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रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे - 87

अब हम लोग गीतांजली नगर मे रहने लगे है तौ वहीं की बात करेंगे ।वहाँ पर हमारे घर के बाजू के मकान मे कुछ मजदूर रहते थे ।वहाँ एक महिला थी जो मिस्त्री का काम करती थी ।मैने पहली बार एक महिला मिस्त्री को देखा थी।उस घर मे एक परिवार और रहता था ।जिसे महराज महराजिन कहते थे ।महराज दिखने मे बहुत ही सुंदर था ।कंधे तक उसके बाल थे।लम्बा टीका लगाता था ।मजदूरी करता था ,कुली का काम करता था ।उसकी पत्नी साहू थी ।उनकी शादी नही हुई थी ।

एक दिन मैने  महराज से पूछा कि कहाँ के रहने वाले हो ?पंडित होकर कुली का काम करते हो ? उसने बताया --"मै बहुत छोटा था तब हमारे गांव मे सर्कस आया था ।हम लोग गरीब थे ।मुझे जानवरो से बहुत प्यार था ।वे लोग मुझे पूछे कि सर्कस मे काम करोगे तो मैने हाँ कह दिया ।मै वहाँ पर बर्तन साफ करता था ।साथ ही जानवरों को खाना और पानी देता था ।बहुत जल्द जानवर मेरे से घुलमिल गये ।अब मै रिंग मास्टर के साथ रहने लगा ।कभी तोते का खेल दिखाता तो कभी हाथी के साथ खेल दिखाता था ।धीरे धीरे मै शेर तक पहुंच गया ।कई सालों तक शेर का रिंग मास्टर रहा ।उम्र ढल रही थी ।मैने शादी भी नहीं की थी ।"

"एक बआर हम लोग राजिम मे सर्कस दिखा रहे थे तब मेरी पत्नी वहाँ बर्तन मांजने आई ।हम लोग एक माह तक वहाँ थे । मैने देखा कि ये बहुत दुखी थी ,उसे लोग पसंद नही करते थे । उसको कुछ समस्या थी ।उसका पूरा विकास नही हुआ था ।यूरिन बहते रहता था ।मैने उससे कहा कि हम लोग साथ रहेंगे ।अब मै सर्कस मे काम नही करुंगा ।उमर ढल रही है ।अब यहीं तुम्हारे साथ रह जाता हूँ ।दोनो कमायेंगे और खायेंगे ।वह तैयार हो गई और मै रुक गया ,सर्कस के लोग चले गये ।कुछ दिन वहाँ करने के बाद हम लोग यहाँ आ गये । यहाँ पर रहने को जगह मिल गई और यहीं काम कर रहे हैं।"

ये लोग शाम को मेरे साथ बैठ कर बातें करते थे ।मेरे दीवार से लगा कर चुल्हा बना लिये थे ।मै अपने दीवार के पास खड़ी रहती थी और  हम सब गप मारते थे।मैने एक बिजली का तार आपने घर से उसके घर पर दे दिया था ।वे लोग भी उजाले मे रहें ।वे लोग मेरा बहुत ध्यान रखते थे ।मेरे घर के सामने मिट्टी डाले ।घर के अंदर क्यारी बनाये ।मैने सौ गमले खरीदे थे उसमे खेत की मिट्टी लाकर डाले ।कहीं से भी पौधा मिलता तो लाकर लगा देते थे ।मै उन्हे हर काम का पैसा देती थी पर वे लोग कभी मांगते नही थे ।हम लोग.न रहें तो घर की देखभाल करते थे ।पानी हमारे बोर से ले जाते थे ।मेरी माँ भी उनके लिये कुछ भेज देती थी ।

एक दिन वे लोग बोले कि अब हम लोग राजिम  जा रहे है ।दूसरे दिन चले भी गये ।कई महिने तक नियम से हर माह मिलने आते थे ।जब वे रह रहे थे तो एक घटना हो गई थी ।गंजीर सर के बच्चे स्कूल से आने के बाद खाना खा कर हमारे घर पर खेलते रहते थे ।उनकी मंझली लड़की हम लोगों से ज्यादा हिल मिल गई थी ।वह बीमार भी रहती थी ।मै उसे अपने घर के पालक और टमाटर का सलाद बना कर खिलाती थी ।अचानक उसका आना बंद हो गया ।उसकी बड़ी मां भी आई हुई थी तो मै समझी कि इसी कारण से वह  नही आ रही है ।एक माह गुजर गया ।मै उधर जाती तो भी वह अंदर चली जाती थी ।

एक दिन शाम को हम लोग बैठे थे तब उसकी बड़ी माँ रोते हुये सामान सहित निकल गई ।बच्चे भी रो रहे थे ।मिसेस गंजीर कुछ बोल रही थी कभी हमारे घर की तरफ ईशारा करती थी और बच्चों को डांटती थी ।महराज को बड़ी माँ ने रिक्सा लाने के लिये कहा ।महराज रिक्सा लेकर आया और वह बैठ कर चली गई ।उन लोगों ने आपस मे भी बात नहीं
.किया।हम लोग अंदर आ गये ।बाद मे महराजिन बड़बड़ाते आई ।मैने पूछा कि "क्या हुआ ?" तो वह बोली -जाने दो दीदी ।

दूसरे दिन शाम को वह फिर जा कर लड़ रही थी ।वह गंदी गंदी गालियां दे रही थी ।मै बाहर ही खड़ी रही ।जब वह वापस लौटी तब भी गाली दे रही थी ।आने पर मैने पूछा कि क्या हुआ ? वह बोली -ठगड़ी बोलती है ,वह खुद ठगड़ी ।हम लोग उसको अपने कब्जे मे कर लेंगे।वह मेरी दीदी को बोलती है वह खुद है वैसी ।हम लोग तो समझ नहीं पाये ।इतना समझ में आया कि वह मुझे ठगड़ी कह रही है ।ठगड़ी छत्तीसगढ़ी शब्द है जिसका अर्थ "बांझ" होता है ।हम लोग कुछ समझे और कुछ नहीं समझे ।हम लोग सो गये ।दूसरे दिन रविवार था ।उस दिन महराज महराजिन दोनों हमारे घर टी वी पर सिनेमा देखने आये तब खुल कर बात हुई ।

उसने बताया कि वह अपनी बेटी को बोल रही थी कि दिनभर वर्मा आंटी बोलते रहती है वह कुछ खिला कर अपने पास रख लेगी ।वह बांझ है ,उसके बच्चे नही है ।उसके घर मत जाया करो ।मिसेस गंजीर की बड़ी बहन आई थी उसके भी बच्चे नही थे ।उसके साथ ही मंझली बेटी सोती थी तो उसे अच्छा नही लगता था ।उसने अपनी बड़ी बहन को भी कहा कि तुम बांझ हो मेरी बेटी को अपने कब्जे मे कर रही हो ।मेरे घर से चले जाओ .उसकी बहन तुरंत आपना बैग लेकर निकल गई थी ।अब यह बात समझ मे आ गई कि बच्चे क्यों नही आ रहे है ।महराजिन हमेंशा मेरे लिये खड़ी रही ।जब मेरा बच्चा हुआ तब तक वह मर चुकी थी ।

उस कालोनी में तब छै सात मकान बने थे ।कुछ बन रहे थे ।उसी समय कविता नगर बनना शुरू हुआ था ।वहां पर बहुत से सतनामी आये हुये थे ।वहाँ के मकान की चौकीदारी करते थे और वहीं रहते थे ।हम लोग शाम को बैठे रहते थे तो पानी लेने आते थे ।मै उन लोगों से कुछ बातें कर लिया करती थी ।मैने उस समय जाना कि ये लोग अछूत क्यों है ।निर्गुण ब्रम्ह को मानने वाले थे इस कारण कर्मकांडी पंडितों ने इन्है अछूत माना था ।उनका काम था कृषि के काम में मदद करना ।इसी बीच मेरे पति को बिच्छू ने काट लिया ।बस तब से वे बिच्छू काटने का देशी ईलाज करने लगे ।बहुत  लोग रोते आते थे और हँसते जाते थे ।पूरी कालोनी हमारे देखते देखते बन गई ।

हमारे घर के सामने कालोनी के बीच मे शमशान घाट था ।वहाँ पर एक और घटना हो गई ।एक दिन मैअपने माँ  के घर से शाम को लौटी ।मै रिक्से से आती थी ।उस दिन भी एक थैले मे कुछ सब्जी रखी थी ।सात रुपये मे तय हुआ था ।मै शंकर नगर के पास की छोटी रेल लाइन पार करने के बाद उससे बोली कि मीरादातार ,बॉटल हाऊस की तरफ मोड़ लो ।वह मोड़ लिया ।उस समय  बॉटल हाऊस के बाद की जमीन खाली थी ।एक छोटी नहर थी उस पर पुल बना था ।उसे पार करके गीतांजली नगर जाते थे ।पुल के पहले ही वह पलट कर पूछता है "कहाँ जाना है ?" मैने कहा "वहाँ ,वो है घर ।"वहां से दाहिने तरफ मेरा घर था और बांये तरफ मरघट था ।दूर दूर मे चार मकान थे ।मरघट में चार लाशें जल रही थी ।वह तेलीबांधा का शमशान था ।

वह रिक्सा वाला रिक्सा रोक दिया था ।वह मुझे पलट कर देखा ।मैने कहा वो तो है घर चलो ।वह फिर पलट कर मुझे  देखा और फिर मेरे घर की तरफ देखा ।थोड़ी देर मे बोलता है "मरघट है क्या ?" मैने हाँ कहा वैसे ही वह रिक्शे के हैंडल पर रस्सी सरका कर खड़ा कर दिया और मुझे वहीं छोड़कर भाग गया ।मै उसे चिल्लाती रही ।वह नहीं आया और मेन रोड पर आकर खड़ा हो गया ।मै रिक्शे से उतर कर उसके सीट पर सात रुपये रखी ।रखने के बाद उसे चील्ला कर बोली कि "पैसे रखे है ले लेना ।"मै अपने घर की तरफ आने लगी ।दिन ढल चुकी थी ।अंधेरा था ।,बसंत ऋतु की हवा चल रही थी ,लाशों के जलने से लाल पीली लौ बहुत हिल रही थी ।वास्तव मे दृश्य भयानक लग रहा था ।मै अपने घर पहुंच गई ।महराजिन ने पूछा कैसे पैदल आ रहे हो दीदी ।मैने कहा रिक्शा वाला मीरादातार के बाद ही छोड़ कर भाग गया ।और भी मजदूर थे सब जोर जोर से हंस रहे थे ।

मै समझी नहीं तो महराजिन बोलती है "दीदी आप बहुत सीधे हो ।उसने आप को भूत समझ कर छोड़ दिया था ।"वहाँ जाने के बाद मुझे बहुत से अनुभव हुये ।घर मे सास ने कभी "बांझ" शब्द का प्रयोग नहीं किया था।घर मे बच्चों के साथ रहती थी हर काम मेरे से कराते थे ।जेठानी के बच्चे मेरे ही पास रहते थे ।एक नया अनुभव पीड़ा दायक था ।सतनाम को जानने का मौका मिला ।बिच्छू काटने वालो को ठीक करना ,एक सुखद अनुभव था ।महराज जैसे दिलदार व्यक्ति से मुलाकात हुई ।महराजिन का प्यार ईज्जत हमेशा के लिये मन मे रह गई।मुझे भूत समझना एक हास्यास्पद घटना रही ।हा हा हा ।

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