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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 51


दीदी का शोध का काम पूरा हो गया था ।सितम्बर 1970 में हिन्दी व्याख्याता पद के लिये पी एससी में साक्षात्कार के लिये इन्दौर गई थीं ।उस समय भी मै साथ थी ।दीदी की बेटी निवेदिता कुछ माह की थी ।पी एच डी थीसिस जमा हो चुकी थी । साक्षात्कार पी एस सी कार्यालय इन्दौर में था ।

हम लोग जीजाजी के कृषि महाविद्यालय के गेस्ट हाउस में रुके थे ।दीदी जीजाजी विवेक को लेकर सुबह ही चले गये ।मेरे पास अपनी ग्यारह माह की बेटी निवेदिता को छोड़ दिये थे । वहीं कैम्पस में एक परिवार था मैं उनके घर पर रही ।पूरे समय निवेदिता रोती रही ।चार बजे दीदी आई ।वे लोग बाहर से खाना खा कर आये थे । शाम को हम लोग किसी के घर चले गये ।दूसरे दिन शुक्रवार था ।मै उपवास रहती थी ।उपवास रखी थी और संतोषी माता की कहानी भी रखी थी , उस कहानी को पढ़कर पूजा की ।गुड़ चना भी रखी थी । प्रशाद चढ़ाई ।अगरबत्ती जला कर रखी थी ।थोड़ी देर के बाद जिनके घर पूजा कर रही थी उसने आकर मुझे पीछे से चिमटा और सामने रखी अगरबत्ती को हटा कर बोली मेरे भगवान को जला रही है ।मै कहानी पढ़ना बंद करके उसे देखने लगी । मेरा मन दुखी हो गया कि भगवान जी जल गये ।असल मे अगरबत्ती फोटो के कांच मे लग गया था ।

मेरी पूजा खतम हो गई ।मेरे पास निवेदिता फिर से आ गई । मुझे वह चिमटी याद आती रही क्योंकि उस जगह पर बहुत दर्द हो रहा था ।हम लोग उन्हीं के घर पर खाना खाये ।उसका व्यवहार मेरे से ऐसा ही रहा कि मै कोई बच्चा पाने वाली नौकरानी हूँ ।सब अपनी बातों मे लगे रहे मै विवेक और निवेदिता को लेकर कैम्पस में घुमाने ले गई ।शाम को हम लोग बी आर चंद्रवंशी के घर पर बैठने गये ।वे बाद मे रायपुर कृषि विश्वविद्यालय के डीन के पद से रिटायर हुये । अब वे मेरे भाई के ससुर भी है ।वहाँ से खाना खाकर हम लोग सांची के लिये निकल गये ।

सांची घूमना एक सपने की तरह था । कभी पाठ्यक्रम मे था उसे पढ़ने के बाद सामने से देखना सपना ही लग रहा था ।मै दौड़ दौड़ कर अपनी खुशी दिखा रही थी ।पूरा स्तूप अकेले ही घूम ली ।मुझे प्रकृति से प्यार है पहाड़ ,महल, खंडहर , नदी देखना बहुत अच्छा लगता है ।यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य मुझे बहुत ही अच्छा लगा साथ ही पढ़ी हुई जानकारी को सामने से देखा ।

हम लोग वापस सिहोर आ गये ।रायपुर से इन्दौर गये थे पर वापसी में सिहोर आ गये ।जीजाजी वहीं के कृषि महाविद्यालय में व्याख्याता थे ।वहाँ से दीपावली में रायपुर आये ।मुझे घर पर छोड़कर दीदी अपने ससुराल भाठापारा के पास बोड़तरा गाँव चले गये ।

पूरी यात्रा में मैं बहुत खुश थी ।वह चिमटी और नौकरानी के भाव की नजर मुझे चुभती रही ।दीदी का पी एस सी में चुनाव हो गया ।उन्हें सिहोर के शासकीय कालेज मे व्याख्याता की नौकरी मिल गई ।दीदी ने अपने ससुर को बताया कि उसे नौकरी मिल गई है ।नौकरी करुं या नहीं ? उनके ससुर ने कहा कि इतनी पढ़ाई करने के बाद तो नौकरी करनी ही चाहिये । दीदी को उसके ससुराल में बहुत ही इज्जत मिली ।दो जेठानी थी वे भी मानसिक सहयोग दी ।दीदी ने अपना काम शुरु कर दिया ।वे अपने ससुराल में मबके लिये प्रेरणा बनी आज उने जेठ की बहुये भी एम ए है ।शादी के बाद सबको पढ़ने के लिये प्रेरित करती रहीं।

वे अपने समाज में भी बहुतों की प्रेरणा बनी ।समाज में जब लड़कियां पढ़ती नहीं थी उस समय उच्च शिक्षा ग्रहण की , पी एच डी करने के बाद कालेज में पढ़ाने लगी ।समाज को एक दिशा मिली ।उनकी इस ऊंचाई तक पहुंचने में माँ काका का संघर्ष रहा उनके सास ससुर की उदारता रही , परिवार की सहमति रही ।आज कोई नहीं है पर यादें हैं ।समाज के सामने एक उदाहरण है ।आज भी दीदी लड़कियों की शिक्षा के लिये बहुत मदद करती है पैसे और पुस्तकों से मदद करतीं है ।वे अपना संघर्ष भूली नहीं है उनका प्रयास रहता है कि लड़कियो को आगे पढ़ने मे और व्यवसाय शुरु करने में मदद करती रहे ।यह काम निरंतर चल रहा है ।

मै हमेंशा दीदी के साथ रही हूँ ।उनकी उदारता देखते रहती हूँ ।मुझे इस बात की खुशी है कि मै उनके साथ हमेंशा ऐसे समय में साथ रही जब वे अकेली रहीं और उनको किसी की जरुरत महसूस हुई ।मेरे जीवन का सबसे खराब अनुभव रहा जब चिमटी काटी गई और नौकरानी का ऐहसास कराया गया ।मेरी दीदी के सामने यह अनुभव किसी कोने में दब गया ।मैने अपनी दीदी को कभी भी नहीं छोड़ा ।

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