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रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे - 83

अलग चौके मे मैं व्यस्त थी ।उसके साथ साथ स्वेटर बनाने मे व्यस्त रहने लगी ।मै स्वेटर बहुत बनाती थी ।परिवार के लोगों का स्वेटर बनाती रहती थी ।तबियत खराब होने के कारण नौकरी मे नहीं जा पा रही थी ।तब मैने समय काटने के लिये स्वेटर को ही चुना ।टेलरिंग का डिप्लोमा था तो घर के पूरे कपड़ों की सिलाई करती थी ।जेंट्स कपडे ज्यादा सिलती थी ।काका के और भाई के कपड़े सिलती थी ।यह बात जस मेरे पति टो चली तो वे भी अपने पेंट शर्ट मुझसे सिलाने लगे थे ।

मेरे पति बड़ी तन्मयता से हाथ से स्वेटर बनाते मुझे देखते थे ।एक दिन शाम को बच्चे मुझे नीचे बुलाने लगे ।मै नीचे उतर कर आई  इनको बैठक मे देखते ही घबरा गई कि पता नही अब क्या बात हो गई? और मै दरवाजे पर ही इनको देखते खड़ी हो गई ।मेरे ससुर को एक बात को तीन चार बार बोलने की आदत थी ।वे बोलने लगे "देखो एक अजूबा घर मे आया, अपने आप स्वेटर बनाया। " मै तो सुन कर मुस्कुराने लगी पर कुछ समझी नहीं ।बच्चे बोलने लगे इधर देखो चाची ।मै जमीन पर देखी तो एक लम्बी सी लोहे की मशीन थी ।खुली रखी थी ।उसमे बहुत से लोहे के फंदे फंसाने के हुक थे ।करीब एक मीटर लम्बी थी और सात इंच चौड़ी ,चार इंच ऊंची थी ।

मेरे पति बहुत प्यार से बता रहे थेऔर मेरे ससुर बार बार बोल रहे थे" अब चाचा के पास बहुत पैसा हो गया ,अब चाचा के पास बहुत पैसा हो गया ।" मेरे पति ने तुरंत कहा कि लोन से लिया हूँ । अब सब चुप हो गये और चलो खाना खाते हैं करके चले गये।मशीन को उपर लाकर रख लिये ।हम लोग भी खाने बैठ गये ।मैने कहा कि क्यो खरीदे ? तो बोले कि तुमको स्वेटर बनाने का शौक  है इस कारण ।
मैने कहा कि वह तो मै बना रही हूँ ।"आपने इतना पैसा क्यो खर्च किया ।"बोले कि जल्दी स्वेटर बना लेना ।फिर बताये कि कल से सीखने जाना है ।एक माह फ्री मे सिखायेंगे।कल तुम्हें छोड दूगा ।बाद मे अकेले जाना ।

दूसरे दिन मुझे दिखाने ले गये ।शाम को रिक्से से मै आ गई ।सीटी कोतवाली के पास ही सिंगर की दुकान थी ।यह मशीन उसी कम्पनी की थी ।उस दिन  मुझे पता चला कि यह मशीन पूरी आटोमेटिक  है ।एक दिन मे पूरा एक फुल स्वेटर बनाया जा सकता है ।धीरे धीरे एक माह मे एक रंग की डिजाइन ,कई रंग की डिजाइन बनाना सीख गई ।शॉल स्वेटर ,मफलर सब बनाना आ गया ।उसके बाद मै हाथ से बनाने वाले स्वेटर का पिछला हिस्सा मशीन से बनाने लगी ।लोगों को पता चला तो परिवार के लोगों ने ऊन भेजना शुरु कर दिया ।कई लोगों ने सलाह दी की पैसे लिया करो ।उस समय रायपुर मे एक ही के पास स्वेटर बनाने की मशीन थी ।साइंस कालेज मे मलेवार सर थे उनकी पत्नी के पास ।मेरे शादी के समय मेरे लिये स्वेटर उनसे बनवा कर दिया गया था ।

मेरा काम बढ़ने लगा था ।मेरी वित्तीय हालत देखकर लोग पैसा ले लो बोलने लगे ।साइंस कालेज ,महिला महाविद्यालय ,और कृषि महाविद्यालय से आर्डर आने लगे ।रायपुर मे स्वेटर बनाने का रेट डेढ़ रुपये गोला था तो मैने सवा रुपये के रेट से पैसा लेना शुरु किया ।एक गोला याने पच्चीस ग्राम होता था ,अभी भी गोले का वजन वही है ।अब मै आठ बजे पति के जाने के बाद  स्वेटर बनाने बैठ जाती थी ।दस बजे चाँवल पकाती थी ।खाना खाकर फिर बनाने बैठ जाती थी ।थोड़ा भात बचाकर रख लेती थी उसे दोपहर को खाती थी । शाम को पांच बजे तक बनाते रहती थी ।उसके बाद नीचे सास ससुर जेठानी के पास बैठती  थी बच्चों से बात करती थी ।शाम छै बजे कोयले की सिगड़ी जलाकर खाना बनाना शुरु करती थी ।सात बजे तक खाना तैयार हो जाता था उसके बाद पत्रिका पढ़ते रहती थी ।

साढ़े सात बजे पति के आने के बाद खाना खाकर पूरे दिन के काम का लेखा जोखा रखती थी ।वे बहुत खुश हो जाते थे ।अब पैसे भी आने लगे थे ।पैसों से कुछ बर्तन खरीदने लगी थी ।घर के सामने ही एक ठेले मे बर्तन बिकने के लिये आता था । अब घर मे फोल्डिंग चेयर भी आ गया ।एक रेक , एक बड़ा ट्रंक जिसमे कुछ सामान रख सकूं ।एक कमरा जिसमे पूरी गृहस्थी थी ।खाना भी वहीं बनता था ।अब स्वेटर की मशीन भी एक टेबल पर फंसा कर रखी थी ।

अब काम इतना बढ़ गया कि एक दिन में दो स्वेटर बनाती  थी।अब सिलाई करने के लिये अपनी ननंद को रखी ।सास भी शाम को बैठकर ऊन की लच्छियों के गोले बनाने लगी ।एक गोले का चार आना और एक फुल स्वेटर कि सिलाई का पांच रूपिया देती थी ।अब घर मे मेरे प्रति प्यार बढ़ रहा था क्योंकि वह तो पैसे की दुनिया थी । सभी के लिये फोकट मे स्वेटर भी बना दी थी ।

कोई भी स्वैटर बनवाने आता था तो दरवाजे पर ही खड़े होकर बात करते थे । वहीं पर मै नाप लेती थी ।पैसा लेती थी ।स्वेटर बनने के बाद वहीं पर लाकर देती थी ।दरवाजे पर ही लोग नाप कर देखते थे और जो बोलना होता था बोलते थे ।एक बार एक ऊन वाले का स्वेटर बनाई थी ।वह शाम को आया कि अब हम लोग हरियाणा जाने वाले हैं ,स्वेटर बन गया हो तो दे दो ।मै स्वेटर को लेकर आई ।वह अपनी सायकिल से नीचे नही उतरा ।वह स्वेटर को पहन कर देखा और ननंद से बात करने लगा ।मुझे लगा अब पैसा देगा ।वह बात ही करते करते अचानक तेजी से निकल गया ।चौक के पास पहुंचते  ही हम लोगों को टाटा किया और तेजी से निकल गया ।

रात को इस बात की घर पर बहुत चर्चा हुई ।मेरी सास.बहुत गालियां दे रही थी ।ससुर भी कहने लगे ईमानदारी भी को चीज होती है ।आजकल बेईमानी बहुत बढ़ गई है ।सास ने हिदायत दी कि पहले पैसा रखो तब पहन कर देखना बोलना ।जेठ तो बोलने लगे कि अब सुबह मेरे सामने स्वेटर देना ।धंधा अच्छा चल रहा था ।नाम भी होने लगा था । अब तो रायपुर मे भी लोग सुनकर आने लगे थे ।

इस तरह की घटना होती रही ।एक ने स्वेटर के ऊन और बनवाई का भी पैसा नही दिया ।गांव भेजते थे तो आर्डर आता था ,ऊन खरीद कर बना कर भेजते थे पर पैसा नही आता था ।अंदर से पीड़ा होती थी कि इतनी मेहनत करती हूँ उसके बाद ऐसी घटना हो जाती है ।गीता मे कहा गया है कर्म का फल मिलता है पर मै तो सब के साथ अच्छा कर रही हूँ तो मेरे साथ बुरा क्योंं हो रहा है ।ईश्वर ऐसे ही परीक्षा लेते होगें।सहने कि क्षमता कितनी है ?सहने के बाद कैसी प्रतिक्रिया देते हैं ? मेरे पति ने भी कहा कि शायद यह किसी को देने का होगा जाने दो ,अपने काम पर ध्यान दो ।एक ने चिल्हर नहीं होने का बहाना बना कर साठ रुपये लेकर चला गया ।उस समय चालिस रुपये पौंड ऊन की कीमत थी ।एक पौंड ऊन मे एक फुल स्वेटर बनता था ।

भगवान की जैसी ईच्छा सोचकर काम करती रही ।नौकरी छोड़ने का दुख नहीं रहा ।एक क्षेत्र मे मै अपना पैर जमा रही थी ।धंधा करना आसान नहीं होता ।उसके लिये जिसका परिवार शिक्षा से जुड़ा हो ।पर मैने यह कर दिखाया था ।

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