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रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे - 86

मेरी ननंद की शादी के लिये लड़के देख रहे थे ।मेरे भाई ने मना कर दिया था ।उसकी सजा मै अलग चौके के साथ रह कर काट रही रही थी ।जो भी लड़के वाले आते थे ,उन्हें मेरे मायका के बारे मे जरूर बताते थे ।एक शिक्षित परिवार के बेटी हमारी बहु है ये जरूर बताते वे लोग तारीफ ही करते थे थे ।लोग मेरे काका से इस घर के बारे में पूछताछ करते थे ।कई लोग आये और मुझसे मिलना भी चाहे पर मेरे ससुर ने कह दिया कि वह अपने मायके गई है ।

एक परिवार देखने के लिये आये ।वे लोग जानते.थे कि मै ऊपर मे रहती हूँ ।वह महिला  "मै सुधा से मिलकर आती हूँ" करके ऊपर आ गई ।मै उसे देखकर अचरज में पड़ गई ।वह मेर बचपन की सहेली थी।मुझसे दो साल बड़ी थी ।मुझे बचपन की याद आने लगी ।हम दोनो मिलकर मेढक पकड़ते थे ।"रानाटिग्रिना " पकड़ कर लाते थे ।उसे मिट्टी के तेल से बेहोश करते थे।उसके बाद वह उसे किटती थी और मै देखती थी ।उसने मुझसे कहा "क्या हुआ पहचानी नहीं क्या ? मै बोली "पहचान गई और कुछ याद भी आ गया ।" उसने कहा "क्या?" मैने कहा "मेंढक "।दोनों जोर जोर से हंंसने ।घर के बच्चे भी उपर आ गये ।अब शुरु हुआ पूछताछ का सिलसिला ।तुम्हारा चौका अलग क्यों है ? तूमलोग लड़की को क्यों नहीं लिये ? तुम्हारे ससुर के हाथ की ऊंगली मे सफेद दाग हे क्या ? इसी को लोकल भाषा मे चिंगराज कहते है ।

मैने सभी प्रश्नो के जवाब दिये ।ननंद की शादी ,मजाक में मेरे  भाई के कॉलर पकड़ने के कारण नहीं हुई ।मुझे इस कारण अलग कर दिया गया।ससुर के हाथ की ऊंगली का सफेद निशान अनारदाना के हाथ मे फूटने के कारण बन गया है ।उसने पूछा कि तुम्हारे सामने हुआ था कि इन लोगों ने बताया था ।मैने कहा पिछले साल ही मेरे सामने जला था ।बच्चों के साथ अनारदाना जला रहे थे ।अनारदाना जला नहीं ।वे बच्चों को दूर करके अनारदाना को उठा कर किनारे फेंंकने वाले थे कि वह हाथ मे ही फूट गया ।बहुत दिन तक दवाई लगाये पल चमड़ी का रंग न  हीं आया ।

वह सब पूछताछ करके नीचे चली गई ।शादी तय हो गई ।मई में शादी थी ।तैयारी चल रही थी ।शादी पलटी मे थी ।छत्तीसगढ़ मे इसे "गुरांवट "शादी कहते है ।ननंद की ननंद मेरी देवरानी हुई थी ।मैने अपनी ननंद के लिये एक तोले का गले का मंगलसूत्र बनावाई थी ।एक ओवन बजाज का ,साड़ी और पेंट शर्ट खरीदी थी ।शादी मे क्या दे रहे हो ? ये बात मोहले मे हर कोई पूछता था ।एक दिन मै सबको बुला कर दिखाई ।शादी हो गई ।शादी मे हम दोनो को खाने के लिये मना कर दिये थे ।मेरी माँ और दीदी दोनों दहेज का सामान लेकर आये थे ।बिना खाना खाये चले गये थे ।जब तक मेहमान रहे मेरी सास मुझे कोसती रही ।मेहमान भी मुझे तिरछी नजर से देखते रहे ।जो लोग बोल रहे थे वह सही निकला कि मेरी सास सब को कहती थी कि सुधा ने कुछ नहीं दिया ।

मै उसके घर गई तो देखी कि जो साड़ी मै दी थी उसका पर्दा लगा हुआ था ।मेरा हर छण अपमान होता रहा ।पहिली बार जब दामाद के साथ खाने बुलाये थे तब भी मै ऊपर मे ही रही ।एक बार नीचे उतरी तो ननंदोई ने पैर छुआ पर और किसी ने बात भी नहीं की तो मैं ऊपर आ गई । सब कुछ बदलते जा रहा था ।पहिली होली मे ननंद आई तो वह इनको बोली कि तुम और कहीं  रहने चले जाओ ।यहाँ अब रहने की जरुरत नहीं है ।पहिली बार इनको झटका लगा कि अब शादी होकर अपने ससुराल चली गई है और यहाँ के बारे मे ही सोचती है ।वह पहला दिन था जब हम लोग घर छोड़ने का सोचे ।

एक लड़की की सोच कैसे बदल रही थी ।एक इंजीनियर पति नहीं मिलने का आक्रोश वह मेरे से पूरी जिंदगी निकालती रही ।कभी कभी दामाद मेरे पास ऊपर मे भी आ कर बैठने लगा ।वह भजिया बनवा कर खाता था ।पर वह भी यही कहता था कि इसकी शादी मेरे भाई से होनी थी ।कॉलर पकड़ना तो मजाक था ।मुझे आश्चर्य होता कि जिस लड़की की शादी उससे हो गई है उससे खुश नहीं है ,उसकी पत्नी की शादी दूसरे के साथ क्यों नही हुई यह सोच रहा है ।जब मेरी ननंद का बेटा हुआ तब तक हम लोग घर छोड़ चुके थे ।नंदोई आकाशवाणी मे काम करते थे ।तब अंबिकापुर मे थे ।जब दूसरे बेटे का जन्म हुआ तब वे रायपुर दूरदर्शन मे आ गये थे ओर मेरे घर के आगे अनुपमनगर मे टी वी टॉवर के पास रहते थे ।मै उसके घर जाती थी ओर समय समय पर गिफ्ट ,साड़ी देते रहती थी ।जब वह हॉस्पिटल मे भर्ती हुई तो हम दोनों साथ मे गये थे ।

लड़का हुआ और सास खाना नहीं बना पा रही थी तो मै ही सबके लिये खाना बना कर ले जाती थी ।मेरी सास भी इंतजार मे रहती थी कि कब सुधा खाना लेकर आयेगी ।मै टिफिन लेकर जाती थी तो तुरंत तीनों सास ,नंनदोई,और ननंद तीनो बैठ कर खाने लगते थे ।जेठ जेठानी का अंटागढ़ तबादला हो गया था ।देवर देवरानी गुजरात से आये थे। सास को पेट मे कुछ तकलिफ हो रही थी ।उसको लेकर मेरा देवर चेकअप करवा रहा था ।ननंद को लेकर उसके क्वार्टर मे आये तो मै ही पूरा घर धोकर साफ की थी ।वहाँ भी जब तक खाना बनाने वाला नहीं मिला तब तक खाना ले जा रही थी । रोज हम लोग सुबह शाम जाते थे ।एक टूटा रिस्ता जुड़ रहा है ऐसा लग रह था । इस बीच ऐसा कुछ हो गया कि फिर रिस्ते मे दरार आ गई ।कोई किसी को समझना नही चाहता था ।मुझे तो और भी कोई समझता नहीं था ।जीवन इसी का नाम है। उसकी शादी से लेकर बच्चे होते तक कई बार रिस्ते बदले पर मैने उसे नहीं छोड़ा ।वह चार भाई की अकेली बहन थी ।सभी भाइयों की जान थी ।छोड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता था ।उसने कभी भी मेरे दिये कपड़े नहीं पहनी पर एक दिन उसे मेरी साड़ी का इंतजार रहने लगा था ।कब और कैसे बाद मे ।

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