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रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे -100

अपूर्व को पत्र लिखना सिखा रहे थे ।उसके पापा ने कहा कि अपने बुआ के बेटे को पत्र लिखो ।अपूर्व ने लिखा ।उसकी बुआ मलाजखंड मे रहती थी ।फूफा जी आकाशवाणी मे थे ।उसके दो बेटे ।मोनू और लोरिक नाम था ।बड़ा मोनू अपूर्व से दो साल बड़ा और लोरिक एक साल छोटा था ।

अपूर्व के पत्र का  जवाब मोनू ने दिया और मलाजखंड बुलाया ।इस पत्र के जवाब मे अपूर्व ने मुझसे पूछ कर लिख दिया कि हम लोग सात अप्रेल को आ रहे है ।यह पत्र 28-4-1998 को लिखा गया था ।सात से ग्यारह तक की छुट्टी थी और बारह को रविवार था ।इस प्रकार से छै दिन की छुट्टी मिल रही थी ।

मेरे पति बस का पता करने गये ।एक ही बस जाती है यह पता चला ।वह सुबह छै बजे छुटती थी ।हम लोग सात मई की सुबह चार बजे उठे ।मै पूड़ी सब्जी बनाई।नहा कर तैयार हो गये ।सामान सहित रिक्शे मे बैठ कर सुबह साढ़े पांच बजे बस के पास पहुंच गये ।तब दस रुपये रिक्शे वाले को दिये ।दुर्ग रोड वेज की प्राइवेट बस थी ।यह बस हीरा आर्केड हीरा काम्पलेक्स से छूटती थी ।करीब 5-40 को बस आई ,हम लोग बैठ गये ।बस 6-28 को छूट गई ।

गाड़ी मे बहुत भीड़ थी ।गाड़ी कहीं भी दो मिनट से ज्यादा नही रूक रही थी ।शादी ब्याह का मौसम था इस कारण बहुत भीड़ थी ।हम लोग बारह बज कर सात मिनट पर मलाजखंड में उतरे ।मोनू स्कूटर में लेने आया था ।उसके पापा अशोक  भी आये थे ।मै और अपूर्व  मोनू के साथ स्कूटर पर चले गये ।अशोक और मेरे पति पैदल ही आये ।घर पहुंच कर हाथ मुंह धोकर हम लोग खाना खाये ।सब खुश थे ।अपूर्व को दो दोस्त मिल गये थे ।दोनो को भैय्या बोल कर वह आगे पीछे घूमते रहता था ।खाना खाकर बच्चे विडियो गेम खेलने लगे ।हम लोग बातों मे लग गये ।चार बजे फोन आने पर अशोक अपने आफिस चला गया ।हमलोग पास मे बैठने चले गये ।आज से पचीस तीस  साल पहले तक यह था कि मेहमान आये तो उसका इंतजार पड़ोसी भी करते थे ।उनके घर बैठने जाओ और वे लोग खाने बुलायें ।हम लोग भी पड़ोस मे बैठने गये ,वह पहले से इडली बना कर रखी थी ।हम लोग बैठे और इडली खाये । वहां से आने के बाद खाना बनाने मे लग गये ।सब मिलकर काम करते थे ।वह कभी भी कामवाली नहीं रखती थी ।

रात को हम लोग वहां की हरियाली पर ही बात कर रहे थे ।बस में बैठे थे तब भी रास्ते के दोनों तरफ की हरियाली देखने लायक थी ।पता नहीं क्यों मुझे पचमढ़ी याद आने लगी थी ।घर के पास ही बगीचा था ।रास्ते के दोनों तरफ आम के पेड़ थे जो फलों से लदे थे । रात को घर के पीछे की तरफ बड़ा सा घेरा था जहाँ पर बहुत से पेड़ थे ।ऊपर के मंजिल मे घर था ।रात को पीछे का दरवाजा खोल कर सोये थे ।कूलर लगा था पर बारह बजे उसे बंद कर दिये ।बहुत ठंड लगने लगी थी ।चादर ओढ़ कर सोना पड़ा था ।सुबह जल्दी ही नींद खुल गई ।

दूसरे दिन आठ मई को कान्हा जाने का कार्यक्रम बनाने लगे ।सुबह से टैक्सी वाले के पास जाकर बात किये ।दो तीन जगह बात किये ।1100,1200 ,1300 सौ तक बताये ।।शाम को मै और मेरी ननंद मुन्नी पास के गार्डन मे घूमने गये ।बच्चे अपना अलग से ग्रुप बना कर घूम रहे थे ।मेरे पति और अशोक आकाशवाणी मे अशोक के आफिस देखने चले गये ।हम लोग वापस आये तो मुन्नी को याद आया कि आम की चटनी बनायेंगे।वह मोनू से बोली आम तोड़ लेना ।मोनू और अपूर्व गये और रास्ते के किनारे लगे आम के पेड़ से पत्थर मार कर बहुत सा आम ले आया ।अब रात को खाना खाकर सब एक साथ बैठ गये ।मेरे कमर में बहुत दर्द हो रहा था।मालिश करके लेट गई ।अशोक ने बताया कि कान्हा केसली यहां से 31 किलोमीटर है।रात को तय किया गया कि दो स्कूटर से सब लोग चलेंगे।

अशोक के एक मित्र थे जोशी जी ,उनसे स्कूटर लेकर आ गये ।नौ तारीख की सुबह 3-30 बजे सब उठ गये ।करीब 6-30 कोअशोक और मोनू स्कूटर में हवा भरवाने गये ।करीब 7-45 को सब लोग घर से निकल गये ।जोशी जी की स्कूटर बहुत भारी थी ।अशोक उसे चला कर थक गया था।अब सवारी बदली गई।जोशी जी की स्कूटर पर मेरे पति मोनू और मुन्नी बैठे।बाकी हम लोग अशोक के स्कूटर पर बैठे ।आधे घंटे मे ही हमलोग बदल कर बैठ गये ।आगे की चिंता हो रही थी पर आराम से नौ बजे कान्हा पहुंच गये ।

सवा नौ बजे कान्हा के अंदर चले गये ।करीब चालिस किलोमीटर घुमे ।10 रूपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से  360 रूपये 155 रूपये  घूमने का ,60 रुपये एन्ट्री फीस ,60 रूपये गाइड ,25 रूपये कैमरा के इस प्रकार एक जीप का 515 रूपये दिये ।तरह तरह के पक्षी दिखाई दे रहे थे ।कबूतर चील तो बहुत दिखे ।रात को हल्की बआरीश हुई थी तो सुनहरी धूप में मोर नाच रहे थे
साल ,साजा,तेंदु ,पलाश ,बीजा ,महुआ ,आंवला ,आम ,चार बांस के पेड़ बहुत दिखाई दे रहे थे ।बहुत घना जंगल है।इधर उधर गिलहरी दौड़ रही थी ।बंदर भी कूद रहे थे ।किंगफिशर भी अपनी गंदी आवाज निकाल रहा था तो कोयल की कूक भी सुनाई दे रही थी ।बारह सिघा सूअर ,बनभैसा ,चीतल ,सियार ,नीलगाय तो दिखाई दिये पर  आँखे तो तेंदुआ और टाइगर को खोज रहे थे ।अमलताश के फूल के गुच्छे थे तो बांस के लम्बे लम्बे घने घेरे थे ।बीच मे छोटी सी कुटिया बनी थी जहां पर थोड़ी देर रूके भी थे ।एक जगह पर बहुत से चील उड़ रहे थे आकाश में ,गाइड ने कहा कि शायद चीता यहीं कही होगा ।उसके  शिकार को चील सियार खाते हैं ।पर हमें वह दिखाई नही दिया ।गंध आती रही पर चीता पेट भरे होने के कारण सोता रहा ।हम लोग" टाइगर रिजर्व " राष्ट्रीय अभ्यारण  बहुत मजे से घूम लिये पर टाइगर देखने की इच्छा मन में लिये 11 बजे वापस बाहर आ गये ।

बाहर आकर वहीं पर की नदी के किनारे आकर बैठ गये ।वहाँ नदी में हाथ पैर धोकर पूड़ी सब्जी खाये और बैठ कर गप्प मारते रहे ।करीब दो बजे हम लोग वहाँ से चल पड़े ।3-45 में मलाजखंड वापस आ गये ।शाम को बच्चो से दिनशॉ आइशक्रीम मंगाये और खा कर आराम से सो गये ।पर प्राकृतिक सौन्दर्य के सपने आते रहे ।नदी का किनारा और वहां पर बड़े बड़े वृक्ष जिसमे बरगद भी थे याद आते रहे ।घना जंगल और वहाँ नाचते मोर ,कूदते बदर कूकती कोयल ,शाखों पर लटकते बंदर ,आकाश मे उड़ते पंछी बांस के घने जंगल ,अमलताश के पीले फूल, पलाश के छिटके फूल रात को भी आँखो के सामने आते रहे ।

दस तारीख को सुबह से गप्प मारते रहे ।सबने मिलकर खाना बनाया ।बच्चे सी डी लाकर देखते रहे ।विडियो गेम खेलते रहे ।शाम को हम लोग मीना बाजार देखने गये ।एक सारस और लकड़ी की आलमारी खरीदे जो आज सबसे छोटी लकड़ी की आलमारी के रुप मे गिनिज बुक मे दर्ज है ।एक छोटे से शहर में छोटा सा मीना बाजार मनोरंजन के लिये बहुत बड़ा साधन था ।रात को बहुत सा आइसक्रीम खाये ।

दूसरे दिन चार बजे सुबह उठ कर तैयार हो गये ।मुन्नी ने पूड़ी सब्जी बनाई ।हम लोग सुबह 5-30 को बस स्टेड पहुंच गये ।6-25 पर सब छुट गई ।हम लोग रआस्ते का मजा लेते रहे और बारह बजे दुर्ग पहुंच गये .वहा पर एक मीनी बस मे बैठे और दोपहर दो बजे अपने घर पहुंच गये ।हम लोग ठीक ठाक घर पहुंच गये ।तबियत भी ठीक रही ।बच्चो के पत्र ने हमे इतनी अच्छी अभ्यारण के दर्शन करा दिये ।बच्चों का पत्र व्यवहार चलता रहा ।अब वे लोग बड़े हो रहे थे और अपने विचारों को एक दूसरे से बाट रहे थे ।यह प्राकृतिक सौंदर्य आज भी आँखो के सामने आता है ।

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