ प्रचार के लिये निकल रही थी ।उन्हे प्रचार करने का शौक था साथ ही साथ सिंधी और महार जाति के बहुलता वाला मोहल्ला माँ की बात सुनता था ।बड़े पिताजी के प्रश्न वाचक चेहरे पर काका ने ताला लगा दिया ।उन्होंने कहा वोट डालने की और विचारों की स्वतंत्रता सभी को है ।उसे जो करना है करे मै दबाव नहीं डालूंगा ।बड़े पिताजी भी "हाँ "कह कर चुप हो गये ।मामा जी ने कहा कि बहन हम लोग कांग्रेस के हैं ऐसी बगावत क्यों ? माँ ने कहा जहाँ मेरी बेटी और उसका बच्चा परेशान हों ऐसे सरकार को बदलना जरूरी है ।

अब चाचा की मृत्यु ने इस वोट पर रुकावट डाल दी ।गांव मे भी वोट की बातें होती रही ।शाम को सारे पुरुष आंगन में बैठे थे ।दूसरे दिन वोटिंग थी ।अचानक माँ ने कहा कि "कल मुझे वोट डालने जाना है ,मैं वोट डालकर लौटती बस से वापस आ जाऊंगी"।घर का पूरा काम माँ की देखरेख में हो रहा था इसलिए सभी ने उन्हें रायपुर आने से मना कर दिया ।

एक वोट से क्या फर्क पड़ेगा कहते ही माँ ने कहा सत्ता पलट जायेगी ।"मैंने इतना काम किया है सब बेकार हो जायेगा ।मेरे जाने से मोहल्ले के लोगों को सहारा मिलेगा "।सब सिर पकड़ कर बैठ गये ।बहुत से रिस्तेदार भी आये थे ।अचानक काका ने कहा "मै सुबह सायकिल से जाकर तुम्हारे बदले वोट डाल दूंगा "माँ ने कहा कैसे विश्वास करूं कि तुम मेरी पार्टी को वोट दोगे ।सब चुप हो गये सन्नाटा छा गया ।

काका ने कहा मै ईमानदारी से इतने सारे लोगों के सामने कह रहा हूँ कि मै तुम्हारी ही पार्टी को वोट डालूंगा ।सभी चुपचाप खाना खाकर सो गये ।सन्नाटा बना रहा ।सुबह पांच बजे काका नहाकर रायपुर के लिये निकल गये ।दस बजे वोट डाल कर वापस गांव आ गये ।

दुख में भी खुशी की लहर थी ।वोट डालने की स्वतंत्रता की जीत हुई थी ।माँ खुश थी कि उसका वोट बेकार नहीं गया ।काका खुश थे कि उन्होंने पत्नी की इच्छा पूरी कर दी ।गांव के लोगों को एक उदाहरण मिल गया कि शिक्षक झूठ नहीं बोलते ।परिवार के लोगों ने देखा कि पत्नी के विचारों का सम्मान कैसे किया जाता है ।

पार्टी की जीत ने इस घटना को बहुत ही सम्मान से देखा ।मेरी माँ का सम्मान दोनों पार्टी के लोग करते थे ।कांग्रेस तो परिवार था ।माँ का दूसरी पार्टी में होना सरकार के गलत निर्णय के प्रति आक्रोश था ।

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