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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 23


खेल का नाम लेते ही मुझे मुन्ना ही याद आता है ।उसका नाम रविशंकर है ।उसने हिंदूस्पोर्टिंग मैदान का पूरा उपयोग किया । माँ उसे बाहर खेलने नहीं देती थी ।पर उसके पास इतने खिलौने थे कि आंगन में उसे खेलते देख कर बच्चे भीड़ लगा लेते थे ।सारथी , भोई, महारों की अधिकता के कारण ,बच्चा बिगड़ न जाये इस डर के कारण मुन्ना घर पर ही रहता था ।

बंगले में उसके लिये कुंवरसिंग नाम का एक लड़का रखे थे जो मुन्ना को गोद में लेकर घुमाता था ।बाद में उसे काका ने बी एड कालेज में नौकरी पर रख लिया था ।यहाँ पर वह अकेला हो गया था ।माँ ने मुझे उस पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी थी ।

हर खेल में मैं उसके साथ रहती थी ।पर पांच छै साल का हुआ तब उसे बाहर खेलने के लिये भेजना पड़ा ।कुछ बच्चों को घर पर भी बुलाना पड़ा ।मनुष्य सामाजिक प्राणी है उसे समाज में जाना ही पड़ेगा ।उसे फुटबाल का शौक था ।वही उसकी जिंदगी थी ।बगल में फुटबाल दबा कर ही चलता था , बाजू में फुटबाल रख कर खाना खाता था । क्रिकेट भी उतना ही अच्छा खेलता था । बड़े बच्चे खेलते थे तो दौड़ कर उनको फुटबॉल लाकर देता था ।अखिल भारतीय फुटबॉल मैच होता था तो उनके प्रेक्टिस के समय भी वहीं रहता था ।सब खिलाड़ी उसे पहचानने लगे थे बाद में बहुत ही अच्छा खिलाड़ी बना।

स्कूल में भी दूसरे स्कूलों के साथ मैच खेलने जाता था ।स्कूल की टीम में रहा ।कालेज में भी उसी प्रकार फुटबॉल खेलने जाता था ।दूसरे कालेज के साथ फिर विश्वविद्यालय की तरफ से दूसरे विश्वविद्यालय के साथ मैंच खेलने जाता था ।पर उसके जाने का और उसके दोस्तों के जानकारी मुझे ही रखनी पड़ती थी ।

काका बहुत खुश होते थे कि बेटा खेल रहा है ,बाहर जा रहा है ।वे कहते थे कि मै जितना अच्छा फुटबॉल का खिलाड़ी था उससे अच्छा हमारा कैप्टन था ।कोई भी खिलाड़ी बिमार नहीं पड़ता था , मै बारहवा खिलाड़ी था जो कभी खेल ही नहीं पाया ।वो बहुत खुश थे कि बेटा खेल रहा है और बाहर भी जा रहा है ।

बचपन में वह कैरम और बैडमिंटन भी उतना ही अच्छा खेलता था ।काका वॉलीवाल के भी बहुत अच्छे खिला थे ।चर पर सभी तरह का खेलने का सामान था रैकेट जाली ,कैरम ,हॉकी सभी कुछ घर पर था ।मुन्ना हॉकी भी खेलता था ।विश्वविद्यालय स्तर पर खेला है । मैहर खेल में उसके साथ रही ।

एक शौक और था ।पतंग उड़ाना ।इसमें मुझे पूरे समय उसके साथ रहना पड़ता था ।चकरी पकड़ना एक भारी काम था ।पहले तो मज्जा और पतंग खरीदते थे । बाद में आये दिन पतंग कटने और मज्जा की लम्बाई छोटे होने के कारण घर पर ही पतंग और मज्जा बनाने लगे ।

कांच का पाउडर खरीदते थे ।माँ आटा और रंग पका कर चिकी बनाती थी उसमें कांच का पाउडर डाल कर आटे की तरह तैयार करते थे ।पतंग के धागे को घर के दरवाजे पर पेड़ पर बांध कर ,आंटे से सोटा करते थे ।अच्छे से सुखने देते थे उसके बाद भाई खेलने भाग जाता था और मैं उसे चकरी पर लपेटती थी ।पर मुझे भाई का चेहरा आज भी याद आता है कि वह कितनी तन्मयता के साथ काम शुरु करता था ।

बाद में पतंग भी मैं ही घर पर बनाने लगी पास में ही कंड़रा रहता था टोकनी और पर्रा बनाता था उससे बांस ले आते थे ।मैं उसे काट छिल कर पतंग के लायक तैयार करती थी ।पांच छै साल वह पतंग और रैकेट, कैरम में व्यस्त रहा पर बगल में उसका फुटबॉल रहना जरुरी था ।उसके दोस्त कितनी देर तक चकरी पकड़ते भाग जाते थे तो जमीन पर चकरी रख कर पतंग उड़ाता था ।मुंह से कम बोलता था ।उसकी हरकतों से उसे समझते थे ।

माँ कहती कि जा उसकी चकरी पकड़ और मैं तुरंत भागती थी ।उसके सभी खेल में मैं भी पारंगत होते चली गई ।पतंग बनाना ,मज्जा बनाना ,कैरम ,बैडमिंटन,के साथ बॉलिंग करना ,फुटबॉल में हवा भरना ,पंचर बनाना सभी कुछ सीख ली ।

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