रविवार, 26 जुलाई 2020

बलात्कार

आज के अखबार में एक वेटनरी डाक्टर प्रियंका रेडी के साथ बलात्कार का समाचार पढ़ने के बाद निर्भया की याद आ गई। इतनी ही क्रूरता उसके साथ भी की गई थी। उसे दर्द सहने के लिये छोड़ दिया गया था। पर प्रियंका को और दर्द देने के लिये पहले गाड़ी में बांध कर तीस किलोमीटर घसीटा गया उसके बाद मिट्टी तेल डाल कर जला दिया गया। दोनों ही इतने कष्ट देने के बाद भी जीवित रहीं ये होती है नारी, जो एक बच्चे को नौ माह अपने कोख में रख कर मरने लायक पीड़ा सह कर एक बच्चे को जन्म देती है। एक पुरुष योनि से बाहर आता उसका सम्मान नहीं करता है उसकी धज्जी उड़ाता है। वह कई रुपों में हमारे आमने आती है माँ , बहन ,भाभी, नानी दादी और पत्नी। यह पत्नी ही है जिसे छूने का अधिकार समाज देता है। उसके लिये तो हर नारी पूज्यनीय होती है।
अविकसित समाज से एक विकसित समाज बना। जहां शरीर को ढक कर रखा जाता है। माँ बहन बेटी से प्यार भरा रिश्ता रहता है। आज भी जो कबीले विकास की दौर से बाहर हैं वहां भी ऐसा नहीं होता है। उनके कबीले की मर्यादा है। आधे कपड़े पहने सभी महिलायें घूमती हैं पर ऐसी गंदी नजर नहीं होती है। एक द्रौपति के लिये महाभारत हो गया। एक सीता के लिये लंका जल गई और पूरा परिवार मर गया। आज ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। संविधान के नियम भी शिथिल हैं। किसी को भी फांसी नहीं मिल रही है। एक मोमबत्ती पकड़ कर सैकड़ो लोग शांति से संवेदना प्रगट कर रहे हैं। इससे क्या होगा?
मुझे अपनी पुरानी डायरी याद आई जिसमें मैं रायपुर की 1970 की घटना के बारे में लिखी हूं। उस समय मैं नवमीं में पढ़ रही थी। आचार्य तुलसी का प्रवचन चल रहा था। उन्होने माता सीता पर कुछ गंदी बात कह दी थी। उस समय पूरे रायपुर में दंगा हुआ। लूटपाट और बंद करवाया गया। हम लोग दानी स्कूल में थे और कर्फ्यू लग गया। लड़के करीब बारह बजे स्कूल बंद करवाने आई। प्राचार्य से बहुत सी बहस के बाद छुट्टी दे दी गई। जो लड़कियां रिक्शे से आती थी उनके लिये लड़कों ने रिक्शा तय किया और जो पैदल आये थे वे पैदल ही निकल गये। मेरा घर ईदगाहभाठा में विवेकानंद आश्रम के पीछे था तो मैं डर रही थी। मेरे साथ पंकज तिवारी की बेटी वीणा तिवारी थी। हम लोग सत्ती बाजार जहां उस समय गुंडे दादा लोग रहते थे अक्सर चाकूबाजी होते रहती थी उसे पार करके जाना था। ब्राम्हण पारा चौक पर हमेंशा लड़कों का झुंड रहता था। हम लोग करीब दस बारह.लोग निकले तो श्याम टॉकिज के चौक पर लड़के थे तो हम लोग घबरा गये और श्याम टॉकिज में चले गये। वहां के मैनेजर ने कहा कि आराम से सिनेमा देखो तीन बजे तक सब शांत हो जायेगा तब जाना। पैसा नहीं लेगें। हम लोग अंदर बैठ गये पर घबराहट इतनी थी कि सिनेमा का नाम आज तक याद नहीं आया। वहां से निकले तो फिर बाहर चौक में लड़के खड़े थे। वे लोग पूछे कि अभी तक कहां थे? हम लोग सिनेमा देख रहे थे बोले तो वे लोग नाराज होकर बोले तुम लोगों को घर पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है तो तुम लोग सीधे घर जाना। उसने एक हांका लगाया " लड़कियां जा रही है, ठीक से आगे भेजो" हम लोग सत्तीबाजार आ गये वहां भी लड़के ऐसा ही हांका लगाये। हम लोग कंकालीपारा आ गये वहां से ब्राम्हणपारा चौक आ गये। यहां से मैं अकेली हो गई थी और मेरा घर साइंस कालेज के रास्ते पर था। मैं चुप खड़ी थी तभी एक लड़का आकर कहां जाना है? पूछता है। मैं ईदगाहभाठा बोली तो चलो छोड़ कर आता हूं बोला और हिंदूस्पोर्टिंग मैदान तक छोड़ दिया। वहां से मैं अकेले घर पहुंची। माँ तो दरवाजे पर ही बैठी थी। सब बच्चे घर आ गये थे मैं ही नहीं पहुंची थी। माँ सोच रही थी कि किसी सहेली के घर पर रूक गई होगी। सब कुछ ठीक रहा दूसरे दिन के अखबार में लड़को के बारे में छपा था। स्कूल दो दिन बंद रहा। बाद में जब स्कूल गये तो हमारी प्राचार्य ने भी लड़को की तारीफ की। हम.लोग कालेज से भी पढ़ कर निकल गये। कई बार मांगो को लेकर छात्र नेता दंगा करते रहे पर किसी भी लड़की के साथ छेड़खानी नहीं हुई। यहां तक मैने देखा की इंदिराजी की हत्या के समय भी इतने दंगे हुये पर किसी लड़की या महिला के साद बदसलूकी नहीं हुई।
कल की घटना को लेकर दिल्ली की एक लड़की अनु दुबे संसद के बाहर एक गत्ता लेकर धरने पर बैठ गई। गत्ते पर लिखा था"अब डर डर कर जीना नहीं चाहती" कितनी पीड़ा थी उसके मन में। संवेदना से भरी अनु सायलेंसर से जले अपने हाथ से तुलना कर रही थी प्रियंका के जलने की घटना को। उसकी पीड़ा को आत्मसात कर रही थी। उसे महिला पुलिस थाने ले जाकर बहुत मारी। चप्पन जूते से भी मारी। एक नारी की संवेदना दूसरी नारी के लिये यह थी। बहुत दुख हुआ कि सात साल में निर्भया के दोषी को फांसी नहीं मिली। घटनायें लगातार हो रही है। संसद में भी लोग संवेदना प्रगट कर रहे है, सजा की मांग कर रहे हैं। यह काला दिन किसी डायरी में लिखा जारे ऐसा मुझे नहीं लगता पर दस्तावेजिकरण भी जरुरी है। डायरी ही ऐसी जगह है जहां हम तारीख के अनुसार घटनाओं को लिखते हैं। समाज में बदलाव आये इसके लिये क्या करें ?यह सोचना बहुत जरुर है। शिक्षा की कमी है या संस्कार की कमी है। विकास ने इसे निगल लिया या हम ही इसे भूल गये। आज ऐसा न हो कि सोनोग्राफी के सेंटर पर लिखा हो "पुरुष भ्रूण हत्या अपराध है। " एक माँ यह कहरही है की मेरे बेटे को फासी दे दो, दूसरी माँ कह रही है मेरे बेटे को भी जिंदा ला दो। एक औरत के मन में दहेज क प्रति इतनी घृणा हो जायेकी वह नारी भ्रूण को मार दे तो आज ऐसा समय आ गया है माँ और आप दोनों सोच रहे है कि हमारा बेटा भी कहीं बलात्कारी तो नहीं हो जायेगा? समाज को सतर्क होने की जरूरत है। आज बेटियां अर्थी को कंधा दे रही हैं, अग्नि दे रही है, पिंडदान कर रही हैं तो आज बेटों की क्या जरुरत है? दो माह से लेकर सत्तर साल तक की नारी क्रूरता की शिकार हो रही है। आज समाज परिवर्तन मांग रहा है। इन घटनाओं का भी दस्तावेजिकरण जरुरी है। यह डायरी ही है जिसने सन् 1970 की को भी याद दिला दी। आने वाले समय में इस क्रूरता को भी याद कर समाज अपने आप को सुधारने की कोशिश जरुर करेगा।

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