रविवार, 26 जुलाई 2020

मातृभाषा में शिक्षा

26 को संविधान बना था, जिसमें मातृभाषा में शिक्षा देनी चाहिये यह संविधान है। छत्तीसगढ़ राज्य बना एक नवम्बर सन् 2000 में, उस समय छत्तीसगढ़ी भाषा को माध्यम बनाने के लिये कोई आदेश.नहीं निकला। राजभाषा आयोग बना तो इसका उद्देश्य था छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रचार प्रसार करना परन्तु यह भी पुस्तक प्रकाशन और साल में दो कार्यक्रम तक ही सिमटा रहा। कार्यक्रम में भी विषयों की कमी झलकती रही। छत्तीसगढ़ी भाषा के लिये हर कक्षा में हिंदी के साथ चार छत्तीसगढ़ी के पाठ रख दिया गया। यह पाठ भी ठीक से पढ़ाया नहीं जा रहा है इसका कारण है बहुत से का छत्तीसगढ़ी नहीं समझना।छत्तीसगढ़ में सभी राज्य के लोग आकर बस गये हैं ,कुछ व्यापार करने के लिये आये हैं तो कुछ लोग सिर्फ नौकरी करने आये हैं। जो व्यापार के लोग आये हैं वे तो छत्तीसगढ़ी सीख गये क्योंकि यह उनकी जरुरत है पर जो नौकरी करने आये हैं वे छत्तीसगढ़ी नहीं सीखना चाहते है।
बहुत से आंदोलन करके छत्तीसगढ़ी भाषा के माध्यम की मांग कर रहे है। नंदकिशोर शुक्ला जी संविधान की कापी लेकर मंत्रियों को बता रहे हैं। लोगों को जगा रहे है। इसके साथ महिला क्रांतिसेना आंदोलन में लगी है। ये लोग दिल्ली में भी धरना दिये थे। दिल्ली में भी मंत्रियों से मिलकर अपनी बात रखे। विधानसभी तक बात पह़ुंचाई गई। पिछली सरकार के रहते भाषा को लेकर कोई काम नहीं हुआ।
नई सरकार आई तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति दिखने लगी। तीज त्यौहार की रौनक ऐसी दिखाई देने लगी की इसकी खूशबू दूसरे राज्यों तक पहुंच गई। खान पान तो अब सबकी थाली में दिखने लगी है। पर भाषा ?
गणतंत्र दिवस के दिन मुख्यमंत्री भूपेष बघेल जी ने छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक स्तर का माध्यम बनाने की घोषणा कर दिये। अगले शिक्षा सत्र से अब प्राथमिक स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा में पढ़ाई होगी। माध्यम छत्तीसगढ़ी ही होगी। एक आदेश और निकाला गया 27 जनवरी को। आंगनबाड़ी केन्द्र में अब स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जायेगी। मातृभाषा और बोली में शिक्षा देने से बच्चे का सम्पूर्ण होता है। बच्चों में समझने की शक्ति जल्दी विकसित होती है। वंनाचल क्षेत्र में अनुसूचित क्षेत्र में वहां की ही भाषा बोली से पढ़ाई कराई जयेगी। इसके पहल के लिये "महिला एवं बाल विकास" विभाग के सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी जी ने सभी कलेक्टरों को पत्र लिख कर बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाने के लिये कहा। आंगनबाड़ी के माध्यम से मानसिक ,शारीरिक और सामाजिक विकास की नींव डालने के लिये मातृभाषा में अनौपचारिक शिक्षा दी जायेगी। पठन सामाग्री का स्थानीय भाषा में शिक्षा देने की तैयारी शुरु हो गई है। स्कूली शिक्षा में छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हल्बी, भतरी, सरगुजिहा,कोरवा, पांडव, कुडुक और कमारी में पढ़ाई होगी।
छत्तीसगढ़ राज्य को बने बीस साल हो गये हैं । इन बीस सालों में आज गाँव गाँव तक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल गये हैं। जहां स्कूल नहीं खुले हैं वहां पर बड़े बड़े स्कूल की बसें आती हैं बच्चों को ले जाने के लिये। आज बहुत से घरों में बटलर हिंदी बोली जा रही है। छत्तीसगढ़ी को लोग पीछे छोड़ रहे थे जो छत्तीगढ़ राज्य बनने के बाद अच्छे से ओलने लगे हैं।आज की युवा पीढ़ी आज भी छत्तीसगढ़ी बोलने के कतराती है ऐसे समय में संविधान के अनुच्छेद की बात बता कर या फिर मातृभाषा में शिक्षा के नाम पर छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई शुरु करने की प्रतिक्रिया क्या होगी।लोग शासन का आदेश समझ कर पढ़ने लगेंगे पर सरकारी स्कूलों में बच्चों की कितनी संख्या रहेगी? यह सब विचारणीय तो है। आज साहित्यकारों के छत्तीसगढ़ी साहित्य को पढ़ने वाले नहीं मिलते हैं। इन साहित्य को पढ़ने वाले तो मिलेगे। साथ ही पूरा पाठ्यक्रम भी छत्तीसगढ़ी में तैयार होगा। मानकीकरण का काम भी अधूरा है।एक समय था पचास साठ साल पहले जब घरों में हिंद बोलना सीखाते थे। यह इस लम्बे दौर में घरों का वातावरण पूरी तरह से हिंदीमय हो गया है। गाँव तक हिंदी पहुंच गई थी अब अंग्रेजी पहुंच रही है। अब लौट कर छत्तीसगढी की ओर आना कितना सही होगा। मुझे तो बचपन की याद आ रही है जब हमारे घर में छत्तीसगढ़ी बोलना मना था। हम राष्ट्र भाषा हिंदी की ओर बढ़ रहे थे।गांव जाते थे तब भी हमारे सार सब हिंदी बोलते थे।शादी के बाद मैने छत्तीसगढ़ी बोलना शुरु किया।इतनी अच्छी छत्तीसगढ़ी हो गई की उससे लेखन और संपादन भी करने लगी। बीस साल से हम छत्तीसगढ़ी से भाग रहे थे अब उस छत्तीसगढ़ी को हर जुबान पर लाना है। पढ़ना है, बोलना और लिखन भी है। संविधान की बात को बीस साल पहले लागू कर दिये रहते तो आज तीन पीढ़ी तैयार हो जाती।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें