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रविवार, 1 मई 2016

कविता -अपनेपन का नशा

अपनेपन का नशा
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नींद का तो है नशा किसी को ।
किसी को है नशा पैसे का ।
दोस्त भी पिला रहा
दोस्ती का पैग
चढ़ रहा नशा अब दोस्ती का ।
दूर खड़ी प्यार भी
चढ़ा रही नशा
बिन पिये प्यार का ।
इसके सामने रह गये
सब नशे बेअसर।
अब चढ़ रहा नशा
भूमि में अपनों का
अपनेपन का ,
रहा न  कोई सामने
इस नशे के
न रही बोतल
न रहा गिलास
रह गया बस
अपनो का प्यार ।

सुधा वर्मा -15-1-2016

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