रविवार, 26 जुलाई 2020

माँ के लिये एक दिन

आज मुझे मेरी मां की बहुत याद आ रही है। 17 सितम्बर 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का जन्मदिन था। वे बहुत सा काम निपटा कर अपनी माँ से मिलने जाते है। सबसे पहले नर्मदा की पूजा किये उसके बाद माँ से मिलने गये। माँ के साथ खाना खाये। खाने में तुअर दाल, पूरन पुड़ी, देशी चना ,आलू भिंडी की सब्जी के खाना खाये।सादा भोजन और माँ क साथ बहुत कम लोगों को नसीब होता है। परिवार के कोई और लोग सामने नहीं आये। माँ सादगी से मिली और खाकर साथ बैठ कर बेटे के मुंह पोछी। एक मां के लिये बेटा तो बेटा होता है चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। मां ने पांच सौ रुपये दिये। पहले एक सौ एक देती थी। मोदी जी बहुत प्यार से पैसा लेकर जेब में रख लेते हैं। यही तो वह आशिर्वाद है जो हमेंशा साथ में रहेगा।

मां बेटे जब मिलते हैं तो दोनों के आँखो भाव पढ़ना चाहिये।माँ की ममता उसके हर अंग से दिखाई दे रही थी। मोदी जी कैसे निश्चिंत अपनी माँ के साथ बैठे थे। माँ कुछ बोल रही थी और वह सुन रहे थे। बीच में अपने रूमाल से बेटे का मुंह भी पोछती थी। मोदी जी छोटे बच्चे की तरह बैठे रहते हैं। मोदी जी के आँखो में माँ के प्रति प्रेम दिखाई देता है। मोदी जी सुरक्षा गार्ड से ज्यादा अपनी मां के पास अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। सही है माँ के आँचल से ज्यादा सुरक्षित कोई और जगह नहीं है। हर वर्ष मिडिया उनकी फोटो दिखाती है पर मिडिया घर के अंदर नहीं जाती और उनके परिवार के लोगों को नहीं दिखाती। कोई और होता तो अपने परिवार घर सबकों दिखाता।

पूरे देश को चलाने वाला प्रधानमंत्री जो किसी का बेटा भी है, अपनी मां को जन्मदिन पर नहीं भूलता है। माँ से आशीर्वाद लेने जाता है। उसे अपने काम से ज्यादा माँ से मिलना जरुरी लगता है। आज हम अपनी माँ को काम के बाद रखते हैं।

आज हम इतने व्यस्त हो गये हैं कि चालीस किलोमीटर की दूरी भी पार करके माँ का आशीर्वाद लेने नहीं जा सकते है।शहर में एक ही घर में भी माँ के पास एक घंटा नहीं बैठ सकते हैं। आज बचपन और माँ याद आ रही है। पहले न तो केक काटते थे और न पार्टी होती थी। माँ बढ़िया खीर बनाती थी और सब लोग बैठ कर खीर पूड़ी खाते थे। कभी गिफ्ट नहीं मिला और सिर्फ प्यार मिला। उस एक दिन की खुशियां साल भर प्रेरणा देती थी। आज तो जन्मदिन तीज त्योहार में पर छुने की प्रथा भी दम तोड़ रही है। हमारी युवा पीढ़ी अब अंग्रेजी संस्कृति की ओर बढ़ रही है ,केक काटती है और माँ बाप को पप्पी लेती है। वही आज हमारी तीसरी पीढ़ी भी वही कर रही है। आज हमें इन बड़े और सादगी पूर्ण लोगों से कुछ सीखना चाहिये। यादों के पन्ने खुलते जाते हैं जब ऐसी कोई घटना होती है।

चंद्रयान

आज मुझे अपनी डायरी के पुराने पन्ने याद आ रहे हैं। बचपन की कुछ यादें ताजा हो रही हैं। आज भारत का चंद्रयान चांद पर उतरने वाला था। यान जब चांद से सिर्फ 2.1 किलोमीटर दूर था तभी उसका संम्पर्क टूट गया। वह नौ सेकंड के बाद ही उतरने वाला था। यह पूरी तरह से स्वदेशी यान था। इस यान ने पुष्पक विमान की याद दिला दी। हमारी पौराणिक कथाओं में ग्रहों का मानवीकरण है। ये लोग एक ग्रह से दूसरे ग्रह में विचरण करते थे। 47 दिन पहले बहुत ही अरमानों के साथ चंद्रयान -2 भारत से भेजा गया था। यह उस स्थान पर उतरने वाला था जहां अंधेरा रहता है। रोशनी बहुत कम समय के लिये आती है और तापमान माइनस में रहता है। पानी की खोज के लिये गया यान ने हमारा साथ छोड़ दिया। " विक्रम "नाम का यान " प्रज्ञान "नाम की छोटी गाड़ी को छोड़ता और इससे ही पता चलता वहां की मिट्टी ,भूकंप, चट्टानों बारे में। "विक्रम" लैंडर है और "प्रज्ञान" रोवर है।
अंतिम "दहशत के वो पंद्रह मिनट " " 15 मिनट ऑफ टैरर" सभी टी वी के सामने बैठे थे। आज भारत जाग रहा था। पहले चरण में विक्रम तीस किलोमीटर से 7.4 किलोमीटर पर आया। दूसरे चरण में 7.5 से 5 किलोमीटर तक उतरा, तीसरे चरण में 5 किलोमीटर से नीचे उतरते समय सम्पर्क टूट गया। एक बज कर तिरपन मिनट पर उतरने वाला विक्रम एक बज कर इंकावन मिनट पर इसरो से सम्पर्क टूट गया। सभी दुखी थे।पर हमारे पी एम ,नरेंद्र मोदी जी ने् इसरो प्रमुख के सिवन को गले लगा कर बहुत अच्छी बात कही। "जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं। यह कोई छोटी उपलब्धी नहीं है। देश आप पर गर्व करता है। आपकी इस मेहनत ने बहुत कुछ सीखाया है। अच्छे के लिये आशा करें। हर हार से हम बहुत कुछ सीख रहे हैं।मैं पूरी तरह आपके साथ हूं। हिम्मत के साथ चलें। आपके पुरुषार्थ से देश फिर से खुशी मनाने लग जायेगा।" यह मिशन सफल होता तो भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बन जाता।
रात जागने वाला भारत उदास हो गया।
मुझे 20 जुलाई सन् 1969 का वह दिन याद आ गया जब अपोलो 11 ने चांद पर उतर कर एक रिकार्ड बनाया था। कई असफलता के बाद मानव सहित विमान भेजा गया। बहुत से प्रयोग बंदर और चिंपाजी पर किये गये थे। अंतरराष्ट्रीय समय 20.17.39 बजे चांद पर उतरा था। ये लोग वापस 24 जुलाई को प्रशांत महासागर में उतरे थे। सन् 1969 - 1972 तक छै अपोलो मिशन चांद पर गये उसमें से पांच ही सफल हुये थे। अपोलो 11 में तीन लोग गये थे। नील आर्मस्ट्रांग, कॉलिंस, ऐल्ड्रीन। इसमें से दो लोग नील आर्मस्ट्रांग और ऐल्ड्रीन ही चांद पर उतरे थे और 31 घंटे और 31 मिनट चांद पर रहे। हम लोग स्कूल में पढ़ रहे थे। चांद पर मानव के कदम रखने पर पूरे भारत में छुट्टी दे दी गई थी।
हम लोगों को सिनेमा घर ले जाकर उनको चांद पर चहलकदमी करते हुये दिखाये। मन बहुत खुश हो रहा था जिस चांद को हम देखते रहते हैं उस तक मानव पहुंच गया। उसके बाद चांद पर कोई नहीं गया। भारत का एक प्रयास था कि वहां की मिट्टी, हवा, पानी, भूकम्प का परिक्षण करें। पर चांद अपने को समेटे रखना चाहता था। वरना दो किलोमीटर पहले ही सम्बंध टूटना आश्चर्यजनक घटना है।जो यान 384400 किलोमीटर का रास्ता तय करके चांद की परिक्रमा करने लगी वह दो किलोमीटर पहले कैसे हमसे सम्बंध थोड़ सकती है?बहुत दुख हुआ बचपन में देखी गई नील आर्मस्ट्रांग की चहलकदमी याद आने लगी।

प्रेम और पुरुष

मैं एक दिन बैठ कर पुरानी डायरी देख रही थी जिसमें मुझे "प्रेम और पुरुष " पर लिखा कुछ मिल गया। आप भी पुरानी डायरी के पन्नों को पढ़िये।
" प्रेम एक अलौकिक वरदान है। प्रेम, ममता वातसल्य नारी के पास अपार रुप से होती है परन्तु पुरुष इससे दूर दिखाई देता है। दिखने में नारियल की तरह कठोर दिखने वाला पुरुष अंदर से कच्चे नारियल के भेले की तरह नरम और दिल नारियल के पानी की तरह स्वच्छ साफ मीठा होता है। एक पुरुष में प्रेम देखना हो तो उसके अंदर जाना पड़ता है। नारियल के टूटने से तरल पदार्थ याने मीठा जल बाहर आता हैऔर सबको तृप्त कर देता है।

एक पुरुष के प्रेम को पाने के लिये या देखने के लिये उसके सक्त परत को तोड़ने की जरुरत होती है। पुरुष अपने मुंह से बहुत सी बातें नहीं कहते हैं परन्तु उनकी आँखे कह देती हैं। शब्दों की जरुरत ही नहीं होती है। जब पत्नी दुखी हो तो कंधे पर रखा एक हाथ पत्नी में असीम उर्जा का संचार करता है। आफिस से लौटते समय एक मोंगरे की माला खरीद कर घर पहुंच कर पत्नि के हाथो पर उसे रखता है तो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह देता है। पत्नि शरमाते हुये जब वेणी लेती है तब उसकी झुक नजरें पति की कठोरता को ऐसे तोड़ कर रख देती है कि उसके दिल की निश्छलता मुस्कान से टपकने लगती है। एक पुरूष का निश्छल प्रेम

गोद में बैठी बिटिया जब गालों को छूती है तब वात्सल्य के रुप में प्रेम छलकता है तो बिटिया के गालों पर एक चुम्न अंकित कर देता है। ताली बजाती बिटिया को देख क कठोरता टूट जाती है और प्रेम की धारा बहने लगती है। यह प्रेम की धारा बिटिया की बिदाई पर आँसू बनके टपकने लगती है। पत्नि के विछोह पर भी आँसू गंगा जमना की तरह बहने लगती है परन्तु बाहर की कठोरता उसे जल्द.ही अपने घेरे में ले लेती है। पुरुष अपने प्रेम को हर छण प्रगट नहीं करता है। वह तो ईश्वर की अराधना में चढ़ते फल की तरह कभी कभी ही बाहर आती है। एक पुरुष के प्रेम का प्रशाद विशेष छणों में ही मिलता है। यह एक प्रकृति का दिया उपहार है।" यह पन्ना दो अप्रेल 2011 का है जिसे आज फिर लिखने की जरुरत है।

आज प्रेम की परिभाषा बदल रही है. यह अलौकिक वरदान अब अभिश्राप भी बनते जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी शारिरिक सम्बध बनाने के लिये इस पवित्र प्यार का नाटक करते है। यह नाटक और असल में फर्क समझने की भावना अब कमजोर हो रही है। असल और नकल के भेद को समझने की क्षमता को आज शोसल मिडिया के प्रेम ने समाप्त कर दिया है। समय रहेगा तभी तो हम प्रेम को समझेंगे। प्रेम क समझने और महसस करने के लिये पर्याप्त समय चाहिये, मशीनी जीवन नहीं।

बढ़ते कद का रावण

आज मैं शाम को घूमने निकली तो देखी की हमारे घर के पा बहुत बड़ा करीब अस्सी फीट का रावण खड़ा हो रहा है। पूरा बन चुका है पर उसे सजाने का काम चल रहा ह।कागज लपेटे जा रहे थे। मैं खड़े होकर उसे ध्यान से देख रही थी। मुझे लगा कि उसके आँसू टपक रहे हैं।मन से एक सवाल निकला-" कागज के रावण के आँखों में आँसू?"मन से मन की बात होने लगी विचारों के माध्यम से।

रावण ने कहा " हर वर्ष मेरा कद बढ़ाते जा रहे हैं, मेरा पुतला जगह जगह रख रहे हैं। उसे जलाने अब बड़े बड़े नेता आ रहे हैं। मेरा कद बढ़ रहा है तो मुझे मारने वाले का पद बढ़ रहा है। " हां यह सच है तो तुम्हे क्या तकलीफ है मैने कहा तो वह बोल उठा "बहुत तकलीफ है। सैकड़ो साल से मुझे जला रहे हों पर मैं तो बढ़ते ही जा रहा हूं। कभी जल कर मरा हूं या फिर मुझे तुम लोग भूले हो। मैने तो सीता को जब उठाया तभी छूआ था उसके बाद तो मैं सिर्फ बात ही किया हूं। कभी सीता को छुआ नहीं।" सही बोल रहे हो रावण, मैने कहा तो लगा जैसे मैने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है।

रावण ने फिर कहा " मुझे मारने.वाला राम तो हो? झूठ, रिश्वत में डूबा व्यक्ति मुझे मार रहा है। अमर्यादित व्यक्ति मुझे मार रहा है। कुछ वर्षो से तो दुराचारी व्यक्ति मुझे मारने आता है तब मैं रो उठता हूं। कलयुग में तो शायद ही कोई राम जैसा हो? रास्ते में चलते ,बस में चढ़ते या सिनेमा हॉल में या फिर मेले में करीब करीब हर पुरुष नारी को गलत नजर से देखता और छुता है। आज तो ब्राम्हण बन भागवत सुनाता रामायण सुनाता संत भी दुराचारी हो गया है। वह मुझे क्या मारेगा? आज बड़े पद में बैठा व्यक्ति और नेता भी बलात्कारी होगया है, क्या उसे हक है मुझे मारने का? पहले अपने आप को देख लें कि वे कितने पानी में हैं फिर मुझे मारें। मुझे र साल मार मार कर जिवित रखे हैं। मारना है तो दुराचारी को मारे बलात्कारी को मारे। इसे तो आज के समय में.सजा भी नहीं मिलती है, उसे क्यों नहीं जिंदा जला देते। मैं तो एक बार में ही मर गया था। आज किसे मार रहें है। रामलीला तो ठीक है। जिसमे रावण प्रतिकात्मक रुप से मर जाता है, उसे बार बार जलाना क्यों?"

रावण के आँसू झरझर झरझर बहने लगे। मै भी सोचने लगी आखिर यह रालणको मारने की प्रथा क्यों शुरु की गई। इसे रामलीला तक ही सीमित रखना था। बार बार रावण का कद बढ़ा कर बलात्कारी को भी बढ़ा रहे हैं।इन बलात्कारियों के पुतले क्यों नहीं? हर साल इन्ही के पुतलों को जलाया जाये। आज फिर से एक बार रामलीला की शुरुआत हो और रालण के पात्र को ही गिर कर मरते दिखाया जाये न कि इस तरह से रावण को मारा जाये।
हमारी कथाये राम ने रावण को मारा तक ही न हो। आज इस कथा को नहीं जानने वाले रावण को सोशल मिडिया में बलात्कारी भी लिख रहे है। आज हमारी जानकारी भी किस गंदी दिशा की ओर जा यही है। आज संजीवनी बूटी किसके लिये लेकर आये थे हनुमान उसका उत्तर नहीं दे पाते हैं। राम लोग कितने भाई है उसे नहीं बता पाते हैं पर यह जरुर जानते है कि रावण ने सीता का हरण किया तो राम ने रावण मार दिया। बस हमारी एख युग की कथा का समापन हो जाता है।
अब भी हम लोग सोच सकते है रावण को जलाये या फिर राम कथा का मंचन कर हर साल बलात्कारी को मारे या जलायें।
चलिये आज के लिये इतना ही काफी है, पुतले के आँसू ने कुछ तो चिंतन करने का विषय दिया।

नव वर्ष

हम लोग बच्चे थे तब नया साल नहीं मनाते थे। इसे इसाई लोग अपने क्रिसमस के साथ मनाते थे।
समय ने करवट ली, वैश्वीकरण का दौर आ गया। विदेशोंं से जींस आया। हिप्पी आये, हम लोग अपनी संस्कृति के साथ विदेशी संस्कृति को मिलाने लगे। जूते चप्पल पहन कर घर के अंदर जाना यहां तक जूते पहन कर सो जाना। बेड टी का चलन शुरु हो गया। दातून और मंजन की जगह पेस्ट ने ले लिया। घर में खाने के लिये टेबल आ गये। लकड़ी के चुल्हे की जगह गैस सिलेंडर आ गया। कोयले की जगह हीटर आ गया और अब इंडक्शन आ गया।

हम हिन्दूस्तान में रहते हैं। हमारा कलेंडर चैत्र माह से शुरु होता है।दिसम्बर में जहां ठंड पड़ती है वहां चैत्र में गूलाबी ठंड होती है। बसंत का आगमन होने लगता है। चारो तरफ फूल खिले रहते हैं और गर्भाधान की प्रक्रिया होने लगती है। बीज बनते है। यह मौसम ठंड में सिकुड़े जीवन में एक उर्जा भर देती है। काम जागने लगता है। सबसे बड़ी बात इस महिने में ही नवरात्र पड़ता है। सभी लोग देवी अराधना में लग जाते हैं। ईश्वर की अराधना करते है। इस एक माह में देश के सभी राज्यों में कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है। पूरे हिन्दूस्तान में खुशियां फैली रहती है। प्रकृति, जीव जंतु के साथ साथ मान् भी खुशियां मनाता है। जीवन के लिये जरुरी राशन जो फसलों के रूप में खड़ी रहती है उसकी कटाई मिंजाई पूरी हो जाती है। किसान अपनी दूसरी फसल भी लेने लगता है। चारो तरफ खुशियां फैली रहती है।
हम लोग आज एक जनवरी को नया साल मनाने लगे हैं। 31 तारीख को बारह बजे के पहले ही नया साल मना लेते हैं।रात को जागते हैं और पार्टी करते हैं। पता नह़ी क्या क्या खाते पीते हैं। बारह बजे के बाद मीठाई खा कर नये साल की शुरुआत करते हैं।
दूसरे दिन सूरज सिर पर आकर खड़ा हो जाता है तब उठते हैं।हमने तो रात को ही मीठाई खाकर नया साल मना लिया था। सुबह से क्या मतलब?
हिंदू कलेंडर में सुबह की शुरुआत सूर्योदय से होती है। रात को कुछ नहीं होता है। सुबह हमारी इंतजार में शाम में बदलने लगती है पर हम क्या कर रहे है।हम तो सो रहे थे अब उठ कर घूमने चले जाते हैं। मंदिर ,पर्यटन स्थल ,सिनेमा या फिर दोस्तों से मिलने चले जाते है। कुछ लोग पार्टी करते हैं।
चैत्र मे नये साल की शुरुआत दान पुण्य , पूजा पाठ में बीत जाता है। सात्विकता दिखाई देती है।
मैं अपनी पुरानी डायरी के पन्ने देख रही थी तब पता चला की मेरी मां खीर बनाती थी। रबड़ी खीर जलेबी अनरसा खाकर हम लोग नया साल मनाते थे। नइ बात या खुशी की शुरुआत हम लोग खीर से करते थे। अब तो होटल के खाने से ही खुशी जाहिर करते हैं। खीर तो अब बहुत कम ही बनता है। मेहमान के आने पर भी पनीर बनाते हैं खीर और हमारी संस्कृति के भोजन अब बिदाई ले रही है।रस मलाई ,गुलाबजामुन ही खा रहे हैं। नये साल के नाम पर हम अपनी संस्कृति को पीछे छोड़ रहे हैं हम अपना कलेंडर भूल रहे हैं।यह तो शादी और कुंडली बनाने के ही काम आता है। बच्चे का नाम रखना हो तो हिंदी कलेंडर याद आता है पर नव वर्ष के समय हम हंगामें में खो जाते हैं।

दीदी का मातृत्व भरा प्यार

आज दादा मुनी का जन्म दिन है। जब किशोर कुमार एक साल के थे तब अशोक कुमार.पढ़ाई करने विदेश चले गये। किशोर कुमार चार साल के थे तब वे पढ़ कर वापस आये। अशोक कुमार आये तो उसकी मां ने उन्हें बहुत ही प्यार से खीर खाने के लिये दिया। किशोर कुमार ने पूछा की "ये कौन है?" माँ ने कहा कि ये तुम्हारे बड़े भाई हैं। किशोर कुमार उनके पैरों से लिपट कर " दाना मुनी" कहा तब से अशोक कुमार सबके दादा मुनी बन गये। दादा मुनी ने ही अपने भाई को क्ला के क्षेत्र में आगे बढ़ाया।
मै भी उही किशोर कुमार की जगह अपने आप को देखती हूं जब मेरे से ग्यारह बारह साल बड़ी बहन मुझे ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाई थी।किस्से कहानियों में माँ के साथ खोई रहती थी तो दीदी मुझे उससे आगे ले जाती थी। परी लोक में ,कल्पना की दुनिया में विचरण कराती थी। छोटी छोटी कहानियां तो मैं सुनाने.लगी पर कविता तो मेरे लिये बहुत ही कठिन था। दीदी ने मुझे आसमान दिखा कर बताया कि देखो और उस पर लिखो।.आसमान का नीला ,पीला , भूरा ,कपसिले तो कभी दूधिया बादल अपनी आकृतियों से मुझे आकर्षित करने लगे फिर क्या था बनने लगी कविता।आसमान में उड़ते पक्षी तो कभी पैड़ो पर बैठती तितलियि यही मेरे कविता के विषय रहे। ऊंगली पकड़ कर चलना सीखी थी तो साहित्य की दुनिया में भी मैने दीदी की ऊ़गली पकड़ कर ही आ गई। फिर क्या था डरते सहमत अपनी कल्पना लोक की परियों को मैने शब्द दिये।प्रकृति को मैने अपने में आत्मसात कर लिया और लिखने लगी संवेदना से भरी कवितायें। मैं पत्ती में हूं, मैं फूल में हूं , मैं ही तो वृक्ष में हूं। नदी तालाब सब में मैं हूं। मुझे दिखने लगी और महसूस होने.लगी उनकी खुशी ,उनका दर्द, उनकी ईच्छायें।
आज हम दोनों बहने लिखती हैं कला और साहित्य में सबकी अपनी जगह है। दाना मुनी अपनी जगह थे तो उसी प्रखार दीदी भी अपनी जगह है।किशोर कुमार अपनी जगह थे तो उसी प्रकार मैं अपनी जगह पर हूं।किसी की किसी से कोई तुलना ही नहीं है।सभी का क्षेत्र एक होते हुरे भी अलग अलग है।सभी का व्यक्तित्व अलग अलग होता है वैसे ही हमारा भी व्यक्तित्व अलग अलग है। किही ने कहा कि आप दोनों बहने लता मंगेशकर.और आशा भोसले की तरह हैं। नहीं हम.लोग लता आशा हर्गिज नहीं हैं। उनमें तुलना होती है।वे स्वयं भी किसी के आगे बढ़ने पर परेशान हो जाती हैं पर दादा मुनी और किशोर कुमार के बीच ऐसा बिल्कुल नहीं था।
मेरी दीदी डा. सत्यभामा आड़िल ,शिक्षाविद हैं, लेखिका है। उन्होने पैतिस चालिस लोगों को शोध करवाया है। उन्होने समाज के उत्थान के लिये बहुत काम किया है। मै भी व्याख्याता रही ह़ूँ। मुझे आर्ट में रुचि है बहुत सी कलायें जानती हें। मैं भी लेखन करती हूं ,बहुत सी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं पर हम दोनों बहन बिल्कुल अलग है।
मैं शायद अपनी दीदी के लेखकीय क्षेत्र में चली गाई हूं।ऊन्होने हाथ पकड़ कर चलना सीखाया था न तो मैं आज तक ऊ़गली पकड़ कर ही चल रही हूं लग रहा है। किसी को भी हमारी तुलना नहीं करनी चाहिये।
आज दादा मुनी के जन्मदिन पर उनको बहुत बहुत बधाई। उन्होने अपे भाइयों को अपने बच्चों की तरह प्यार किया करते थे। कभी अभिनय में उनके साथ प्रतियोगी नहीं बने। आज दीदी भी दिशा देती है मेरी प्रतियोगी नहीं है। फिर हमारी तुलना कैसी?

तीसरी बार की पुरी यात्रा

मैं पुरी पहिली बार 1980 में गई थी। दूसरी बार अपूर्व को.लेकर 1996 में गई थी। तीसरी बार जाने की बहुत इच्छा हो रही थी पर कोई साथ नहीं मिल रहा था। कई लोगों को बोल रही थी की पुरी जाना तो मुझे ले जाना पर किसी का साथ नहीं हो पा रहा था। अपूर्व जब पिछले साल पुरी गया तो मै भी साथ जाने वाली थी। मेरी सास ने लौह स्तम्भ के सामने बोल दिया था की जब भी बच्चा होगा तो उसे लेकर पूरी आयेंगे। बच्चा भी बारह वर्ष के बाद हुआ तो उसे 1996 में ले गये थे। अब शादी हो गई तब सोची की बहु को लेखक आशीर्वाद के लिये जाऊंगी पर साथ जाना नहीं हो पाया।
बीस तारीख को अचानक इंदु का फोन आया " दीदी पुरी चलोगे, कल चार बजे निकलेंगे।" अचानक चौबीस साल के बाद पूरी जाने के लिये ऑफर आ गया। मैं पहले तो नहीं बोली फिर जाने की सहमती दे दी।शाम को बेटे बहु को बताई तो अपूर्व तो खुशी से उछल पड़ा और बोला" अच्छा है बहुत दिनों से सोच रहे थे अब मामी बोल रही तो जाओ।" वह बैग तैयार कर दिया। दूसरे दिन महाशिवरात्रि थी। मैं रात के लिये रोटी सब्जी रख ली।हम लोग साढ़े तीन बजे ही रेल्वे स्टेशन पहुंच गये। अब तो पुरानी डायरी के पन्ने दिखने लगे और उसे पढ़ने लगी। बहुत दूर से दिखता समुद्र, शाम को लगा बाजार, खुला सा मंदिर, अंदर का परिसर भी खाली खाली। यह हमारा हनीमून था, सास ससुर और ननंद के साथ,हा हा हा हा।
आराम से पंडो से बचते दर्शन करके कल्प वृक्ष पर धागा बांध कर आ गये। खुला सा परिसर था। जगन्नाथ भगवान के मंदिर के सामने चौड़ा सा खुला रास्ता था। भाई बहु औ भतीजी का परिवार भी आ गया। हम लोग इलेक्ट्रिक गाड़ी में बैठ कर पांच नम्बर के प्लेटफार्म पर गये। रेल भी समय पर आ गई। हम लोग बैठ गये और गप्प मारते, कुछ कुछ खाते हुये पुरी पहुंच गये।
हम लोग सुबह नौ बजे पहुंचे तभी रेल में ही एक गाइड मिल गया जिससे हमने दो दिन घूमने का पैकेज ले लिया। वही हमें अपनी गाड़ी से होटल तक छोड़ दिया। पांच सात मिनट का रास्ता था। हम लोग तैयार होकर ग्यारह बजे नीचे आ गये। टेक्सी का रास्ता देख रहे थे।

हम लोग रास्ता देखते रहे और होटल में ही रुके एक दम्पत्ती बाहर खड़े थे उसे टेक्सी वाला लेकर चला गया। उसकी टेक्सी खड़ी थी। एक घंटे क बाद गलत फहमी का खुलासा हुआ। हम लोग उनकी टैक्सी में बैठ कर निकले। एक घंटे के बाद वह टेक्सी हमें मिली। वे लोग रास्ते में रूके थे। हम लोग गाड़ी बदल कर आगे बढ़े। करीब एक घंटे में चील्खा झील पहुंच गये।खाना खाकर बोटिंग किये। सुरक्षा कवच पहन कर गये थे, डॉल्फिन देखने जा रहे थे। उसके लिये दो घंटे का सफर था। पानी में तरह तरह के टापू देखते हुये आगे बढ़ रहे थे कि नाविक ने एक टापू पर रोक दिया। उस

टापू पर लाल केकड़े दिखाने एक व्यक्ति आया। हम लोग देखकर खुश हो गये। छोटे छोटे मरे हुये बंद सीप,कोरल लेकर आ गया। हमारे मना करने के बाद भी फोड़ने लगा ,बोलने लगा मोती देखो भले मत खरीदना। पांच मोती निकाला, मैं विडियो भी तैयार की। पांच सौ की मोती बोलकर दो सौ में उतर गया। उसके बाद ओपेल निकाला जिसकी कीमत पांच हजार बोल कर पंद्रह सौ में उतर गया। फिर.एक मूंगा निकाला एक हजार बोलन लगा। अब हम लोग सोचने लगे कि इतने बढ़िया आकार का तराशा हुआ नग नहीं निकल सकता। वहां से बहुत से सवाल लेकर डॉल्फिन देखने पहुंचे बहुत देर के बाद तीन चार बार पूंछ दिखी उसके बाद दो डॉल्फिन की पीठ दिखी। सपनो पर रोक लग गई। तब मुझे पुराने चील्खा झील की याद आई जहां से हम लोग एक टापू पर काली माई के मंदिर में पूजा करने गये थे। नाविक बताया की तूफान के कारण वह पूरी तरह से नष्ट हो गया है। हम लोग वापस आ गये। आने के बाद लगा की पुरी से चार घंटा आने जाने में, समुद्र आने जाने में चार घंटा याने आठ घंटे में कुछ भी मजा नहीं आया। कुछ लोग स्टोन में दो चार हजार लुटा भी दिये।

दूसरे दिन भुनेश्वर गये। पहले " चंद्रभागा " नदी या कहें समुद्र का किनारा देखे। यहां पर छत्तीसगढ़ की महानदी आकर समुद्र में मिलती है। बहुत ही सुंदर समुद्र किनारा है।पहले नदीआते हुये और मिलते हुये दिखाते थे।जगह बदल गई है लगता है। यहां से कोणार्क गये वह भी बहुत बदल गया है। तीसरी बर देखने पर लगा कि इसका व्यवसायी करण हो चुका है। मैं बैठी रही देखने को कुछ नहीं था। बार बार उन मुर्तियों को देखने का कोई मतलब नहीं था।
दाहिने तरफ के चक्के के साथ फोटो लेकर वापस आ गये। बाहर का बाजार तो सब जगह एक जैसे ही रहा, पर यहां पिपली वर्क मिल रहा था। यहां से नंदनकानन गये।यहां पर इतनी दुकाने और इतनी भीड़ से अच्छा जंगल सफारी है। वहां का नंदनकानन अब देखने लायक नहीं रह गया है। तूफान में वह भी खत्म हो चुका है।1980 का कानन याद आ गया, 1996 का नंदनकानन याद आ गया। वह पन्ने तो अब यादों के पन्ने बन गये हैं। बाहर बहुत सी दुकाने लगी थी जहां काजू और खसखस 400₹ किलो में मिल रहा था। दागदार काजू लेने के बाद लगा यह भी धोखा है।खंड
गिरी उदय गिरी छोड़ दिये। यहां से हम लोग साक्षी गोपाल देखने चले गये क्योंकि यह पुरी से 15 किलोमीटर पहले ही है।हम लोग पंडों से बिना बात किये ही दर्शन करके बाहर आ गये।पिछले दो बार आये थे तब यह बंद ही रहता था। कहा जाता है कि इसके दर्शन करना चाहिये यही जगन्नाथ भगवान के दर्शन के साक्षी रहत हैं। यहां नहीं जा पाये तो छत्तीसगढ़ के राजिम के साक्षी गोपाल के दर्शन करना चाहिये।

होटल में जाकर आराम करके समुद्र किनारा देखने चले गये।रात को लहरें बहुत ही सुदर लग रही थी। रात बारह बजे के खरीब म लोग वापस ये।बाजार में तरह तरह की चीजें बिक रही थी यह सब पहले की तरह ही है। बस किनारे में बहुत से होटल बन गये हैं। मेरी डायरी का यह पन्ना नहीं बदला है। अच्छा लगा कि कुछ तो पहले की तरह है।

यहां पर मोती, पन्ना, डायमंड, पुखराज, माणिक, ओपेल याने नवरत्न, मूंगा सब मिलता है। दो हजारपांच ,दस हजार स शुरू होता है,भाव गिराते गिराते बीस रुपये में दे देते है। इसका इतना बड़ा धंधा है की एक दिन में पांच हजार से दस हजार तक कमा लेते हैं। यहां से धोखा खाये लोग किसी को नहीं बताते हैं कि ये सब मत.खरीदना। जब बात खुलतीहै तो मजा लेते हैं की आप भी बुद्धु बने और आप भी बन गये।

रात को लौटते हुये खाना खाये। पहले दिन का अनुभव था कि यहां पर दस बजे तक सब होटल बंद हो जाते हैं। हमारे होटल के पास ही एक रेस्टोरेंट था जहां ग्यारह बजे तक खाना मिलता था वहां पर खाना खाये। मजा आ गया , एक प्लेट बिरयानी या फिर जीरा फ्राई को दो लोग खा सकते है या तीन लोग भी खा सकते हैं। वहां पर चांवल भर भर कर देते हैं। सभी जगह सब्जी दाल सब बढ़िया मिल रहा था।पुरानी डायरी के पन्ने याद आनू लगे जब चांवल तो ऐषा ह मिलता था पर दाल सब्जी में स्वाद नहीं रहता था।टूरिस्ट अच्छे खाने के लिये तरसता था।अच्छे होटल कहीं कहीं ही दिखते थे। अब रोटियां भी बढ़ियामिलती है, तंदूरी भी मिलती है। समुद्र के किनारे भी आमलेट ,मछली और रोटी सब्जी मिल रही थी। खाने की कमी नहीं थी।

हम लोग दूसरे दिन दस बजे जगन्नाथ मंदिर गये। वहां भी बहुत से लोग फुटपाथ पर सामान बेच रहे थे। रथ यात्रा के दिन दिखने वाला रास्ता फुटपाथ की दुकानों से भरा था। लोहे की रैलिंग लगी थी कि लोग लाइन से आयें। हम लोग एक गाइड करके पश्चिम के दरवाजे से गये। मुख्य मंदिर के बाहर के सभी मंदिर देख लिये। चिटियों की तरह लोग भरे थे। वहां दो मूर्ति पहले नहीं थी, एक साक्षी गोपाल और दूसरा बट गणेश। बट वृक्ष जिसे कल्प वृक्ष कहते हैं वह सन् 1980 में खुला था, उसमे मन्नत के लिये धागे बांधते थे। एक रूपये में खरीदते थे। 1996 में भी वह खुला ही था पर वहां पर एक कमरा बन गया है जहां पंडित अपनी दुकान खोल कर बैठा है। धागा बांधने के लिये 365₹ ले रहा है। उसकी बाहरी दीवार पर बट की डगाल के नीचे एक गणेश जी की स्थापन कर दी गई है । बट के नीचे है इस कारण " बट गणेश " जी हैं। यहां पर साक्षी गोपाल हैं तो लोग दूसरे साक्षी गोपाल के दर्शन के लिये क्यों जाते हैं?

हम लोगों को एक दरवाजे से अंदर दर्शन के लिये ले गया और भीड़ के साथ खड़ा कर दिया। बहुत धक्का खाते हम लोग दर्शन करते निकल गये। मुझे तो बस भगवान की एक आँख ही दिखाई दी। जगह जगह पाइप लगे है तो अंदर तक तीन लोगों की लाइन ही रखते तो सबको भगवान जी दिखते। मन की आँखो से देखते हुये हम लोग फिर समुद्र किनारे पहुंच गये।आटो से पुरी होटल के सामने तक गये ,वह 150₹ लिया। वहां पर दो बजे तक बैठे रहे।मैं तो समुद के लहरों के पास बैठ गई और कमर तक पानी का मजा लेते रही। पिछले दो बार में मैं बस लहरों को घुटने तक ही ली थी। एक घंटे पानी का मजा लेकर जल वरुण देवता को प्रणाम कर बाहर आई। फिर हम लोग अपने होटल की तरफ चले गये। रास्ते मे खाना खाये।

हमारी रेल दो घंटे लेट थी तो हम लोग रात का खाना पैक करा कर शाम सात बजे होटल से निकले। प्लेटफार्म पांच पर पुरी दुर्ग एक्सप्रेस खड़ी थी।हम लो ए सी टू में बैठ गये। मैं मेरी भाई बहु इंदु, भतीजी शिखा कश्यप और दामाद नवीन को एक ही कूपा मिल गया था। भतीजी नातिन चेरी के साथ बातें करते हम लोग दूसरे दिन रायपुर पहुंच गये।एक सुखद यात्रा तो रही पर तीर्थ पर या पर्यटन स्थल पर कितनी लूट होती है इसका उदाहरण है पुरी। आस्था के नाम कर जगन्नाथ की कसम खाकर भी लोग नकली सामान बेच देते हैं। चालीस साल में बहुत कुछ बदल गया है। दिल से मैने अपने छोटे भाई रवि को धन्यवाद दिया कि उसके न जा पाने के कारण मेरी तीसरी बार पुरी जाने की इच्छा पूरी हो गई। कहानी का अंत ऐसे ही नहीं होता है , तो कैसे? आप लोग भी सोशल मिडिया के कारण भूल गये, चलिये याद दिलाती हूं। हमारी दादी नानी कहानी के अंत में कहती है की " जैसे उसकी इच्छा पूरी हुई वैसी सबकी इच्छा पूरी हो" भाई की इच्छा भी जल्द ही भगवान पूरी करे।

मैं डायरी के इन पन्नों को आपके लिये भेज रही हूं। आप लोग " पुरी" जायें तो ऐसे ठगों से दूर रहें, जो खरीदना है अपने शहर में खरीदें।