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रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे -93

अपूर्व तीन साल का हुआ तो उसको स्कूल मे भरती कराने की चिंता होने लगी ।हमारे घर के आगे ही अवंंतिविहार बन रहा था।पता चला कि वहाँ पर स्टेट बैंक वाले एक स्कूल बना रहे हैं क्योंकि वहाँ पर अधिकतर स्टेट बैक के लोग प्लाट खरीदे थे ।हम लोग उसे देखने कई बार गये ।बहुत बड़ा सा भवन था ।बहुत बड़ा मैदान था ।मुझे तो अपना बचपन याद आ गया जब मै दानी स्कूल मे भर्ती हुई थी ।इनको भी अपना गवर्मेंट स्कूल याद आ गया जहां पर बहुत बड़ा मैदान था ।हम दोनों ही खुश हो गये कि घर के पास पौन किलोमीटर पर एक बड़ा सा स्कूल है ,जहां पर खेलने के लिये बड़ा मैदान है ।अब हम लोग जनवरी से ही चक्कर लगाने लगे थे ।वहाँ आफिस बना।मार्च अप्रेल मे शिक्षकों का चयन शुरू हो गया ।मसीह मैडम प्राचार्य बन कर आ गई । हमलोग उनसे मिलकर खुश हो गये ।

अपूर्व को बार बार इस कारण ले जाते थे कि उसे वहाँ जाने की आदत हो जाये ।मै स्कूल से बहुत भागती थी तो मुझे डर था कि वह भी "नहीं जाता "न बोल दे ।स्कूल मे यूनिफार्म नही रखा गया था । उसे भर्ती करा कर आ गये ।मैडम ने उसे टॉफी दी ।सुप्रिया मैडम हमारे कलोनी में ही रहती थी ।अपूर्व के लिये बैग, छोटा सा टिफिन और पानी की बोतल लेकर आये।पहले दिन तैयार होकर स्कूल जाने के लिये स्कूटर पर बैठ गया ।उसके पापा छुट्टी ले लिये थे ।उसको उसकी कक्षा के अंदर तक छोड़ कर आये ।कुछ बच्चे रो रहे थे तो उनको देख कर अपूर्व सहम गया था ।पर उसे जल्दी से मैदान पार कर स्कूल के कमरे तक ले गये ।कमरे मे बहुत से खिलौने थे ,कुछ कुर्सी टेबल थे ।उसी समय प्लास्टिक की कुर्सियां निकली थी ।उस दिन वह कक्षा के कोने मे रखी लाल प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा तो जैसे वह कुर्सी उसकी हो गई।हर दिन उसी पर बैठता था एक दिन वह कुर्सी उसे नहीं मिली तो वह दिनभर खड़ा रहा और उस कुर्सी की ओर देखता रहा ।मैडम भी परेशान हो गई थी ।नया स्कूल और पहला दिन ,बैंक कर्मचारी ,सब अधिकार पूर्वक खड़े रहे ।बच्चो को लंच समय मे यहीं खिलायेगे।तो कोई कहता था कि बच्चा खेलेगा उसे देखेंगे ।बहुत मुश्किल से सारे पालक को मसीह मैडम ने  घर घर भेजा था ।

पहले दिन जब अपूर्व को लेने गये तो आने के बाद हमारा बेटा प्रश्नो के उत्तर देते  समय फेकना शुरु कर दिया था ।
"घूमा कि नही ।"
"हाँ ,पापा मै तो बाहर घूम रहा था ।"
"मैने एक बच्चे को डांट दिया ।"
उसकी बातें सुनकर बड़ा प्यार आ रहा था ।मैने सोचा अब "स्कूल नही जाऊंगा "नही बोल रहा है बल्कि अपनी ताकत को बता रहा है कि वह सब कुछ कर सकता है ।पहिली बार इतने बच्चों के बीच गया था ।एक माह तक एक ही जगह बैठता था ,खेलता भी नही था पर घर पर अपने कुछ किस्से जरुर सुनाता था जिसमे वह नायक रहता था ।मै उसे पैदल लेने जाने लगी थी ।वह आराम से चलते आ जाता था ।

एक दिन मुझे सामने से जाता हुआ रिक्शा दिखा ।उसमें बैठ कर अपूर्व को लाने गई ।वह रिक्शा इसको लाने ले जाने के लिये तैयार हो गया ।अब वह अरुण रिक्शे वाले के साथ जाता था ।उसके साथ उसकी क्लास टीचर बोस मैडम भी जाने लगी थी ।धीरे धीरे छै बच्चे और मैडम जाने लगे थे एक ही रिक्शे पर ।

अपने स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम मे उसने नृत्य किया था ।नाटक मे भाग भी लिया था।क्लास मे प्रथम भी आया था।
हर साल खेल, रांगोली,डांस ,नाटक मे बहुत उत्साह से भाग लेता था ।दो बार सौ प्रतिशत लेकर एवार्ड भी लिया ।पांचवीं मे मेरिट मे भी आया ।स्कूल मे उसे सभी शिक्षिकायें बहुत प्यार करती थी ।एक बार ट्यूशन पढ़ाने वाले बच्चे को आगे लाने के लिये मैडम ने इसे कप नही दिया ।असल मे उस साल उसे टाईफाइड हो गया था वह क्लास मे तीसरा आ गया था ।दूसरे साल जब वार्षिक  कार्यक्रम हुआ तो उसे कप न दे के ,बाद वाले लड़के को दे दिया गया ।वह मंच के नीचे मेरे साथ खड़ा था ।कार्यक्रम खतम हो गया था।सब जाने लगे तब मै प्राचार्य मसीह मैडम से बात की ।उसने कहा कल छुट्टी है परसो रिकार्ड देखती हूँ गलत हुआ होगा तो अपूर्व को कप मिलेगा ।तीसरे दिन प्रार्थना के समय सभी बच्चों के सामने प्राचार्य ने अपूर्व को कप दिया और सॉरी कहा ।उस स्कूल की यह बहुत बड़ी घटना थी ।एक दो बार उसे किसी खास विषय मे कम नम्बर मिलता था याने चार नम्बर तो भी मै सोचती थी ।पेपर लेकर मैडम के पास जाती थी ।उस समय इसके दोस्त ने बताया कि ट्यूशन के एक बच्चे को आगे लाने के लिये उस बच्चे को घर पर बुलाकर उत्तर पुस्तिका मे सुधार करवाती थी। पर्श मे उत्तर पुस्तिका लेकर घर आ जाती थी ।

स्कूल में वह भांगड़ा भी किया था। उसके नाटक डांस के सारे कपड़े मै ही सिलती थी ।सब इसका कपड़ा ले जाकर वैसे ही बनवाते थे।

हमारे घर से स्कूल जाने का रास्ता बहुत ही खराब था ।काली मिट्टी का रास्ता उस पर थोड़ी सी मूरम डाली गई थी ।इस रास्ते पर तीन कालोनी के घर थे ।उस रास्ते को बनाने का विवाद भी था कि कौन बनाये ।रास्ते मे एक नाला सा बन गया था ।कालोनी के एक तरफ के प्लाट का पानी दूसरे तरफ जाने के लिये अपना प्राकृतिक रास्ता बना लिया था ।इस पूरे खेतों का पानी छोकरा नाला की तरफ ही जाता था ।कालोनी बनने के बाद घरों के कारण पानी इधर उधर होकर जाने लगा था ।रास्ते का नाला बारहों महिने बहता था ।बारीश के समय तो घूटने से ऊपर पानी रहता था ।बहुत मुश्किल से उसे पार करते थे ।पहले साल तो पानी कम था क्योकि मैदान सा था।दूसरे साल से खतरनाक होने लगा ।कुछ पत्थर डाले गये थे फिर भी वैसे ही था ।रिक्शा वाला एक तरफ बच्चों को उतार कर पहले रिक्शा निकालता था उसके बाद एक एक करके बच्चों को निकालता था ।वापसी मे भी ऐसा ही करता था ।जब रिक्शा न हो तो स्कूटर बहुत मुश्किल से निकाल पाते थे ।एक बार अपूर्व पआनी मे गिर गया क्योकि स्कूटर डगमगा गया था ।पानी की बोतल पानी मे बह गई ।पूरी पुस्तकें पानी मे भीग कई थी ।उस दिन वापस आ गये ।दूसरे दिन गाड़ी वही पर छोड़कर पैदल रेनकोट पहन कर छोड़ने गये ।

इस जगह का नाला पच्चीस साल तक खतरनाक ढंग से बहता रहा ।अब उस जगह पर बड़ा सा पक्का नाला बन गया है ।रास्ता भी कांक्रीट का बन चुका है ।कई बार बहुत बारीश होती थी तो उसके दोस्त दीपक दिनेश की मम्मी अंजू उसे अपने घर ले जाती थी ।अपने बेटे के कपड़े पहना कर अपने घर पर खाना खिला कर रखती थी।यह रास्ता आने लायक नही रहता था तब ।रात को जब इसके पापा बैंक से आते हुये उसे लेते आते थे ।कभी कभी दीपक दिनेश के पापा दोपहर को खाना खाने आते थे तो वापसी मे उसे छोड़ते जाते थे।इस तरह उसका आठवीं तक का स्कूली जीवन बहुत कठिन होते हुये भी मजेदार था ।

अपूर्व को पानी से खेलना बहुत अच्छा लगता था ।वह चौथी कक्षा से छोटी सायकिल मे स्कूल जाने लगा था । तब भी कई बार बैग गिराया तो कभी वाटर बॉटल ।कभी कभी सायकिल लेकर छोकरा नाला तक चला जाता था ।कभी पानी मे उतर जाता था ।वह एक बार नाले का पानी पी लिया था गले तक के पानी मे चला गया था।पानी के बहाव मे बहने लगा था ।उसके दोस्त ने उसे खिचा था ।यह बात पता चलने के बाद मै उसे बारिश मे बाहर जाने नही देती थी ।

अपूर्व को कहानी सुनाने का बहुत शौक था ।उसकी कहानियां उसके दोस्त बहुत चाव से सुनते थे ।सब दोस्त कालोनी मे ही रहते थे ।एक दोस्त बहुत दूर माना की तरफ रहता था ।उसकी माँ वकील  है और पिताजी भा ज पा मे काम करते हैं ।उस बच्चे के पास घर की चाबी रहती थी ।उसे घर जाने की जल्दी नही रहती थी ।अपूर्व अपनी कहानियां सबको सुनाता था पर छुट्टी के बाद स्कूल के बाहर खड़े होकर ये शुभम तोमर को कहानियां सुनाता था।अपूर्व अपने पापा के साथ जासूसी फिल्मे ,डरावनी फिल्मे बहुत देखता था ।अपूर्व कभी किसी चीज से नही डरता है।वह अपने दोस्त तोमर बहुत सी कहानियां सुनाते रहता था ।कभी स्कूल से घर जाने  को बोलते थे तो स्कूल से आगे जाकर दोनो चौक मे खड़े हो जाते थे और वहां पर सुनते सुनाते थे ।मै फोन कर करके उसके दोस्तो से पूछते रहती थी ।उसके दोस्त खाना भी खा लेते थे ।खाने के बाद उसको खोजने निकलते थे । एक बजे छुट्टी होती तो वह तीन बजे तक घर आता था ।अब तो रिक्शे मे जाना ही नही चाहता था ।रात को उस कहानी को एक कापी मे लिखता था ।उसके पापा बहुत खुश होते थे और कहते थे गाने मै लिख द़ूंगा ।पैसा कहां से आयेगा यह सोचकर अपने गुल्लक मे पैसा जमा करता था ।एक से एक पात्र कभी भूत तो कभी एलियंस ,कभी खूनी सब के ड्रेस और हथियार के स्केच भी बनाकर रखा था।वह सब वहीं खतम हो गया ।

आठवीं तक ही उस स्कूल मे पढ़ पाया ।आठवीं की परीक्षा के पहले उसके पापा नही रहे ।स्कूल दसवीं तक ही था ।उसे मै दूसरे स्कूल मे भर्ती करने का सोचने लगी थी ।वह स्वयं मुझे सम्भालता और बिना पढ़े ही आठवीं की परीक्षा दिया ।पास मे ही एम जी एम स्कूल था वहाँ से फार्म लाकर पूछ पूछ कर भर लिया मुझसे दस्तखत करा लिया और जमा कर दिया ।फीस भी ले जाकर जमा कर दिया ।स्कूल खुलने के पहले मुझे स्कूल दिखाने ले गया और आफिस के सामने खड़ा होकर कहता है "माँ तुम कुछ बात कर लो "मै आफिस के एक काऊंटर पर पूछ ली "किताबें और यूनिफार्म कहाँ से मिलेगी ?" किताबें स्कूल से देंगे और यूनिफार्म बाजार से लेना पड़ेगा " बोले ।अपूर्व के चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था ।पापा हैं नही और सारा काम वह पापा के बिना कर लिया है ।सच मे मुझे भी लगा बच्चा समझ कर जिसे डांटते थे वह अपने पापा के जाने के बाद बहुत बड़ा हो गया था ।

इस स्कूल मे भी वह खेल को छोड़कर सभी प्रतियोगिता मे भाग लेता था ।दसवीं मे वह राष्ट्रीय स्तर की पेंटिंग प्रतियोगिता मे द्वितीय आया था ।"केमल "की तरफ से हुआ था ।यहाँ भी नृत्य करता था ।कई ईनाम लेकर आया ।ग्यारहवी मे एक गणित शिक्षक से परेशानी हो गई तो वह घर आते ही बोला "गधे गधे टीचर आते है ।गणित आता ही नही और गणित पढ़ाने के लिये रखे है ।कुछ भी पूछो तो कल पढ़ कर बताता हूँ कहते है ।"मैने उसे डांटा क्योंकि एक शिक्षक परिवार के होने के कारण" गधा "शब्द मुझे चुभ गया था ।

दूसरे दिन जाकर प्राचार्य से बात की ।वे बच्चों को बुलाकर बात किये ।सब बात सुनने के बाद प्राचार्य ने कहा कि वह गोल्ड मेडेलिस्ट है करके रखे हैं ।मैने कहा सर कोई जरुरी नही कि गोल्ड मेडल लिया है तो अच्छा पढ़ायेगा ।थर्ड डिविजन वाला ज्यादा अच्छा पढ़ा सकता है ।सर ने मेरी बात मान ली और तुरत उस टीचर को बुलाकर कह दिया कल से आप नहीं पढ़ायेगे ।सब बच्चे खुश हो गये और तीसरे दिन एक नया टीचर आ गया।

आराम से अपूर्व बारहवीं निकल गया ।पर पहला स्कूल जिसका नाम विद्या निकेतन था वह दिमाग से नही निकला ।अपूर्व आठवीं के बाद निकला पर वह उस स्कूल मे जाकर मैडम से मिल लेता था ।दो साल के बाद स्कूल बंद हो गया ।ऐसा लगा जैसे इसी के लिये स्कूल खुला था ।स्कूल तो बंद हो गया पर ये बच्चे जो पहला ग्रुप था उस स्कूल का आज भी उसे देखने जाते है जो खंडहर की तरह हो रहा है ।शिक्षको के द्वारा बच्चो से भेदभाव करने के कारण बच्चे कम होते चले गये अंत मे स्कूल को बंद करना पड़ा ।

आज ये बच्चे अपने एक बड़े मैडम के साथ विद्या निकेतन ग्रुप बना कर बाते करते है ।एक बच्चा मर्चेंट नेवी मे है ।कहानी सुनने वाला बच्चा शुभम तोमर वकील बन चुका है ।उसके जुड़वा दोस्त दीपक और दिनेश सीमेंट का धंधा करते है एम बी ए कर चुके है ।विद्या निकेतन की सुनहरी यादें बच्चो के साथ हम पालको की भी है ।इतना अपनापन हम लोग अपने पढ़े स्कूल मे भी नही पाये थे ।इस स्कूल  को बच्चो के साथ साथ पालको ने भी अपना समझा ।

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