रविवार, 26 जुलाई 2020

मां

आज शिक्षक दिवस है।
माँ मैं तुम्हे कैसे भूल सकती हूं। तुम ही तो मेरी प्रथम गुरु हो। अपनी तालियों से मुझे हंसना सिखाया, अपने आंचल की छांव में मुझे प्यार करना सिखाया। ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया। अपने हाथों के सहारे मुझे खाना सिखाया। चलते हुये जब गिर जाती थी तो हंस कर पत्थर टूटने की बात कहती थी तो मैं मुस्कुरा उठती थी। जब भी चलते हुये लड़खड़ाती तो मुझे प्यार से सहला कर सीधे खड़े कर देती थी। जीवन के उतार चढ़ाव में भी मैने खड़े होना सीख लिया। कितने प्यार से मिट्टी के आंगन में पानी से लिख कर अक्षरों का ज्ञान कराया। मां तुम मुझे चौके में खाना बनाते हुये भी लिखना सिखाती थी। अगहन के महिनें में हर बुधवार की रात को आंगन में चौक बनाया करती थी। हर लाइन का मतलब बताया करती थी। कैसे लाइनों की तरह मुड़ना चाहिये ,झुकना चाहिये यह भी बताया करती थी।
गेंदे के फूलों को गुंथते हुये हमेशा एकता की ताकत को समझाया करती थी। कितनें बच्चों को रख कर पढ़ा रही थीं तो हर दिन एक ही बात कहती थीं, सबसे समान व्यवहार करना चाहिये। यह बात तुमने अपने परिवार में करके बताया था। मां तुमने मुझे एक ईश्वर की बात बताई। जातपात के भेद से ऊपर काका ने भी सभी मानव में भगवान होते हैं बताया। घर में काका रोज गीता का पाठ करते थे तो उन्होने भी एक बात सीखाई कि कर्मो का फल मिलता है इस कारण कर्म अच्छे करो,फल की चिंता मत करो। काका बी एड कालेज में प्रोफेसर थे। काका ने मुझे मंच पर वादविवाद के लिये तैयार किया तो मां ने हमेशा विषयों पर अपने भी विचार रखे। स्कूल में मिली किताबी शिक्षा को व्यवाहरिक कैसे बनाना यह मैने अपने मां काका से सीखा। चौथी पास मां जब विज्ञान के विषयों पर सवाल करती तो मुझे और गहराई से पढ़ना पड़ता था। मां ने मुझे अंधविश्वास के दायरे से बाहर रखा। मेरी विज्ञान की पढ़ाई से मां ने अंधविश्वास के दायरे को तोड़ दिया। काम कभी भी छोटा बड़ा नहीं होता काका ने सीखाया तो मां ने हर काम को करने की प्रेरणा दी। हाथ से कढ़ाई ,बुनाई, सिलाई, और पाककला के साथ साथ गोबर के कंडे बनाना और मिट्टी के चुल्हे बनाना भी सिखाया। शहर में रहते हुये गोबर से आंगन कैसे लीपा जाता है यह सब बहुत अच्छे से मैं सीख गई।
मां तुम्हारी ममता और प्यार के इस सीमा को तब समझी जब मैं स्वयं मां बनी। मैनें भी अपने बेटे के लिये उसी तरह की गुरु मां बनने का प्रयास जरुर की हूं। कुछ और भी याद आ रहा है मां तुम्हारी वह डांट , हां जब भी स्कूल कालेज से आने में देर हो जाती थी तो भगवान के सामने एक नारियल रख कर प्रार्थना करतीं और बैठक के दरवाजे पर खड़ी हो जाती थी। मेरे आने पर गुस्सा दिखातीं और बात नहीं करती थीं। मैं स्वयं सफाई देते रहती ,चाय पीती पर मां नारियल फोड़ने के बाद खाना खाते समय ही बात करती थी। यह बात तो बहुत साधारण लगती है पर वह चिंता थी कि बेटी पैदल आती जाती है, ब्राम्हण पारा जैसे गुंडो के गढ़ को पार करती है, पता नहीं क्या हो जाये। उस समय यह ब्राम्हणपारा चौक लड़कों का अड्डा हुआ करता था और सत्ती बाजार में दो दादा हुआ करते थे। बैजनाथ पारा में भी कुछ लोग थे।ये तीनों जगह के दादा के बीच आये दिन झगड़ा होता था और चाकूबाजी भी हो जाती थी। वह दौर रहा 1966--1979 के बीच, तब बहुत हड़ताल ,लड़ाई झगड़े हुइ करते थे। मां उस समय भी अपने साहस का परिचय देकर हम लोंगों को साहस देती थी।
एक ही.वाक्य रहता था " अपने रास्ते जाना और अपने रास्ते आना" सिर झुका कर चलना। यह सीख जीवन में बहुत काम आई। सच है हमें किसी से क्यों उलझना चाहिये? दूसरे के मामले में क्यों बोलें। अपने काम से काम रखे।
मां तुम्हारे दी नैतिकता की सीख और काका के दिये जीवन मूल्य ही आज मेरी धरोहर है। शिक्षक तो हमारे अक्षर ज्ञान से लिखे साहित्य को समझाते हैं पर मां तो हमें जीवन जीना सिखाती है। हममें संस्कार डालती है। संस्कार स्कूल की शिक्षा नहीं डालती है। शिक्षा हमें क्या करना चाहिये बताती है तो मां उन सबको करके बताती हैं।

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