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रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 20


आज बारह अगस्त है । 83 साल 7 माह और 12 दिन की मेरी प्यारी बुआ बिरझा देवी वर्मा का निधन हो गया। 1 जनवरी 1932 को उन्होंने ऐसे परिवार में जन्म लिया जहाँ शिक्षा को महत्व दिया जाता था । उनका अधिकतर समय मेरे माँ काका के साथ बीता था ।

मेरे काका जब डोंगरगढ़ में प्राचार्य थे तब भी उनके साथ रही । बाद में पाटन स्कूल से सातवीं की पढ़ाई पूरी कीं ।एक दिन अचानक काका ने उनकी शादी तय कर दी ।बड़े पिताजी बहुत नाराज हुये । एक ऐसे लड़के से शादी तय किये हो जो बाजार मे घूम घूमकर तम्बाकू बेचा करता है ।इतने गरीब परिवार में मेरी बहन कैसे रह सकती है।हमारे यहाँ सभी दाऊ परिवार की बेटियां आई हैं।हमारा परिवार बहुत सम्पन्न था ।बहुत अमीर परिवार की बेटियां बहु बन कर आई थी ।

काका ने कहा उस लड़के में कोई ऐसी बात तो है जो मुझे खिचती है ।वह एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा ।शादी हो गई । फूफा जी का नाम केशव राम था ।धीरे से धान किसानों से खरीद कर मंडी में बेचने लगे ।खेतों का रकबा बढ़ने लगा ।बाड़ी में सब्जियां लगाने लगे ।वहाँ पर कुआं बना कर पंप लगाया।कुछ साल वहाँ मछली भी पाले ।

अब उनके घर ट्रैकटर आ गया ।खेती में रमे हमारे फूफा जी राजनीति में भी आगे आये।संयुक्त परिवार को बुआ ने जोड़कर रखा ।आर्थिक स्थिती मजबूत हो गई थी पर बार बार पाटन क्षेत्र में पड़ने वाले अकाल दम तोड़ने लगती थी ।जेवर ही सहारा था इस कठिन समय में लड़ने का । बुआ और उनकी जेठानी जेवरों को ऐसे पहनती की किसी को पता भी नहीं चलता की दोनों एक कान में ही झुमका ( कर्ण फूल ) पहने हुये है ।
बुआ बहुत बुद्धिमान थी ।संस्कृति , समाज,और परिवार की जानकारी इतनी थी कि मैं उन्हें इनसायक्लोपिडिया कहती थी ।काका कहते थे कि हम लोग उन्हें आगे पढ़ाये होते तो वह डाक्टरेट करके किसी कालेज की प्राचार्य होती ।

अपने इस अधूरेपन को उन्होंने बच्चों को पढ़ा कर पूरा किया ।फूफा जी अपने बच्चों को आगे बढ़ाने के लिये हमेशा तत्पर रहे ।बड़ी बेटी की शादी ग्यारहवीं के बाद करने की पीड़ा हमेशा बुआ को रही ।पैसों की समस्या आती रही पर ईच्छा शक्ती ने उसे दूर भगा दिया ।आठ बेटे और तीन बेटियां सभी पढ़कर बहुत आगे निकल गये, दो बेटे एस डी ओ और एक रिलायंस हेड आफिस मुम्बई में महाप्रबंधक है एक बेटी गणित मे एम एस सी करके व्याख्याता है ।सभी अपने जमीन से जुड़े हैं ।

काका उस परिवार को देखकर बहुत खुश होते थे । माँ हमेशा कहती थी केशव मेहनती है और बिरझा बहुत ही समझदार है ।बड़े पिताजी हमारे घर आते तो यही कहते कि " मैने सोचा नहीं था कि केशव इतनी ऊंचाई तक जायेगा "। खेती के नये तरिके के साथ नई सोच हमेंशा अपनाते थे ।पूरे दिन मेहनत करते थे ।

बुआ का सम्मान उनके सभी बच्चों ने किया ।एक वर्ष से तबियत खराब थी पर सभी बच्चों ने दिल से सेवा की ।आज समय बदल रहा है ।वृद्ध आश्रम में लोगों की संख्या बढ़ रही है ऐसे समय में इस उम्र में एक माँ का संतुष्ट होकर जाना लोगों के लिये एक उदाहरण है ।छत्तीसगढ़ में यह समस्या अभी मुंह उठा ही रही है ।इसे मैने उन लोगों के लिये लिखा है जो परिवार को बोझ समझते है और भाई बहनों की जिम्मेदारी से भागते हैं ।

हम लोगों ने अपनी बुआ का हमेंशा सम्मान किया ।जीवन के संघर्षो से जुझने के बावजूद मुस्कुराते हुये अपने जीवन की यात्रा पूरी कीं।इस खूबसूरत यात्रा के मूकदर्शकों के लिये प्रेरणा बनी। नमन के साथ यही मेरी श्रद्धांजलि है ।

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