रविवार, 26 जुलाई 2020

बढ़ते कद का रावण

आज मैं शाम को घूमने निकली तो देखी की हमारे घर के पा बहुत बड़ा करीब अस्सी फीट का रावण खड़ा हो रहा है। पूरा बन चुका है पर उसे सजाने का काम चल रहा ह।कागज लपेटे जा रहे थे। मैं खड़े होकर उसे ध्यान से देख रही थी। मुझे लगा कि उसके आँसू टपक रहे हैं।मन से एक सवाल निकला-" कागज के रावण के आँखों में आँसू?"मन से मन की बात होने लगी विचारों के माध्यम से।

रावण ने कहा " हर वर्ष मेरा कद बढ़ाते जा रहे हैं, मेरा पुतला जगह जगह रख रहे हैं। उसे जलाने अब बड़े बड़े नेता आ रहे हैं। मेरा कद बढ़ रहा है तो मुझे मारने वाले का पद बढ़ रहा है। " हां यह सच है तो तुम्हे क्या तकलीफ है मैने कहा तो वह बोल उठा "बहुत तकलीफ है। सैकड़ो साल से मुझे जला रहे हों पर मैं तो बढ़ते ही जा रहा हूं। कभी जल कर मरा हूं या फिर मुझे तुम लोग भूले हो। मैने तो सीता को जब उठाया तभी छूआ था उसके बाद तो मैं सिर्फ बात ही किया हूं। कभी सीता को छुआ नहीं।" सही बोल रहे हो रावण, मैने कहा तो लगा जैसे मैने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है।

रावण ने फिर कहा " मुझे मारने.वाला राम तो हो? झूठ, रिश्वत में डूबा व्यक्ति मुझे मार रहा है। अमर्यादित व्यक्ति मुझे मार रहा है। कुछ वर्षो से तो दुराचारी व्यक्ति मुझे मारने आता है तब मैं रो उठता हूं। कलयुग में तो शायद ही कोई राम जैसा हो? रास्ते में चलते ,बस में चढ़ते या सिनेमा हॉल में या फिर मेले में करीब करीब हर पुरुष नारी को गलत नजर से देखता और छुता है। आज तो ब्राम्हण बन भागवत सुनाता रामायण सुनाता संत भी दुराचारी हो गया है। वह मुझे क्या मारेगा? आज बड़े पद में बैठा व्यक्ति और नेता भी बलात्कारी होगया है, क्या उसे हक है मुझे मारने का? पहले अपने आप को देख लें कि वे कितने पानी में हैं फिर मुझे मारें। मुझे र साल मार मार कर जिवित रखे हैं। मारना है तो दुराचारी को मारे बलात्कारी को मारे। इसे तो आज के समय में.सजा भी नहीं मिलती है, उसे क्यों नहीं जिंदा जला देते। मैं तो एक बार में ही मर गया था। आज किसे मार रहें है। रामलीला तो ठीक है। जिसमे रावण प्रतिकात्मक रुप से मर जाता है, उसे बार बार जलाना क्यों?"

रावण के आँसू झरझर झरझर बहने लगे। मै भी सोचने लगी आखिर यह रालणको मारने की प्रथा क्यों शुरु की गई। इसे रामलीला तक ही सीमित रखना था। बार बार रावण का कद बढ़ा कर बलात्कारी को भी बढ़ा रहे हैं।इन बलात्कारियों के पुतले क्यों नहीं? हर साल इन्ही के पुतलों को जलाया जाये। आज फिर से एक बार रामलीला की शुरुआत हो और रालण के पात्र को ही गिर कर मरते दिखाया जाये न कि इस तरह से रावण को मारा जाये।
हमारी कथाये राम ने रावण को मारा तक ही न हो। आज इस कथा को नहीं जानने वाले रावण को सोशल मिडिया में बलात्कारी भी लिख रहे है। आज हमारी जानकारी भी किस गंदी दिशा की ओर जा यही है। आज संजीवनी बूटी किसके लिये लेकर आये थे हनुमान उसका उत्तर नहीं दे पाते हैं। राम लोग कितने भाई है उसे नहीं बता पाते हैं पर यह जरुर जानते है कि रावण ने सीता का हरण किया तो राम ने रावण मार दिया। बस हमारी एख युग की कथा का समापन हो जाता है।
अब भी हम लोग सोच सकते है रावण को जलाये या फिर राम कथा का मंचन कर हर साल बलात्कारी को मारे या जलायें।
चलिये आज के लिये इतना ही काफी है, पुतले के आँसू ने कुछ तो चिंतन करने का विषय दिया।

नव वर्ष

हम लोग बच्चे थे तब नया साल नहीं मनाते थे। इसे इसाई लोग अपने क्रिसमस के साथ मनाते थे।
समय ने करवट ली, वैश्वीकरण का दौर आ गया। विदेशोंं से जींस आया। हिप्पी आये, हम लोग अपनी संस्कृति के साथ विदेशी संस्कृति को मिलाने लगे। जूते चप्पल पहन कर घर के अंदर जाना यहां तक जूते पहन कर सो जाना। बेड टी का चलन शुरु हो गया। दातून और मंजन की जगह पेस्ट ने ले लिया। घर में खाने के लिये टेबल आ गये। लकड़ी के चुल्हे की जगह गैस सिलेंडर आ गया। कोयले की जगह हीटर आ गया और अब इंडक्शन आ गया।

हम हिन्दूस्तान में रहते हैं। हमारा कलेंडर चैत्र माह से शुरु होता है।दिसम्बर में जहां ठंड पड़ती है वहां चैत्र में गूलाबी ठंड होती है। बसंत का आगमन होने लगता है। चारो तरफ फूल खिले रहते हैं और गर्भाधान की प्रक्रिया होने लगती है। बीज बनते है। यह मौसम ठंड में सिकुड़े जीवन में एक उर्जा भर देती है। काम जागने लगता है। सबसे बड़ी बात इस महिने में ही नवरात्र पड़ता है। सभी लोग देवी अराधना में लग जाते हैं। ईश्वर की अराधना करते है। इस एक माह में देश के सभी राज्यों में कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है। पूरे हिन्दूस्तान में खुशियां फैली रहती है। प्रकृति, जीव जंतु के साथ साथ मान् भी खुशियां मनाता है। जीवन के लिये जरुरी राशन जो फसलों के रूप में खड़ी रहती है उसकी कटाई मिंजाई पूरी हो जाती है। किसान अपनी दूसरी फसल भी लेने लगता है। चारो तरफ खुशियां फैली रहती है।
हम लोग आज एक जनवरी को नया साल मनाने लगे हैं। 31 तारीख को बारह बजे के पहले ही नया साल मना लेते हैं।रात को जागते हैं और पार्टी करते हैं। पता नह़ी क्या क्या खाते पीते हैं। बारह बजे के बाद मीठाई खा कर नये साल की शुरुआत करते हैं।
दूसरे दिन सूरज सिर पर आकर खड़ा हो जाता है तब उठते हैं।हमने तो रात को ही मीठाई खाकर नया साल मना लिया था। सुबह से क्या मतलब?
हिंदू कलेंडर में सुबह की शुरुआत सूर्योदय से होती है। रात को कुछ नहीं होता है। सुबह हमारी इंतजार में शाम में बदलने लगती है पर हम क्या कर रहे है।हम तो सो रहे थे अब उठ कर घूमने चले जाते हैं। मंदिर ,पर्यटन स्थल ,सिनेमा या फिर दोस्तों से मिलने चले जाते है। कुछ लोग पार्टी करते हैं।
चैत्र मे नये साल की शुरुआत दान पुण्य , पूजा पाठ में बीत जाता है। सात्विकता दिखाई देती है।
मैं अपनी पुरानी डायरी के पन्ने देख रही थी तब पता चला की मेरी मां खीर बनाती थी। रबड़ी खीर जलेबी अनरसा खाकर हम लोग नया साल मनाते थे। नइ बात या खुशी की शुरुआत हम लोग खीर से करते थे। अब तो होटल के खाने से ही खुशी जाहिर करते हैं। खीर तो अब बहुत कम ही बनता है। मेहमान के आने पर भी पनीर बनाते हैं खीर और हमारी संस्कृति के भोजन अब बिदाई ले रही है।रस मलाई ,गुलाबजामुन ही खा रहे हैं। नये साल के नाम पर हम अपनी संस्कृति को पीछे छोड़ रहे हैं हम अपना कलेंडर भूल रहे हैं।यह तो शादी और कुंडली बनाने के ही काम आता है। बच्चे का नाम रखना हो तो हिंदी कलेंडर याद आता है पर नव वर्ष के समय हम हंगामें में खो जाते हैं।

दीदी का मातृत्व भरा प्यार

आज दादा मुनी का जन्म दिन है। जब किशोर कुमार एक साल के थे तब अशोक कुमार.पढ़ाई करने विदेश चले गये। किशोर कुमार चार साल के थे तब वे पढ़ कर वापस आये। अशोक कुमार आये तो उसकी मां ने उन्हें बहुत ही प्यार से खीर खाने के लिये दिया। किशोर कुमार ने पूछा की "ये कौन है?" माँ ने कहा कि ये तुम्हारे बड़े भाई हैं। किशोर कुमार उनके पैरों से लिपट कर " दाना मुनी" कहा तब से अशोक कुमार सबके दादा मुनी बन गये। दादा मुनी ने ही अपने भाई को क्ला के क्षेत्र में आगे बढ़ाया।
मै भी उही किशोर कुमार की जगह अपने आप को देखती हूं जब मेरे से ग्यारह बारह साल बड़ी बहन मुझे ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाई थी।किस्से कहानियों में माँ के साथ खोई रहती थी तो दीदी मुझे उससे आगे ले जाती थी। परी लोक में ,कल्पना की दुनिया में विचरण कराती थी। छोटी छोटी कहानियां तो मैं सुनाने.लगी पर कविता तो मेरे लिये बहुत ही कठिन था। दीदी ने मुझे आसमान दिखा कर बताया कि देखो और उस पर लिखो।.आसमान का नीला ,पीला , भूरा ,कपसिले तो कभी दूधिया बादल अपनी आकृतियों से मुझे आकर्षित करने लगे फिर क्या था बनने लगी कविता।आसमान में उड़ते पक्षी तो कभी पैड़ो पर बैठती तितलियि यही मेरे कविता के विषय रहे। ऊंगली पकड़ कर चलना सीखी थी तो साहित्य की दुनिया में भी मैने दीदी की ऊ़गली पकड़ कर ही आ गई। फिर क्या था डरते सहमत अपनी कल्पना लोक की परियों को मैने शब्द दिये।प्रकृति को मैने अपने में आत्मसात कर लिया और लिखने लगी संवेदना से भरी कवितायें। मैं पत्ती में हूं, मैं फूल में हूं , मैं ही तो वृक्ष में हूं। नदी तालाब सब में मैं हूं। मुझे दिखने लगी और महसूस होने.लगी उनकी खुशी ,उनका दर्द, उनकी ईच्छायें।
आज हम दोनों बहने लिखती हैं कला और साहित्य में सबकी अपनी जगह है। दाना मुनी अपनी जगह थे तो उसी प्रखार दीदी भी अपनी जगह है।किशोर कुमार अपनी जगह थे तो उसी प्रकार मैं अपनी जगह पर हूं।किसी की किसी से कोई तुलना ही नहीं है।सभी का क्षेत्र एक होते हुरे भी अलग अलग है।सभी का व्यक्तित्व अलग अलग होता है वैसे ही हमारा भी व्यक्तित्व अलग अलग है। किही ने कहा कि आप दोनों बहने लता मंगेशकर.और आशा भोसले की तरह हैं। नहीं हम.लोग लता आशा हर्गिज नहीं हैं। उनमें तुलना होती है।वे स्वयं भी किसी के आगे बढ़ने पर परेशान हो जाती हैं पर दादा मुनी और किशोर कुमार के बीच ऐसा बिल्कुल नहीं था।
मेरी दीदी डा. सत्यभामा आड़िल ,शिक्षाविद हैं, लेखिका है। उन्होने पैतिस चालिस लोगों को शोध करवाया है। उन्होने समाज के उत्थान के लिये बहुत काम किया है। मै भी व्याख्याता रही ह़ूँ। मुझे आर्ट में रुचि है बहुत सी कलायें जानती हें। मैं भी लेखन करती हूं ,बहुत सी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं पर हम दोनों बहन बिल्कुल अलग है।
मैं शायद अपनी दीदी के लेखकीय क्षेत्र में चली गाई हूं।ऊन्होने हाथ पकड़ कर चलना सीखाया था न तो मैं आज तक ऊ़गली पकड़ कर ही चल रही हूं लग रहा है। किसी को भी हमारी तुलना नहीं करनी चाहिये।
आज दादा मुनी के जन्मदिन पर उनको बहुत बहुत बधाई। उन्होने अपे भाइयों को अपने बच्चों की तरह प्यार किया करते थे। कभी अभिनय में उनके साथ प्रतियोगी नहीं बने। आज दीदी भी दिशा देती है मेरी प्रतियोगी नहीं है। फिर हमारी तुलना कैसी?

तीसरी बार की पुरी यात्रा

मैं पुरी पहिली बार 1980 में गई थी। दूसरी बार अपूर्व को.लेकर 1996 में गई थी। तीसरी बार जाने की बहुत इच्छा हो रही थी पर कोई साथ नहीं मिल रहा था। कई लोगों को बोल रही थी की पुरी जाना तो मुझे ले जाना पर किसी का साथ नहीं हो पा रहा था। अपूर्व जब पिछले साल पुरी गया तो मै भी साथ जाने वाली थी। मेरी सास ने लौह स्तम्भ के सामने बोल दिया था की जब भी बच्चा होगा तो उसे लेकर पूरी आयेंगे। बच्चा भी बारह वर्ष के बाद हुआ तो उसे 1996 में ले गये थे। अब शादी हो गई तब सोची की बहु को लेखक आशीर्वाद के लिये जाऊंगी पर साथ जाना नहीं हो पाया।
बीस तारीख को अचानक इंदु का फोन आया " दीदी पुरी चलोगे, कल चार बजे निकलेंगे।" अचानक चौबीस साल के बाद पूरी जाने के लिये ऑफर आ गया। मैं पहले तो नहीं बोली फिर जाने की सहमती दे दी।शाम को बेटे बहु को बताई तो अपूर्व तो खुशी से उछल पड़ा और बोला" अच्छा है बहुत दिनों से सोच रहे थे अब मामी बोल रही तो जाओ।" वह बैग तैयार कर दिया। दूसरे दिन महाशिवरात्रि थी। मैं रात के लिये रोटी सब्जी रख ली।हम लोग साढ़े तीन बजे ही रेल्वे स्टेशन पहुंच गये। अब तो पुरानी डायरी के पन्ने दिखने लगे और उसे पढ़ने लगी। बहुत दूर से दिखता समुद्र, शाम को लगा बाजार, खुला सा मंदिर, अंदर का परिसर भी खाली खाली। यह हमारा हनीमून था, सास ससुर और ननंद के साथ,हा हा हा हा।
आराम से पंडो से बचते दर्शन करके कल्प वृक्ष पर धागा बांध कर आ गये। खुला सा परिसर था। जगन्नाथ भगवान के मंदिर के सामने चौड़ा सा खुला रास्ता था। भाई बहु औ भतीजी का परिवार भी आ गया। हम लोग इलेक्ट्रिक गाड़ी में बैठ कर पांच नम्बर के प्लेटफार्म पर गये। रेल भी समय पर आ गई। हम लोग बैठ गये और गप्प मारते, कुछ कुछ खाते हुये पुरी पहुंच गये।
हम लोग सुबह नौ बजे पहुंचे तभी रेल में ही एक गाइड मिल गया जिससे हमने दो दिन घूमने का पैकेज ले लिया। वही हमें अपनी गाड़ी से होटल तक छोड़ दिया। पांच सात मिनट का रास्ता था। हम लोग तैयार होकर ग्यारह बजे नीचे आ गये। टेक्सी का रास्ता देख रहे थे।

हम लोग रास्ता देखते रहे और होटल में ही रुके एक दम्पत्ती बाहर खड़े थे उसे टेक्सी वाला लेकर चला गया। उसकी टेक्सी खड़ी थी। एक घंटे क बाद गलत फहमी का खुलासा हुआ। हम लोग उनकी टैक्सी में बैठ कर निकले। एक घंटे के बाद वह टेक्सी हमें मिली। वे लोग रास्ते में रूके थे। हम लोग गाड़ी बदल कर आगे बढ़े। करीब एक घंटे में चील्खा झील पहुंच गये।खाना खाकर बोटिंग किये। सुरक्षा कवच पहन कर गये थे, डॉल्फिन देखने जा रहे थे। उसके लिये दो घंटे का सफर था। पानी में तरह तरह के टापू देखते हुये आगे बढ़ रहे थे कि नाविक ने एक टापू पर रोक दिया। उस

टापू पर लाल केकड़े दिखाने एक व्यक्ति आया। हम लोग देखकर खुश हो गये। छोटे छोटे मरे हुये बंद सीप,कोरल लेकर आ गया। हमारे मना करने के बाद भी फोड़ने लगा ,बोलने लगा मोती देखो भले मत खरीदना। पांच मोती निकाला, मैं विडियो भी तैयार की। पांच सौ की मोती बोलकर दो सौ में उतर गया। उसके बाद ओपेल निकाला जिसकी कीमत पांच हजार बोल कर पंद्रह सौ में उतर गया। फिर.एक मूंगा निकाला एक हजार बोलन लगा। अब हम लोग सोचने लगे कि इतने बढ़िया आकार का तराशा हुआ नग नहीं निकल सकता। वहां से बहुत से सवाल लेकर डॉल्फिन देखने पहुंचे बहुत देर के बाद तीन चार बार पूंछ दिखी उसके बाद दो डॉल्फिन की पीठ दिखी। सपनो पर रोक लग गई। तब मुझे पुराने चील्खा झील की याद आई जहां से हम लोग एक टापू पर काली माई के मंदिर में पूजा करने गये थे। नाविक बताया की तूफान के कारण वह पूरी तरह से नष्ट हो गया है। हम लोग वापस आ गये। आने के बाद लगा की पुरी से चार घंटा आने जाने में, समुद्र आने जाने में चार घंटा याने आठ घंटे में कुछ भी मजा नहीं आया। कुछ लोग स्टोन में दो चार हजार लुटा भी दिये।

दूसरे दिन भुनेश्वर गये। पहले " चंद्रभागा " नदी या कहें समुद्र का किनारा देखे। यहां पर छत्तीसगढ़ की महानदी आकर समुद्र में मिलती है। बहुत ही सुंदर समुद्र किनारा है।पहले नदीआते हुये और मिलते हुये दिखाते थे।जगह बदल गई है लगता है। यहां से कोणार्क गये वह भी बहुत बदल गया है। तीसरी बर देखने पर लगा कि इसका व्यवसायी करण हो चुका है। मैं बैठी रही देखने को कुछ नहीं था। बार बार उन मुर्तियों को देखने का कोई मतलब नहीं था।
दाहिने तरफ के चक्के के साथ फोटो लेकर वापस आ गये। बाहर का बाजार तो सब जगह एक जैसे ही रहा, पर यहां पिपली वर्क मिल रहा था। यहां से नंदनकानन गये।यहां पर इतनी दुकाने और इतनी भीड़ से अच्छा जंगल सफारी है। वहां का नंदनकानन अब देखने लायक नहीं रह गया है। तूफान में वह भी खत्म हो चुका है।1980 का कानन याद आ गया, 1996 का नंदनकानन याद आ गया। वह पन्ने तो अब यादों के पन्ने बन गये हैं। बाहर बहुत सी दुकाने लगी थी जहां काजू और खसखस 400₹ किलो में मिल रहा था। दागदार काजू लेने के बाद लगा यह भी धोखा है।खंड
गिरी उदय गिरी छोड़ दिये। यहां से हम लोग साक्षी गोपाल देखने चले गये क्योंकि यह पुरी से 15 किलोमीटर पहले ही है।हम लोग पंडों से बिना बात किये ही दर्शन करके बाहर आ गये।पिछले दो बार आये थे तब यह बंद ही रहता था। कहा जाता है कि इसके दर्शन करना चाहिये यही जगन्नाथ भगवान के दर्शन के साक्षी रहत हैं। यहां नहीं जा पाये तो छत्तीसगढ़ के राजिम के साक्षी गोपाल के दर्शन करना चाहिये।

होटल में जाकर आराम करके समुद्र किनारा देखने चले गये।रात को लहरें बहुत ही सुदर लग रही थी। रात बारह बजे के खरीब म लोग वापस ये।बाजार में तरह तरह की चीजें बिक रही थी यह सब पहले की तरह ही है। बस किनारे में बहुत से होटल बन गये हैं। मेरी डायरी का यह पन्ना नहीं बदला है। अच्छा लगा कि कुछ तो पहले की तरह है।

यहां पर मोती, पन्ना, डायमंड, पुखराज, माणिक, ओपेल याने नवरत्न, मूंगा सब मिलता है। दो हजारपांच ,दस हजार स शुरू होता है,भाव गिराते गिराते बीस रुपये में दे देते है। इसका इतना बड़ा धंधा है की एक दिन में पांच हजार से दस हजार तक कमा लेते हैं। यहां से धोखा खाये लोग किसी को नहीं बताते हैं कि ये सब मत.खरीदना। जब बात खुलतीहै तो मजा लेते हैं की आप भी बुद्धु बने और आप भी बन गये।

रात को लौटते हुये खाना खाये। पहले दिन का अनुभव था कि यहां पर दस बजे तक सब होटल बंद हो जाते हैं। हमारे होटल के पास ही एक रेस्टोरेंट था जहां ग्यारह बजे तक खाना मिलता था वहां पर खाना खाये। मजा आ गया , एक प्लेट बिरयानी या फिर जीरा फ्राई को दो लोग खा सकते है या तीन लोग भी खा सकते हैं। वहां पर चांवल भर भर कर देते हैं। सभी जगह सब्जी दाल सब बढ़िया मिल रहा था।पुरानी डायरी के पन्ने याद आनू लगे जब चांवल तो ऐषा ह मिलता था पर दाल सब्जी में स्वाद नहीं रहता था।टूरिस्ट अच्छे खाने के लिये तरसता था।अच्छे होटल कहीं कहीं ही दिखते थे। अब रोटियां भी बढ़ियामिलती है, तंदूरी भी मिलती है। समुद्र के किनारे भी आमलेट ,मछली और रोटी सब्जी मिल रही थी। खाने की कमी नहीं थी।

हम लोग दूसरे दिन दस बजे जगन्नाथ मंदिर गये। वहां भी बहुत से लोग फुटपाथ पर सामान बेच रहे थे। रथ यात्रा के दिन दिखने वाला रास्ता फुटपाथ की दुकानों से भरा था। लोहे की रैलिंग लगी थी कि लोग लाइन से आयें। हम लोग एक गाइड करके पश्चिम के दरवाजे से गये। मुख्य मंदिर के बाहर के सभी मंदिर देख लिये। चिटियों की तरह लोग भरे थे। वहां दो मूर्ति पहले नहीं थी, एक साक्षी गोपाल और दूसरा बट गणेश। बट वृक्ष जिसे कल्प वृक्ष कहते हैं वह सन् 1980 में खुला था, उसमे मन्नत के लिये धागे बांधते थे। एक रूपये में खरीदते थे। 1996 में भी वह खुला ही था पर वहां पर एक कमरा बन गया है जहां पंडित अपनी दुकान खोल कर बैठा है। धागा बांधने के लिये 365₹ ले रहा है। उसकी बाहरी दीवार पर बट की डगाल के नीचे एक गणेश जी की स्थापन कर दी गई है । बट के नीचे है इस कारण " बट गणेश " जी हैं। यहां पर साक्षी गोपाल हैं तो लोग दूसरे साक्षी गोपाल के दर्शन के लिये क्यों जाते हैं?

हम लोगों को एक दरवाजे से अंदर दर्शन के लिये ले गया और भीड़ के साथ खड़ा कर दिया। बहुत धक्का खाते हम लोग दर्शन करते निकल गये। मुझे तो बस भगवान की एक आँख ही दिखाई दी। जगह जगह पाइप लगे है तो अंदर तक तीन लोगों की लाइन ही रखते तो सबको भगवान जी दिखते। मन की आँखो से देखते हुये हम लोग फिर समुद्र किनारे पहुंच गये।आटो से पुरी होटल के सामने तक गये ,वह 150₹ लिया। वहां पर दो बजे तक बैठे रहे।मैं तो समुद के लहरों के पास बैठ गई और कमर तक पानी का मजा लेते रही। पिछले दो बार में मैं बस लहरों को घुटने तक ही ली थी। एक घंटे पानी का मजा लेकर जल वरुण देवता को प्रणाम कर बाहर आई। फिर हम लोग अपने होटल की तरफ चले गये। रास्ते मे खाना खाये।

हमारी रेल दो घंटे लेट थी तो हम लोग रात का खाना पैक करा कर शाम सात बजे होटल से निकले। प्लेटफार्म पांच पर पुरी दुर्ग एक्सप्रेस खड़ी थी।हम लो ए सी टू में बैठ गये। मैं मेरी भाई बहु इंदु, भतीजी शिखा कश्यप और दामाद नवीन को एक ही कूपा मिल गया था। भतीजी नातिन चेरी के साथ बातें करते हम लोग दूसरे दिन रायपुर पहुंच गये।एक सुखद यात्रा तो रही पर तीर्थ पर या पर्यटन स्थल पर कितनी लूट होती है इसका उदाहरण है पुरी। आस्था के नाम कर जगन्नाथ की कसम खाकर भी लोग नकली सामान बेच देते हैं। चालीस साल में बहुत कुछ बदल गया है। दिल से मैने अपने छोटे भाई रवि को धन्यवाद दिया कि उसके न जा पाने के कारण मेरी तीसरी बार पुरी जाने की इच्छा पूरी हो गई। कहानी का अंत ऐसे ही नहीं होता है , तो कैसे? आप लोग भी सोशल मिडिया के कारण भूल गये, चलिये याद दिलाती हूं। हमारी दादी नानी कहानी के अंत में कहती है की " जैसे उसकी इच्छा पूरी हुई वैसी सबकी इच्छा पूरी हो" भाई की इच्छा भी जल्द ही भगवान पूरी करे।

मैं डायरी के इन पन्नों को आपके लिये भेज रही हूं। आप लोग " पुरी" जायें तो ऐसे ठगों से दूर रहें, जो खरीदना है अपने शहर में खरीदें।

कोरोना एक संकेत

आज कोरोना वायरस की महामारी फैली हुई है। इसके लिये पूरा विश्व काम कर रहा है। करेगा ही सोशल मिडिया है जो एक सेकेंड में किसी भी समाचार को पूरे विश्व में पहुंचा देता है। सबको अपने जिन बचाने के लिये कुछ तो करन पड़ता है। कोरोना वायरस चीन का आयातित है। चीन से तो सालों से सस्ती चीजें आ रही थी। यहां तक की हमारे पूजा के सामान, दीपावली के सजावट के सामान होली के रंग भी वहीं.से आते हैं। सस्ता होने के कारण लोग यही खरीदते हैं। हमारे यहां का सामान रखा रहता है।
हमारे देश से अलग खानपान होने के कारण भी चीन को जाना जाता है। मांसाहारी हैं चीन के लोग, ये लोग पके मांस के साथ कच्चा मांस भी खाते हैं। चमगादड़ का सूप और सांप के खाने से कोरोना फैल गया। बहुत ही तेजी से फैलने लगा। यह दूसरे देश तक पहुंच गया। सभी जगहों में मांस खानि बंद कर दिये।अंडा भी बंद हो गया। यह छूने से भी फैलता है तो लोगों ने हाथ मिलाना बद कर दिया। उस समय भारत सबसे आगे रहा क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने सबको हाथ जोड़ कर नमस्ते करना शुरु कर दिया। विश्व में भारत की धाक तो जम गई पर भारत की संस्कृति को सब जानने और पहचानने लगे।
कोरोना में सूखी खांसी और बुखार रहता है साथ में सांस लेने में तकलीफ भी होती है। इसके रोकथाम के लिये कोई दवाई भी नहीं है और न कोई टीका है। बस सब जगह को किटाणुरहित करना है ,अपना हाथ हर दो घंटे में धोते रहना है। इसके 245850 मामले विश्व में सामने आये हैं जिसमें से 10047 लोगों की मौत हो गई है। भारत में भी चार केस आये हैं। जब भी संक्रमित व्यक्ति मिलता है उसे आयसोलेशन में 15 दिन तक रखा जाता है। दो बार उसकी जांच होती है। नये सामानों के साथ कई अस्पताल के कमरे तैयार किये गये हैं। आज भी इसक लिये दवाई खोज रहे हैं।
आसाढ़ के महिने में बीमारियां ज्मादा फैलती है और भरी गर्मी में भी। मलेरिया ,फ्लू और हैजा ही फैला करता था।मुझ वह दिन आज याद आ रहे हैं जब हैजा फैला करता था और माता फैलती थी तब एक जिले से दूसरे जिले में जाना मना रहता था।
आज से पचास साल पहले तक किसी भी बीमारी की महामारी फैलती थी तो दवाई तो रहती थी, बचाव का टीका भी लगता था। हम लोग कई बार रायपुर और दुर्ग के बीच बहने वाली नदी के पहले टीका लगवाये हैं। उसके बाद एक पर्ची मिलती थी उसे नदी के उस पार दिखाते थे। उसके बाद ही दूसरे शहर में जा सकते थे। सामान भी लाना ले जाना मना रहता था, सामान याने धान चना गेहूं सब्जियां।
तब और अब में बहुत अंतर आ गया है। आज सोशल मिडिया के कारण कोई भी समाचार एक सेकंड में पूरे विश्व में फैल जाती है।
इस कोरोना का समाचार भी फैल गया पर इसका बचाव नहीं है। इसे 15 दिन के लिये अलग रखा जाता है और किटाणुरहित करते रहते हैं। अब मलेरिया की दवाई कारगर साबित हो रही है। हमारे यहां जगन्नाथ भगवान आसाढ़ में बीमार पड़ जाते हैं। इनको पंद्रह दिन अलग रखा जाता है।उनके दर्शन नहीं होते हैं। भोग में काढ़ा चढ़ाते हैं। यही बांटा जाता है। इसका मतलब यही है किभारत में इन सबकी दवाई तो है ही और सावधानी भी है।आज का पंद्रह दिन का आयसोलेशन जगन्नाथ भगवान की तरह ही लग रहा है। शायद यह काढ़ा ही इस बीमारी का इलाज हो। भारत में आज सब मंदिर बंद हो गये हैं भीड़ से बीमारी फैलती है यह बात सबको समझ में आ गई है। झाड़ फूक और गांव बांधने वाले नजर नहीं आ रहे हैं। न तो पजा पाठ तंत्र मंत्र भी हम सबसे दूर है। बल्कि मंदिर बंद हो गये। जागृति बहुत आ गई है। भारत आज सबका अगुवा बनने जा रहा है। सभी के चेहरे पर कोरोना के भय के साथ खुशी भी है।

प्रकृति अपना संतुलन बना लेती है। मनुष्य स्वार्थी हो रहा है। अपने स्वार्थ के लिये बड़े बड़े पेड़ काट रहा है। खेतों पर कांक्रिट के जंगल बन रह हैं। मानव जनसंख्या बढ़ रही है। जीवों की संख्या कम हो रही है। जीवों में कई प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। तरह तरह की बीमारियां हो रही है। बाढ़ आ रही है, सुनामी का प्रकोप भी लोगों ने झेला है। कहीं सूखा कहीं वर्षा , असमय बारीश और ओले गिर रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं इन सारी बातों से यही पता चलता है कि प्रकृति अपना कोप दिखा रही है। भूकम्प से हजार जाने चली जाती हैं। इन सबसे सैकड़ो जान तो जा रही है, पौधों और जीवों की प्रजातियां भी समाप्त हो रही है। यह कोरोना वायरस भी इसी का एक हिस्सा है।आज मानव मांसाहारी से दूर हो रहा है।अब लोगों को समझ रहा है कि पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। अभी तक बरीश होना और कोरोना का फैसला यह भी संकेत दे रहा है कि भी और भी जाने जायेंगी। प्रकृति का कोप बाकी है।

कुछ हसीन पल

कुछ हसीन पल से आप लोग सोच रहे होंगें की कौन सा हसीन पल? जीवन में तो बहुत से हसीन पल है।सही बात है। मैं बचपन के उस हसीन पल की बात कर रही हूं जब सबको गर्मी की छुट्टियों का इंतजार रहता था। छुट्टी में सब गांव जाते थे या फिर अपने मामा के गांव जाते थे। मैं भी अपने मामा के गांव जाती थी। मेरे बराबर उम्र की मेरे मामा की बेटी थी। उससे छोटी भी एक बहन थी, हम लोग बहुत मजे करते थे। बेर खाना ,ईमली का लाटा बना कर खाना। बासी के साथ लाल मिर्च और लहसुन की चटनी खाना। कनकी का पेज पीना और दोपहर कर सोकर उठे तब बोरे खाना।

लड़कियों को बांस की काड़ियों में रंग बिरंगा धागा भर कर पंखा बनाना सिखाते थे तो लड़के गिल्ली डंडा खेलते थे। गांव में गर्मियों में एक काम और करते थे, बेर को मूसर से कूट कर पाऊडर बनाते थे। गुठली अलग हो जाती थी। पाऊडर को नमक मिर्च डाल के थोड़ा और कुटतठिया बनाते थे। गुठली को मैं रखती थी और दोपहर भर बैठ कर गुठली को फोड़कर चिरौंजी निकालती थी। शाम को लोटे में ठंडा पानी लेकर उसमें नमक डाल कर चिरौंजी को डालकर शरबत बनाते थे। पीते समय जब चिरौंजी आती थी तो उसे चबाते थे और नमक वाला पानी पीते थे। " यमी यमी" उसका स्वाद आज भी जीभ में हैं।

अब आती है इमली के लाटा बनाने की बात। हम लोग ईमली को फोड़ कर छिलका अलग करते थे। यह सब खेलते खेलते करते थे। फिर उसके बीज निकलते थे। उसके बाद का काम माँ करे या फिर मामी करे। उसको कूट कर उसमें नमक मिर्च और थोड़ा सा गुड़ डालकर लाटा बनाती थी। बांस की छोटी छोटी लकड़ी में लॉलीपाप की तरह चिपका देते थे। लिखते हुये भी मुंह में पानी आ रहा है। ईमली की चटनी के साथ कभी कभी बोरे भी खाते थे। इस लाटा को चाटते हुये घूमते रहते थे। दोपहर को तालाब चले जाते थे तो आम के पेड़ से आम भी तोड़ कर ले आते थे। पानी में खेलने का मजा ही कुछ और है। यह सब छूटते चला गया पर गांव में रहने वाले अब भी मजे लेते हैं।अब

अब गांव में भी टी वी आ गया है। सबके पास मोबाइल हो गया है। गांव के बियारा में अब राचर नहीं गेट लग गया है। अब ट्रेक्टर से बोवाई और कटाई ,मिंजाई भी हो जाती है। अब धान ओसाने का दृश्य बहुत कम देखने में आता है।दौरी में मिंजाई भी कम जगहों पर होता है। शहरीकरण ने बहुत कुछ बदल दिया है। इसके साथ ही साथ नये अविष्कार के साथ साथ वैश्विकरण ने खान पान ही बदल दिया है।

आज वह बचपन लौट कर नहीं आ सकता। वह खानपान और रहनसहन भी नहीं दिखाई देता है। हमने बचपन में जो जीवन जिया है वह अब जी नहीं सकते। हमने विकास के नाम पर विदेशी जीवन शैली को अपना रहे हैं। आज हम च्विंगम, टॉफी, कुरकुरे, चिप्स, कैडबरीस अपने बच्चों को देते हैं। हाथ में मोबाइल हैं खाने में पिज्जा, मोमोस, चाऊमीन है। आज ईमली बाजार से लाते हैं तो पानी पुरी के लिये। उसका लाटा तो बना नहीं सकते तो बच्चे कहां से देखेंगे।इसका मजा तो बाजार से लिये टॉफी में मिल जाता है। कच्ची ईमली ,चटपटी ईमली के नाम से भी लाटा मिलना है पर हाथ से बना कर खाने का अपना मजा था। ईमली भी घर की ही रहती थी। बेर की मुठिया आज भी वैसी ही है। मैं राजिम गई थी तो वहां एक गुजराती परिवार के यहां गये थे। उसने बहुत से नाश्ते के साथ बेर की चपटी चपटी एक रूपये के सिक्के के आकार की मुठिया लाकर.दी। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि इतना बढ़िया साफ सुधरा बेर की टिक्की मिल रही है तो उसने करीब बीस मेरे लिये रख दी। आज बेर भी बाजार से खरीद कर लाते हैं वह भी मीठा नहीं रहा तो मजा नहीं आता है। फिर गुठली भी कितनी निकलेगी? जितनी भी गुठली निकले मैं उसे फोड़कर उसकी चिरौंजी खाती ही हूं। गांव में बड़े बड़े बेल तोड़कर लाते थे तो उसे भी दोपहर को खाते थे और उसकी खोटली से इक्कीस बार पानी पीते थे। कुछ बड़े हुये तो यह सब अंधविश्वास सा लगने लगा। बाद में पता चला कि बेल खाने के बाद एक गिलास पानी पीना ही चाहिये क्योंकि बेल पेट में जाकर फूलता है तो उसे पानी की जरुरत होती है। हमारे बुजुर्ग इस बात को जानते थे तभी तो जितना बड़ा बेल का टुकड़ा खाथे थे उसकी खोतली में ही इक्कीस बार पानी पीते थे।

गर्मी में खोइला भी बहुत खाते थे। सेम, कद्दू, , भटा, चना भाजी, पटवा भाजी, जिमिकांदा खाते थे। समय ने तो बदल दिया इसकी जगह हरी सब्जियों ने ले लिया। अभी कोरोना की महामारी फैलने के कारण 21 दिन का लॉकडाऊन हुआ था तब सबको ये सूखी सब्जियां याद आ रही थी। सच है पुराने खानपान पौष्टिक तो हैं ही पर बदलते समय दिखाई नहीं देते हैं। कभी बाड़ी में सब्जी न हो तो सूखी सब्जियां काम आती थी।

पानी ठंडा करने का अनोखा तरीखा भी था। हम लोग एक एक लोटा अपने लिये रख लेते थे। खपरे वाला पटाव का मकान होता था। हम लोग लोटे में पानी भरकर उसके मुंह में कपड़ा ढक कर उलटा कर देते थे और उसे छानही की लकड़ी पर बांध देते थे। लोटा उल्टा लटका रहता था। एक घंटे के बाद पानी एकदम हो जाता था। उसे दोपहर को पीते थे और बचे पानी का शरबत बना कर पीते थे। शाम को और पानी टांग देते थे। इस पानी को रात को पीते थे। ये सब बातें आज याद आ रही है। आज बच्चों के खाने का तरीका बदल गया है पर उस स्वाद को जरुर लेत है जो खट्टी इमली के रुप में मिलती है।ठंडे पानी के लिये फ्रीज है।सूखी सब्जियों का स्वाद नही लिया है पर चना जरुर खाते हैं।
आज घूमने के लिये गार्डन है। पहले घूमने गाँव जाते थे तो आम के बगीचे,नहर और तालाब का मजा लेते थे। मामी नानी के हाथ का बना तरह तरह की चीजें खाया करते थे।आज तो किसी के घर रहने ही नहीं जाते हैं।
आज बच्चे मोबाइल और टी वी में बंध कर रह गये हैं।मिकी माऊस, डोलाल्ड डक की पुस्तकें पढ़ते थे उसे आज के बच्चे टी वी पर मोबाइल पर देख रहे हैं। पहले इंसान इंसान से जुड़ा रहता था पर आज घर में चार.लोग हैं तो सबके बीच एक दूरी रहती है।एक कमरे में बैठ कर भी एक दूसरे से कोई सम्बंध नहीं रहता है। अकेले बैठे बैठे उस सुनहरे पल को सिर्फ याद कर सकते है पर उसमें जी नहीं सकते है।

मातृभाषा में शिक्षा

26 को संविधान बना था, जिसमें मातृभाषा में शिक्षा देनी चाहिये यह संविधान है। छत्तीसगढ़ राज्य बना एक नवम्बर सन् 2000 में, उस समय छत्तीसगढ़ी भाषा को माध्यम बनाने के लिये कोई आदेश.नहीं निकला। राजभाषा आयोग बना तो इसका उद्देश्य था छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रचार प्रसार करना परन्तु यह भी पुस्तक प्रकाशन और साल में दो कार्यक्रम तक ही सिमटा रहा। कार्यक्रम में भी विषयों की कमी झलकती रही। छत्तीसगढ़ी भाषा के लिये हर कक्षा में हिंदी के साथ चार छत्तीसगढ़ी के पाठ रख दिया गया। यह पाठ भी ठीक से पढ़ाया नहीं जा रहा है इसका कारण है बहुत से का छत्तीसगढ़ी नहीं समझना।छत्तीसगढ़ में सभी राज्य के लोग आकर बस गये हैं ,कुछ व्यापार करने के लिये आये हैं तो कुछ लोग सिर्फ नौकरी करने आये हैं। जो व्यापार के लोग आये हैं वे तो छत्तीसगढ़ी सीख गये क्योंकि यह उनकी जरुरत है पर जो नौकरी करने आये हैं वे छत्तीसगढ़ी नहीं सीखना चाहते है।
बहुत से आंदोलन करके छत्तीसगढ़ी भाषा के माध्यम की मांग कर रहे है। नंदकिशोर शुक्ला जी संविधान की कापी लेकर मंत्रियों को बता रहे हैं। लोगों को जगा रहे है। इसके साथ महिला क्रांतिसेना आंदोलन में लगी है। ये लोग दिल्ली में भी धरना दिये थे। दिल्ली में भी मंत्रियों से मिलकर अपनी बात रखे। विधानसभी तक बात पह़ुंचाई गई। पिछली सरकार के रहते भाषा को लेकर कोई काम नहीं हुआ।
नई सरकार आई तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति दिखने लगी। तीज त्यौहार की रौनक ऐसी दिखाई देने लगी की इसकी खूशबू दूसरे राज्यों तक पहुंच गई। खान पान तो अब सबकी थाली में दिखने लगी है। पर भाषा ?
गणतंत्र दिवस के दिन मुख्यमंत्री भूपेष बघेल जी ने छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक स्तर का माध्यम बनाने की घोषणा कर दिये। अगले शिक्षा सत्र से अब प्राथमिक स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा में पढ़ाई होगी। माध्यम छत्तीसगढ़ी ही होगी। एक आदेश और निकाला गया 27 जनवरी को। आंगनबाड़ी केन्द्र में अब स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जायेगी। मातृभाषा और बोली में शिक्षा देने से बच्चे का सम्पूर्ण होता है। बच्चों में समझने की शक्ति जल्दी विकसित होती है। वंनाचल क्षेत्र में अनुसूचित क्षेत्र में वहां की ही भाषा बोली से पढ़ाई कराई जयेगी। इसके पहल के लिये "महिला एवं बाल विकास" विभाग के सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी जी ने सभी कलेक्टरों को पत्र लिख कर बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाने के लिये कहा। आंगनबाड़ी के माध्यम से मानसिक ,शारीरिक और सामाजिक विकास की नींव डालने के लिये मातृभाषा में अनौपचारिक शिक्षा दी जायेगी। पठन सामाग्री का स्थानीय भाषा में शिक्षा देने की तैयारी शुरु हो गई है। स्कूली शिक्षा में छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हल्बी, भतरी, सरगुजिहा,कोरवा, पांडव, कुडुक और कमारी में पढ़ाई होगी।
छत्तीसगढ़ राज्य को बने बीस साल हो गये हैं । इन बीस सालों में आज गाँव गाँव तक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल गये हैं। जहां स्कूल नहीं खुले हैं वहां पर बड़े बड़े स्कूल की बसें आती हैं बच्चों को ले जाने के लिये। आज बहुत से घरों में बटलर हिंदी बोली जा रही है। छत्तीसगढ़ी को लोग पीछे छोड़ रहे थे जो छत्तीगढ़ राज्य बनने के बाद अच्छे से ओलने लगे हैं।आज की युवा पीढ़ी आज भी छत्तीसगढ़ी बोलने के कतराती है ऐसे समय में संविधान के अनुच्छेद की बात बता कर या फिर मातृभाषा में शिक्षा के नाम पर छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई शुरु करने की प्रतिक्रिया क्या होगी।लोग शासन का आदेश समझ कर पढ़ने लगेंगे पर सरकारी स्कूलों में बच्चों की कितनी संख्या रहेगी? यह सब विचारणीय तो है। आज साहित्यकारों के छत्तीसगढ़ी साहित्य को पढ़ने वाले नहीं मिलते हैं। इन साहित्य को पढ़ने वाले तो मिलेगे। साथ ही पूरा पाठ्यक्रम भी छत्तीसगढ़ी में तैयार होगा। मानकीकरण का काम भी अधूरा है।एक समय था पचास साठ साल पहले जब घरों में हिंद बोलना सीखाते थे। यह इस लम्बे दौर में घरों का वातावरण पूरी तरह से हिंदीमय हो गया है। गाँव तक हिंदी पहुंच गई थी अब अंग्रेजी पहुंच रही है। अब लौट कर छत्तीसगढी की ओर आना कितना सही होगा। मुझे तो बचपन की याद आ रही है जब हमारे घर में छत्तीसगढ़ी बोलना मना था। हम राष्ट्र भाषा हिंदी की ओर बढ़ रहे थे।गांव जाते थे तब भी हमारे सार सब हिंदी बोलते थे।शादी के बाद मैने छत्तीसगढ़ी बोलना शुरु किया।इतनी अच्छी छत्तीसगढ़ी हो गई की उससे लेखन और संपादन भी करने लगी। बीस साल से हम छत्तीसगढ़ी से भाग रहे थे अब उस छत्तीसगढ़ी को हर जुबान पर लाना है। पढ़ना है, बोलना और लिखन भी है। संविधान की बात को बीस साल पहले लागू कर दिये रहते तो आज तीन पीढ़ी तैयार हो जाती।