रविवार, 26 जुलाई 2020

नव वर्ष

हम लोग बच्चे थे तब नया साल नहीं मनाते थे। इसे इसाई लोग अपने क्रिसमस के साथ मनाते थे।
समय ने करवट ली, वैश्वीकरण का दौर आ गया। विदेशोंं से जींस आया। हिप्पी आये, हम लोग अपनी संस्कृति के साथ विदेशी संस्कृति को मिलाने लगे। जूते चप्पल पहन कर घर के अंदर जाना यहां तक जूते पहन कर सो जाना। बेड टी का चलन शुरु हो गया। दातून और मंजन की जगह पेस्ट ने ले लिया। घर में खाने के लिये टेबल आ गये। लकड़ी के चुल्हे की जगह गैस सिलेंडर आ गया। कोयले की जगह हीटर आ गया और अब इंडक्शन आ गया।

हम हिन्दूस्तान में रहते हैं। हमारा कलेंडर चैत्र माह से शुरु होता है।दिसम्बर में जहां ठंड पड़ती है वहां चैत्र में गूलाबी ठंड होती है। बसंत का आगमन होने लगता है। चारो तरफ फूल खिले रहते हैं और गर्भाधान की प्रक्रिया होने लगती है। बीज बनते है। यह मौसम ठंड में सिकुड़े जीवन में एक उर्जा भर देती है। काम जागने लगता है। सबसे बड़ी बात इस महिने में ही नवरात्र पड़ता है। सभी लोग देवी अराधना में लग जाते हैं। ईश्वर की अराधना करते है। इस एक माह में देश के सभी राज्यों में कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है। पूरे हिन्दूस्तान में खुशियां फैली रहती है। प्रकृति, जीव जंतु के साथ साथ मान् भी खुशियां मनाता है। जीवन के लिये जरुरी राशन जो फसलों के रूप में खड़ी रहती है उसकी कटाई मिंजाई पूरी हो जाती है। किसान अपनी दूसरी फसल भी लेने लगता है। चारो तरफ खुशियां फैली रहती है।
हम लोग आज एक जनवरी को नया साल मनाने लगे हैं। 31 तारीख को बारह बजे के पहले ही नया साल मना लेते हैं।रात को जागते हैं और पार्टी करते हैं। पता नह़ी क्या क्या खाते पीते हैं। बारह बजे के बाद मीठाई खा कर नये साल की शुरुआत करते हैं।
दूसरे दिन सूरज सिर पर आकर खड़ा हो जाता है तब उठते हैं।हमने तो रात को ही मीठाई खाकर नया साल मना लिया था। सुबह से क्या मतलब?
हिंदू कलेंडर में सुबह की शुरुआत सूर्योदय से होती है। रात को कुछ नहीं होता है। सुबह हमारी इंतजार में शाम में बदलने लगती है पर हम क्या कर रहे है।हम तो सो रहे थे अब उठ कर घूमने चले जाते हैं। मंदिर ,पर्यटन स्थल ,सिनेमा या फिर दोस्तों से मिलने चले जाते है। कुछ लोग पार्टी करते हैं।
चैत्र मे नये साल की शुरुआत दान पुण्य , पूजा पाठ में बीत जाता है। सात्विकता दिखाई देती है।
मैं अपनी पुरानी डायरी के पन्ने देख रही थी तब पता चला की मेरी मां खीर बनाती थी। रबड़ी खीर जलेबी अनरसा खाकर हम लोग नया साल मनाते थे। नइ बात या खुशी की शुरुआत हम लोग खीर से करते थे। अब तो होटल के खाने से ही खुशी जाहिर करते हैं। खीर तो अब बहुत कम ही बनता है। मेहमान के आने पर भी पनीर बनाते हैं खीर और हमारी संस्कृति के भोजन अब बिदाई ले रही है।रस मलाई ,गुलाबजामुन ही खा रहे हैं। नये साल के नाम पर हम अपनी संस्कृति को पीछे छोड़ रहे हैं हम अपना कलेंडर भूल रहे हैं।यह तो शादी और कुंडली बनाने के ही काम आता है। बच्चे का नाम रखना हो तो हिंदी कलेंडर याद आता है पर नव वर्ष के समय हम हंगामें में खो जाते हैं।

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