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रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे -98

पूरी से आने के बाद हम लोग अपूर्व को डाक्टर अनूप वर्मा  के पास ले गये ।वे अपूर्व को अठारह दिन का था तब से देख रहे थे ।उन्होने अपूर्व को देख कर बोले कि जब फिर से बुखार आयेगा तब देखेंगे ।अभी ठीक है ।समुद्री हवा किसी किसी को सहन नही होती है तो तबियत खराब हो जाती है ।हम लोग वापस आ गये ।

मुझे याद आने लगा वह समय जब अपूर्व पैदा हुआ था तो हम लोग बी सी जी के टीके के लिये कई डाक्टर और हास्पिटल के चक्कर लगाये थे ।हम लोग डाक्टर शंकर दुबे हड्डी रोग विशेषज्ञ के नर्सिंग होम मे गये ।वे हमारे परिचित थे और वहाँ पर शिशुरोग चिकित्सक का नाम भी लिखा था ।वहाँ पर डाक्टर नही थे तो हम लोग आ गये ।दूसरे दिन काका पूछने गये तो पूरी जानकारी लेकर आये ।वे पुराने सिविल सर्जन जी पी श्रीवास्तव के नाती थे ।वे उसी घर मे रहते थे जहां पर डाक्टर जी पी श्रीवास्तव जी रहते थे ।वे हमारे नाना जी के परिचित थे ।दुर्ग मे सिविल सर्जन थे ।अब तो माँ बहुत खुश हो गई ।शाम को अपूर्व को लेकर गये तो डाक्टर ने कहा कि उसे बैरन बाजार के घर पर लाना पड़ेगा ।वहीं बी सी जी का टीका लगेगा ।दूसरे दिन हम लोग वहाँ गये तो दो लोग थे ।वहाँ पर बंगले के पीछे छोटा सा क्लिनिक था ।एक कम्पाऊ़डर था ।वहाँ पर अपूर्व को टीका याने इंजेक्शन लगा ।हमलोग फीस पूछे तो बीस रूपये बोले पर पैसा नही लिये।हम लोग लौट गये ।पर उस बंगले मे मै छोटी थी तो जाती थी वह सब याद आने लगा ।मुर्गी का दड़बा ,एक पानी की टंकी मे लगा फव्वारा ।बड़ा सा बगीचा ।

अब वही डाकटर हमारे अपूर्व के डाक्टर बन गये ।अब तो हर महिने जाने लगे ।तबियत खराब न हो तो भी उसे दिखाने ले जाते थे ।एक दो बार काका भी साथ मे गये थे ।एक और अनोखा सा सम्बंध था।मेरे नाना जी का परिचय जी पी श्रीवास्तव जी से दुर्ग मे हुआ था,जब वे वहाँ पर सिविल सर्जन थे।नाना जी अपने नाती लोगो को घोड़े पर बैठा कर हैजे का टीका लगवाने ले जाते थे और साथ मे "कारी कमौत चाँवल" भी ।चाँवल देकर टीका स्वयं को लगा दो कहते थे ।हा हा हा ।मामा जी रेव्यूनी इंस्पेक्टर थे उनसे डाक्टर श्रीवास्तव जी से दोस्ती हो गई थी ।जब हम लोग चायपत्ती बंगले में थे तभी कटोरातालाब  रायपुर में उनका घर बन रहा था ।मामा जी आते तो उनके बंगले को देखने जाते थे ।जब वे लोग रहने आ गये तब माँ की तबियत खराब हो तो वहीं दिखाने जाते थे ।मामा जी जेठू राम मढ़रिया भी और चाचा जी दानी राम वर्मा जी भी वहीं दिखाते थे ।मेरा भी ईलाज डा. श्रीवास्तव अंकल ने किया था ।अपूर्व वहाँ जाने वाला चौथी पीढ़ी का था ।

डाक्टर अनूप वर्मा जी काका को देखकर पहचानने की कोशिश जरुर कर रहे थे ।काका कांकेर और चारामा स्कूल को देखने जाते थे तब वहीं स्कूल मे ही देखे रहे होंगे ।काका कांकेर बहुत जाते थे ।डाक्टर साहब का परिवार वहीं रहता था ।एक और मजेदार बात याद आ रही है कि डाक्टर साहब की माँ की शादी जब हुई थी तो देश के अलग अलग जगह से आने वाले डाक्टर हमारे बंगले मे रुके थे ।उन्हे मेस मे ही खाना बनवा कर खिलाये थे ।पर डा. श्रीवास्तव अंकल मेरे काका को देखकर पूछते थे तो अपना परिचय देते थे "मिसेज वर्मा आती हैं उन्ही के वर्मा जी "हा हा हा हा ।

अपूर्व को जब वह दो साल का था तब पहिली बार दीपावली के दिन फटाके से एलर्जी  हो गई।पूरे शरीर मे चींटी के काटने जैसे निशान पड़ गये और वह खुजाने लगा ।रात को आठ बजे डाक्टर के पास ले गये ।वे निकल ही रहे थे पर लौट कर देख लिये ।यह सिलसिला हर साल हो गया था ।वह बाद मे फटाके चलाना छोड़ दिया।एक बार बहुत तेज बुखार आ गया ।डाक्टर साहब बाहर गये थे ।हम लोग होमियोपैथी दवाई दे दिये ।पर बुखार उतरा ही नही ।पूरी रात जाग रहे थे ।मै डरते हुये सुबह चार बजे मोबाइल पर नम्बर लगाई ।वे तुरंत उठा लिये और टेस्टीमॉल देने बोले ।पूरे शरीर को ठंडे पानी से पोंछने के लिये बोले ।अपूर्व को जैसे उनकी दवाई का ही इंतजार रहता था ।वह शाम तक ठीक हो गया ।

तीन माह होते ही वह बुखार मे पड़ जाता था कोई भी दवाई दो उसे असर नही होता था ।पर डाक्टर साहब के पास ले जाते ही ठीक हो जाता था ।मेरे पति ने डाक्टर साहब से कहा ये हर माह मे आओ और फीस दो ये अच्छा नही लगता आप सालभर का एकमुश्त फीस जो भी हो रख ले और इसे हर माह देखा करें ।वे हंसने लगते थे ।अपूर्व डाक्टर साहब को देखकर ही खुश हो जाता था ।वह तो उसका दूसरा घर बन गया था ।हर माह बिना बिमारी के एलर्जी के कारण दौड़ लगते रहता था ।बाद मे तो बाहर जाने के पहले डाक्टर साहब से बहुत सी दवाईयाँ लिखा लेते थे और खरीद कर ले जाते थे ।

उसे परीक्षा के पहले बुखार जरुर आता था पर वह डाक्टर के कारण हमेशा जल्दी ठीक हो जाता था ।उसके पापा कहते थे कि इसको डाक्टर साहब से मिलना जरुरी रहता है ।इस करण परीक्षा के पहले मिला ले ।हम लोग कई बार ऐसे ही चले जाते थे कि बस दिखाने आये हैं ।कई बार पैसा लेते थे कई बार वापस कर देते थे ।अपूर्व के पापा के जाने के बाद  अपूर्व की तबियत और खराब हो गई ।वह घर पर नही आना चाहता था ।वह अतिंम समय पर था तो उसे ऐसा लगने लगा था कि उसकी सांस भी रुक जायेगी ।हम लोग उसे रात को लेकर गये पर डाक्टर बाहर गये थे ।रात को दूसरे डाक्टर को दिखाये तो उन्होंने कहा कि इसे अपने फैमिली डाक्टर को दिखायें ।इसे कोई बिमारी नहीं है ।हम लोग रास्ते मे घूमते रहे दो बजे लौट रहे थे तब एकता नर्सिंग होम मे चले गये ।उसे इमरजेंंसीं मे देखे बहुत सी जांच किये फिर बोले कल पूरा चेक अप करेंगे भर्ती हो जाओ।मै तो घबरा गई और कल आयेंगे बोल कर वापस घर आ गये।

अपूर्व अपने पाठक अंकल के घर पर सो गया।पाठक जी हमारे घर के पास रहते है ।वे मेरे पति के दोस्त है और साथ मे काम करते थे ।दोपहर को बारह बजे मै लेकर आई ।शाम को हम लोग मेरे जीजाजी के साथ डा. अनूप वर्मा के हॉस्पिटल गये।उन्होने उससे अकेले मे बहुत सी बात की ।बाद मे मुझे डा. ने कहा कि इसके लिये आप ही डा. है ।आप के ऊपर है आपक्षठीक करे या बिमार ।आप घर पर जो भी वर्मा जी की फोटो है उसे हटा दें ।यह ठीक नही है ।मैने कहा हाँ मे एक फोटो रखी हूँ जिसके सामने एक दिया जलाती हूँ ।उन्होने कहा यह सब उसके दिमाग पर असर कर रहा है । इसको मनोरोग को दिखाना ठीक नही है ,उसकी दवाई से वह स्कूल जाना बंद कर देगा ।अभी पंद्रह दिन की दवाई देते है।उसमे एक नींद की गोली भी थी ।वह एक माह स्कूल नही गया ।धीरे धीरे सामान्य हो गया ।जब भी डा. के पास गया ,उन्होंने बहुत आत्मियता से उससे बात की ।एक दिन वह सुबह तैयार होकर अपने आप स्कूल चला गया ।बाल भी नही बनाया था ।मै बनाती थी पर मै भी तबियत और मानसिक वेदना से आठ बजे तक उठती थी.।

वह अपना एक माह का होम वर्क भी रात को बैठ कर पूरा कर लिया ।अब वह तबियत खराब होने पर मुझे हीरोपुक पर बैठा कर ले जाता था।हम दोनो एक दूसरे को देखते थे ।हम दोनों को डा. अनूप वर्मा देखते थे ।अब वह दोस्तों के साथ भी चला जाता था ।उसे डाक्टर साहब चौबीस साल की उम्र तक देखे ।वह जब भी जाता है तो उससे बहुत बात करते हैं ।सबसे बड़ी बात फीस वापस कर देते हैं ।आज भी हम लोग डाक्टर को नही भूले है ।

यह चौथी पीढ़ी ऐसे ही वहाँ नही गई ।विश्वास के साथ साथ डाक्टर का व्यवहार भी मायने रखता है ।वह समय याद आ रहा है जब घर आने की पाँच रुपये फीस थी तब कभी कभी डा. जे डी झा तात्यापारा वाले हमारे घर आ जाते थे ।और फीस की जगह एक गिलास दूध पीते थे ।वह भी एक परिवार बन गया था ।उसकी बड़ी बेटी आभा मेरे साथ ही पढ़ती थी ।डा . गोस्वामी प्राचार्य आयुर्वेदिक महाविद्यालय के भी हमारे घर आ कर माँ के लिये दवाई बनाते थे ।डा. बी सी गुप्ता होमियोपैथी ,बूढ़ापारा से भी हमारे घरेलु सम्बंध बन गये थे ।उन्होंने जब फीस लेनी बंद कर दी तो काका अपने खेत के दूबराज चाँवल दिया करते थे । डा. कुलश्रेष्ठ आयुर्वेदिक महाविद्यालय के संचालक से मी घरेलु संबंध
है।इन सबमे डा. अनूप वर्मा मे मैने कुछ अधिक सेवा भाव देखा है ।वह अपनी जिम्मेदारी समझते है ।पैसा लेने कोई बाद कोई मतलब नही है ऐसा भाव नही दिखाई देता है ।किसी बच्चे को सूई लगाते मै नही देखी थी ।मेरे बेटे को भी चौबीस साल मे कभी सूई नही लगी ।जब मरीज की छुट्टी होती है तो वह पैसा दिया या नही इस पर वे बिल्कुल ध्यान नही देते है ।जो करना है सिस्टर करती है ।यदि वह बोले तो मैने दो बार यह सुना जाने दो दे देंगे पैसा ।

एक खुशमिजाज ,बिंदास व्यक्तित्व जिसे एक बच्चा देखकर रोने के बजाय हंस दे ।मुझे ऐसा लगा कि वास्तव मे उन्हे बच्चों से प्यार है इस कारण शिशु रोग चिकित्सक ही बने ।एक पैसा कमाने के लिये बनता है ,एक सेवा के लिये बनता है एक दोनों के साथ तालमेल बैठा कर अपने अपनी रूची को अंजाम देता है ।जहाँ पर मन का सूकून है ।हमे भी खुशी होती है ,एक ऐसे इंसान को डाक्टर के रुप मे पाकर । आज भी अपूर्व को बुखार आता है तो कहता है ।डा. अंकल को दिखा दूं ।उनसे हमने दूसरे डा. का नाम लिये है जिन्हे अपूर्व को दिखा दें ।पर हम लोग उन्हे भूल नही पाते ।मुझे मेरे डा. श्रीवास्तव अंकल याद हैं और अपूर्व को उसके अनूप वर्मा डा. अंकल ।दोनों एक ही परिवार के है ।शायद यह यादें पूरी जिंदगी रहेगी ।

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