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रविवार, 1 मई 2016

कविता -तर्पण

तर्पण --
पिता का कर त्याग
खुशियां मना रहा
पिता गये हरिद्वार का ढोल बजा रहा ।
पांच वर्षों बाद एलान हुआ
पिता ने तोड़ा दम हरिद्वार में
शोक नहीं मनाना है
जो आता है उसे जाना ही है
गीता ने हमें बताया है
आत्मा अमर है ।
पिता जी अमर है
खाना पीना तो फिजूल खर्च है।
पर हर वर्ष होता एक आयोजन
पित्रपक्ष पर गरीबों का भोजन ।
एक दिन पिता ने सोचा
देख आऊं बेटे को
हो अब रंजीस दूर ।कुछ पल जी लूं बच्चों के संग ।
पिता खड़ा द्वार पर
बेटे ने पहचाना नहीं
था उस दिन भोज वहाँ
पंक्ति में बैठ पिता ने
अपने बेटे के हाथों से खीर पूरी पाई ।
बेटे ने कहा सबसे
मेरे पिता कि आत्मा को शांति मिले ,
दुआएं देना
मुझे और कुछ नहीं चाहिये
पिता के मन की शांति चाहिए ।
बेटे के हाथों से खीर पूरी ले तृप्त हुआ मन ।
पिता के अश्रु लगे झरने ।
बेटे ने पूछ लिया , कुछ और चाहिये ?
पिता ने कहा नहीं तुम मुझे मेरा बेटा नहीं दे सकते ।
बुझे मन से लौट गया
पित्र पक्ष का पितर
जिवित ,पर
मन को आंसूऔं के तर्पण से भिगोता
फिर निकालता  , फिर डुबोता
जैसे मन नहीं , काला तिल हो
वह पिता
काला तिल हो / वह पिता ।
सुधा वर्मा , रायपुर
5-10-2015

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