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रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे -102

19 अप्रेल को हम लोग रात करीब 1-40 को टैक्सी पर बैठ कर सिलिगुड़ी के लिये निकल गये ।तीन बच्चे  मै मेरे पति और मेरी ननंद ही थे ।दो घंटे चलने के बाद कार रूक गई ।बताया गया कि आगे डाकू का इलाका है इस कारण एक घंटे के बाद चलेंगे।सुबह करीब साढ़े आठ बजे गाड़ी के चक्के का स्प्रिंग टूट गया ।उसे बनवाने मे एक घंटा लगा ।शाम साढ़े छै बजे सिलिगुड़ी पहुंचे ।17 घंटे मे पहुंचे जो कि 12-13 घंटे में पहुंचना था ।रात को सिलिगुड़ी के एक होटल में रूके।होटल एकदम नया था ।रुकने मे भी अच्छा लगा ।रात को होटल के पीछे गहराई थी जिसमे बड़े बड़े पेड़ थे ।बहुत ही हरियाली थी ।

दूसरे दिन सुबह याने 20 अप्रेल को सुुबह सात बजे दार्जिलिंग के लिये निकल गये ।रास्ते का सौंदर्य देखने लायक था।हम लोग ऊंचाई की तरफ जा रहे थे ।हमारे साथ साथ छोटी रेल कई पटरी चल रही थी ।नीचे खाई दिखती थे पर उसकी हरियाली देख कर डर खतम हो जाता था।खाई से लगी पटरियां ऐसी लग रही थी कि एक पत्थर सरकेगा या नीचे गिरेगा तो रेल भी गिर जायेगी ।हम लोग गये तब तो यह रेल बंद थी ।रास्ते मे सुधार काम चल रहा था।रेल  ऊपर में ही थी ।हम लोग पटरी को पार करके शहर की तरफ गये तो रेल वही पर खड़ी थी ।जगह जगह चट्टानों से पानी निकल रहा था ।उसमें पाइप लगा कर रास्ते के किनारे में लोग कपड़े धो रहे थे।कुछ लोग होटल लगाये थे तो बर्तन धो रहे थे ।कुछ जगह पर काफी बना रहे थे तो उसके बर्तन धो रहे थे ।

रास्ते में बौद्ध मठ था ,उसे देखे ।बहुत बड़ा था ।मैं खुशी के कारण दौड़ कर  उपर चढ़ गई ।अचानक साँस रुकने लगी ।सब लोग मेरे पास आ गये।बच्चे तो बहुत ही घबरा गये थे ।मेरे पति ने कहा ऊंचाई पर आक्सीजन कम होता है इस कारण साँस रूकने लगती है ।धीरे धीरे साँस लो और धीरे धीरे चलो ।थोड़ी देर मे ठीक लगा पर अब मैं घबरा गई थी ।पचमढ़ी मे ही धूपगढ़ मे मुझे कुछ तकलिफ हुई थी ।वह तो करीब चआर हजार फीट ही है पर यह तो करीब सात हजार फीट ऊंंचा है । जैसे ही आगे बढ़े गाइड लोग रोकने लगे।सब अपना कमरा और किराया बता रहे थे ।तीन सौ ,चार सौ था एक ने सात बेड का दो सौ पचास कहा तो उसके साथ चले गये ।पूरा बाजार पार करके और ऊपर चढ़ना पड़ा ऊपर में एक टॉवर था ,पानी की टंकी थी ।उससे ऊपर कुछ नही था। बारह से ऊपर हो चुका था ।"सरोजनी होटल "हम लोग खाना वही खाये ।चने की सब्जी थी ।खाना ठीक था।दो कमरे थे बीच में दरवाजा नही था ।करीब दस लोग सो सकते थे।

करीब साढ़े बारह बजे हम लोग टाटा सूमों मे घूमने निकले बताशिया लूप देखे।यहाँ से अपनी गाड़ी छोड़नी पड़ी ।वहां पर गोरखा लोगों का यूनियन है तो उन्ही की गाड़ी में घूमने जाना पड़ा ।एक कार किये जिससे फाइव प्वाइंट देखे ।रेस कोर्स , रोप वे देखे ।यह तो बहुत रोमांचक था ।गहरी हरी भरी खाई के ऊपर से रोप चल रहे थे ।सामने मे ही बहुत गहराई हरे भरे पेड़ थे ।कुछ लोग ट्रेकिंग सीख रहे थे।चाय बगान देखे ।दूर दूर तक सिर्फ चाय के पौधे थे।इसके अंदर जाकर कैसे पत्तियां तोड़ते होंगे यह मेरे लिये एक प्रश्न ही रह गया ।फिल्मों मे देखना अलग है पर कई किलोमीटर अंदर तो गाड़ियां भी नहीं जाती हैं।शाम को बाजार मे खूब घूमे पर कोई वस्तु सस्ती नहीं लगी ।स्वेटर खरीदे ।हमारे पास ही बहुत से स्वेटर थे ।मै अपने हाथ से बनायें स्वेटर ,मफलर दास्ताने लेकर गई थी ।वह ही हमारे लिये पर्याप्त था।पर एक निशानी के तौर पर खरीद लिये ।वहां पर नास्ता भी किये ।अपने कमरे में आ गये ।

कमरे मे जाते ही मेरा दिमाग काम करना बंद कर दिया ।अपने आप हसी आती थी ,कभी धड़कन तेज हो जाती थी तो  कभी सिर इतना भारी हो रहा था कि फट जायेगा ऐसा लग रहा था।अपूर्व को भी साँस लेने में तकलीफ होने लगी ।हम लोग होटल में डा. का पता पूछे और सब कोई नीचे आ गये ।डा. नही थे पर किसी ने कहा कि ऊंचाई पर बी. पी . कम होने के कारण हो रहा है नमक खाओ।अपूर्व को भी आक्सीजन की कमी के कारण  साँस लेने में तकलीफ हो रही है। अब हम लोग फिर कमरे की तरफ बढ़े ।जैसे जैसे बढ़ते वैसे ही तकलीफ शुरु हो रही थी ।अब रात काटनी थी रात को वही चने की सब्जी और रोटी ,चाँवल लाये ।हम लोग बोले थे हरी सब्जी बनाना पर ऐसा नही हुआ।

नमक खाती रही ,मेरी हालत वैसी ही थी ।रात को फिर बाहर घूमने आये तब तबियत ठीक हो गई ।हँसी भी आती थी और रोना भी ।बहुत ठंड थी बादल आ रहे थे ।बिलकुल हमारे सिर के ऊपर ही बादल थे ।हाथ से छू लो ऐसा लगता था ।रात को देखे कि कमरे मे बिस्तर के सामने दीवार नही काँच की बड़ी खिड़की थी ।वह खुलती नही थी ।हम लोग ओढ़ कर सोने लगे पर मैं और अपूर्व आपस में चिपक कर बैठे रहे ।रात को बारह बज गये ।घने बादल आने लगे थे ।बिजली चमक रही थी ।बादल गरज रहे थे ।बादल की रोशनी कमरे में आ रही थी ।बाहर कभी दूध की तरह सफेद तो कभी काले बादल तेजी से चलते हुये दिख रहे थे ।एक अनोखा सा दृश्य आँखों के सामने था ।अपूर्व सोने लगा था पर मेरी तकलीफ बढ़ रही थी ।नमक खा खा कर उल्टी भी होने लगी ।मेरी ननंद जाग गई ,हम दोनो बात करते रहे ।पीने का पानी भी बर्फ की तरह था ।तीन बजे सब उठ गये ।

रात को ही एक टैक्सी तय किये थे 1000 रूपये में ।चार बजे करीब हम लोग टाइगर हील से सूर्योदय देखने निकल गये ।वहां बहुत देर तक खड़े रहे बदली थी तो सूरज नही दिखा पर निकलते समय की हल्की रोशनी देखे ।वहां पर दो बआर काफी पिये ।अब गंगा माया पार्क  देखने के लिये चले गये ।यह गहराई में है ।रास्ते मे भी चाय के ही पेड़ थे ।इसकी तलहटी मे रॉक गार्डन था उसे देखे ।नौ बजे के पहले हम लोग निकल गये ।आने के बाद ही पेस्ट किये ।किसी को भी नहाने की ईच्छा नहीं हुई ।गार्डन में ही हम लोग हाथ मुंह धो लिये थे ।होटल आकर सब सामान लेकर हम लोग गंगटोक के लिये निकल पड़े ।

नौ बजे निकले थे और ढेड़ बजे हम लोग गंगटोक पहुंचे ।तिस्ता नदी के किनारे किनारे उसकी खूबसूरती को देखते हुये आगे बढ़ रहे थे ।कई जगह पर उसमे झरने और पतली नदी आकर मिल रही थी ।गंगटोक में भी अपनी गाड़ी मे नही घूमने देते हैं ।यहाँ पर एक दूसरी टैक्सी किये ।400 रुपये में पूरा शहर घूम लिये।फ्लावर शो देखे ।आर्कीड के फूल थे ।वहा पर हम लोग कीट भक्षी पादप प्लांट देखे ।पिचर प्लांट कहते हैं ।पुस्तकों मे देखे गये फूल साक्षात दिख रहे थे ।बौद्ध मठ देखे वहाँ पर चक्र भी घुमाये ।बहुत बड़ा सा बगीचा था ।भिक्षु आ जा रहे थे ।वहां पर पेड़ो के ऊपर आर्कीड के पौधे थे ।कुछ में फूल भी थे ।तने मे मॉस उगा हुआ था। वहां से सूसाइट पाइंट देखने के लिये गये ।बहुत सी सिढ़ियां चढ़ कर ऊपर गये ।वहां के राजा किसी को मृत्यु दड देता था तो उसे इस ऊंचाई से फेका जाता था ।गिरने के बाद यदि बच गया तो वह चला जाता था ।क्योंकि जहां गिरते थे वह रोड के किनारे था ।बाद में हम लोग उसी रास्ते से सिलिगुड़ी के लिये निकले थे ।म्यूजियम और हाथकरघा की दुकाने बंद थी ।बाद में वहाँ बाजार में नाश्ता किये ।पूरे हिन्दूस्थान की चीजें वहा मिलती थी।दोने और पत्तल का उपयोग किया जा रहा था।सम लोग सिंदूर दानी लिये तो उसे पेपर मे लपेट कर धागे से बांध कर दिये ।सभी दुकानो के बाहर एक एक पीपा रखा था ।उसी मए सब कचरा डालते थे ।इसे रात को गाड़ी आकर लग जाती है ।इडली ,छोले खाये औरक्षफिर हम लोग सूमो में आकर बैड गये ।पांच बजे शाम को हम लोग गंगटोक के लिये निकल पड़े ।पर यादें साथ थी।बच्चे भी बाहर खुले में पेशाब नही करेगे ।पालीथिन का उपयोग वहाँ नही होता ।हर जगह तेल के पीपे रखे रहते थे कचरा उसी में फेकना है ।कोई भी कचरा बाहर नही फेकेगा ।

शाम पांच बजे निकले और दोपहर 1-40 को हम लोग बैरकपुर पहुंच गये ।बहुत से यादों के साथ ।रात को आँखो के सआमने ही दुर्घटना हो गई ।एक ट्रक मे छड़ भरा हुआ था ।पेट्रोल भरवा कर वह निकल रही थी ,पीछे दूसरी ट्रक थी ।अचानक छड़ वाली ट्रक पीछे हो गई ।छड़ दूसरे ट्रक के सामने को छेदकर पीछे डीजल भरे टैंक में छेद कर दी ।डीजल बहने लगा ।एक जगह हमारा ड्राइवर सोने लगा था ।गाड़ी लड़खड़ा गई ।हम सब लोग उउसके ऊपर चिल्लाये तो वह एक ढाबा में गाड़ी रोका और सीधे एक खटिया बिछी थी उस पर जाकर सो गया ।करीब दो घंटे सोया फिर उठा और मुंह धोकर आया ।वह बोला मेरी आंख खुल ही नही रही थी ।अब पांच बज चुके थे हम लोग एक जगह चाय पीने रूके ।वहीं सब टॉयलेट से निपट गये ।फिर रास्ते मे कई दुर्घटनाओं को देखते मानसिक और शारीरिक थकान से भरे चुप बैठे रहे ।1-40 को बैरकपुर अपने घर पहुंच गये ।नहा खा कर तैयार होकर  आराम किये ।

शाम को बैरकपुर का बाजार घूमे ।बड़ी जगह है ।मोनू लोरिक के लिये हम लोग चूता और कपड़े खरीदे ।ननंद के लिये कुछ बर्तन खरीदे ।अपने लिये भी फूटपाथ से कुछ पूजा के बर्तन खरीदी ।सबने चाऊमिन खाये ।यह स्वाद मए भी बढ़िया था और कीमत भी रायपुर से आधी थी । वहां के रसगुल्ले खाये ।रात साढ़े नौ बजे घर लौट आये ।अब हम लोग दार्जिलिंग और गंगटोक की खूबसूरती को याद कर रहे थे ।

23 अप्रेल की सुबह अपना सारा सामान पैक करके हम लोग लोकल रेल से सिलदाह रेल्वे स्टेशन आये ।हम लोग सामान को पांच छै बैग में रख लिये थे ।सब लोग एक एक बैग उठा लिये थे ।सिलदाह से ट्राम में बैठ कर हावड़ा गये ।हावड़ा ब्रिज पैदल ही पर किये ।हावड़ा रेल्वे स्टेशन के पास से 90 रूपये में टैक्सी किये और बोटेनिकल गार्डन देखने चले गये।मेरा सपना था उस गार्डन को देखने का ।बहुत बड़ा सा गार्डन है ।पेड़ो पर उसके नाम लिखे थे ।सबसे अनोखा तो बरगद का पेड़ था ।जो डेढ़ एकड़ में फैला है ।उसका मुख्य तना अब नही है उस जगह पर चबूतरा बना दिया गया है ।पर उसके  दो सौ तने जमीन के अंदर गये हैं ।ऐसा लग रहा था कि यह बरगद का पेड़ इस दो सौ तने पर ही टिका है ।अब तो समझ में नही आता कि असली कौन सा है ।उसके नीचे चने बेचने वाले ,चाट और फल बेचने वाले बैठे थे ।नारियल पानी मिल रहा था ।ऐसा लग रहा था पेड़ो की साखों के बीच घर है ,एक पूरी बस्ती है ।शाम पाँच बजे वहाँ से निकले ।सीटी बस में बैठ कर हावड़ा रेल्वे स्टेशन गये ।पौने छै बजे पहुंच गये ।बीस  नम्बर मे गाड़ी लगने वाली थी वह उन्नीस में लगी ।सही समय पर आठ बजकर पाँच मिनट पर गाड़ी रवाना हो गई ।मुन्नी ,अशोक ,मोनू ,लोरिक उदास मन से वापस हो गये ।अपूर्व को घर लौटने की खुशी थी पर दोस्तों से बिछुड़ने का दुख था।

लौटते समय हमारे पास सिर्फ सौ रुपये बचे थे ।वहां बच्चों ने जो कहा वो  खिलाये और खरीद कर दिये ।पूरा खर्च दोनों परिवार का हम लोग ही किये थे ।जब क्या खाओगे पूछते थे तो कुछ भी बोलते थे पर जैसे ही खाने की थाली आती थी तो चुप बैठ जाते थेे। पूरा खाना खाना बेकार हो जाता था और पैसा देना पड़ता था ।वे तीनो माँ बेटे समोसा ,भजिया या चाऊमिन ही खाते थे ।हम लोग तीन दिन के बाद समझे।आते समय रेल में भी मेरे पति ने कहा कुछ पैसे दे दो तो मैं छै सौ दे दी ।और स्वयं पाँच सौ बहन को दे दिये।सम्बधों में देना लेना चलता है और बहन हो तो हम उसके घर का क्यों खायें यह भावना रहती है ।छत्तीसगढ़ मे तो बेटियों को दिया ही जाता है ।मैने कहा मेरे पास अब सौ रुपये ही बचे हैं तो इनको आश्चर्य हुआ और बोले" अरे मेरे पास तो पचास ही बचे हैं ।चलो कल तो घर पहुंच जायेगे ।" हम लोग एक थाली खाना मंगाये और अपूर्व को खिला दिये बाकी हम लोग बांट कर खा लिये ।सुबह अपूर्व आइसक्रीम के लिये बहुत रोया हम लोग उसे तबियत खराब होगी करके नही खिलाये ।बहुत रोया और बर्थ पर सो गया ।सुबह एक एक कप चाय लिये और दस चालीस को हम लोग रायपुर स्टेशन पर उतर गये ।बच्चे का रोना और आइसक्रीम का नहीं ले पाना आज भी याद आता है जैसे गुलाब के बीच में कांटे होते हैं ।इतनी खूबसूरती देखे मन खुश हो गया ।दिल खोलकर वहाँ सबके लिये कुछ न कुछ खरीद कर दिये उससे भी सब खुश हो गये। अंत मे अपने बच्चे को एक आइसक्रीम खरीद कर नही दे पाये यह टीस आज भी मन में है ।रेल्वे स्टेशन से चालीस रूपये मे आटो किये ।मै घर तक आई और ये डी के हास्पिटल के सामने उतर कर अपने बैंक चले गये ।हम लोग घर आ गये।

आइसक्रीम के लिये तो ऐसा हो गया कि अब मुझे नहीँ खाना है ।हम लोग बहुत सी फोटो खिचे थे ।दो रील थी ।दूसरी रील कैमरे मे ही थी ।दो तीन खीच सकते थे ।मैं लालच के कारण एक दिन बाहर फूल की फोटो खिचने निकाली तो रिवाइंड का बटन दब गया पूरी फोटो खराब हो गई ।बरगद की फोटो भी थी ।जिसमें अपूर्व ने भी खिंचा था ।उसे वह पेड़ बहुत अच्छा लगा था ।वह फोटो नहींआई तो अपूर्व का रोना शुरु हो गया।वह बोला "आज ही कलकत्ता चलो और फोटो खिचेंगे ,मुझे वही फोटो चाहिये ।" हम लोग बोले कि मोनू को फोन कर दे वह फोटो भेज देगा ।वह फोन भी किया पर एक पत्रिका कि फोटो उसने भेज दी ।यह यात्रा बहुत सी यादों को समेटे हुये है ।इसके बाद मुन्नी के घर हमारा कभी जाना नही हुआ ।वह खूबसूरती चाय बगान और छोटी रेल आज भी मन में बसी हुई है ।


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