रविवार, 1 मई 2016

ये दिन भी अपने थे - 84

गर्मी आने वाली थी तो हम लोग पचमढ़ी जाने के लिये कार्यक्रम बनाये ।रास्ता भोपाल  होकर जाता है ।हम लोग भोपाल छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से गये ।रास्ते मे सतपुड़ा की खूबसूरत पहाड़ियों पर से गुजरते हुये बहुत अच्छा लग रहा था ।पहाड़ों से पानी रिस रहा था तो कहीं पर पेड़ की शाखें रेल से टकरा रही थी ।दूसरे दिन सुबह भोपाल पहुँच गये ।वहाँ एक होटल मे कमरा बुक किये ।नहा कर ,तैयार हो कर निकल पड़े ।

गांधी मेडिकल कालेज में मेरा देवर पढ़ता था । हम लोग उससे मिलने गये। मिलने के बाद उसके साथ ही बिड़ला मंदिर देखने गये।वहाँ पर लक्ष्मीनारायण की मूर्ति है और एक तरफ दुर्गा की मूर्ती है ।बाहर मे एक बड़ा सा शंख बना  हुआ था । हम लोग शंख के दोनों तरफ खड़े होकर फोटो खिंचवाये ।शंक के एक ओर हनुमान का मंदिर है।मंदिर के चारो ओर बगीचा है ।यहाँ से पूरा भोपाल दिखाई देता है ।यहाँ से उतर कर "बापू की कुटिया "मे खाना खाये ।न्यू मार्केट घूमने चले गये ।यहाँ पर चाय पीये ,गन्ने का रस पीये और होटल वापस आ गये ।होटल से छै बजे खाना खाने गये और सात बजे तक वापस आ गये ।होटल से सामान सहित आठ बजे  रेल्वे स्टेशन के लिये निकल गये ।यहां से रेल से पिपरिया गये ।रात दो बजे पिपरिया स्टेशन पर उतर गये।

रात दो बजे से छै बजे तक रेलवे स्टेशन पर बैठे रहे ।छै बजे वहाँ से बस स्टेंड पैदल गये ।वह पास मे ही है ।सात बजे की बस से पचमढ़ी के लिये रवाना हुये ।रास्ता बहुत ही घुमाव दार है ।इससे मुझे चक्कर आने लगा था ।एक के बाद एक चढ़ाव है ,इससे नीचे देखो तो हजारो फीट गहरी खाई दिखाई देती है ।एक ओर ऊंचा पहाड़ था ,उसके ऊपर सफेद बादल की चादर बिछी हुई थी ऐसा लग रहा था .जैसे दूध फैला हुआ है । ढाई घंटे की यात्रा के बाद हम लोग पचमढ़ी पहुंच गये ।रास्ते मे" चालीस हाली डे होम" को पार करके गये।हमनेे यहीं अपना काटेज बुक करवाये थे ।बस स्टेंड पर उतर गये ।यहाँ पर एक सिनेमा हाल और बालक विद्यालय था।

यहाँ से पैदल ही हम लोग हाली डे होम गये ।यह बहुत ही प्यारा सा था ।दो होम एक साथ जुड़े थे ।इसमे एक वरामदा ,जिसमें दो कुर्सी रखी हुई थी ।उसके बाद एक बड़ा सा कमरा था ,जिसमे एक डबल बेड लगा था ।चादर तकिया ब्लेंकेट रखा हुआ था ।उसके बाद एक किचन था और उसी को पार करने के बाद पीछे छोटा सा आँगन था ।जहां पर लेफ्ट मे टायलेट वैगरह था ।आँगन मे एक पानी की टंकी भी थी ।बाल्टी मग वैगरह रखा था ।हम लोग नहा कर तैयार हो गये और खाना खाने चले गये। पास में ही होटल और दुकाने थीं ।वहीं पर एक गाईड मिल गया जो टांगे से "धूपगढ़ " घूमाने के लिये तैयार हो गया ।वहाँ पर उगते और डुबते सूरज को देखने जाते है ।हम लोग डुबते सूरज को देखने वाले थे ।टांगा तीस रूपये मे तय  हुआ था ।

"धूपगढ़" की दूरी बारह किलोमीटर है ।टांगे से जाते हुये रास्ते मे रविशंकर भवन ,तहसील,कचहरी ,जयस्तम्भ  देखे ।धूपगढ़ का रास्ता जंगल से होकर जाता है ।बीच मे शुक्ला झील भी पड़ता है ।एक ऊंचे पहाड़ के पास जाकर टांगा रूक गया ।उसके बाद एक हजार फीट की ऊंचाई पैदल ही चढ़नी थी ।यह बात उसने वहीं पर बताई ।जीप ऊपर तक जाती थी उसका रास्ता थोड़ा अलग है ।रास्ता पत्थरों से भरा है।सभी गोल गोटे की तरह के पत्थर है।यहां पर चार ,आम ,बांस ,बरगद,अशोक के वृक्ष हैं ।नीम और थुजा भी कहीं कही पर है।डेढ़ किलोमीटर चल कर पहाड़ पर चढ़े ।ऊपर में छोटा सा मैदान सा है ।जहां से पर्वत बहुत खूबसूरत दिखाई दे रहा था । सतपुड़ा और महादेव पर्वत श्रेड़ियों का खूबसूरत जाल बिछा हुआ था ।सफेद बादलों से ढके पर्वत  पर ऐसा लगता है कि यह पानी की सतह है ।सूरज आकाश मे ही डूबता दिखाई देता है।यह वह स्थान है जहां पर 4500 फीट की ऊंचाई पर आकाश और पृथ्वी मिलते है ।सूरज क्षितिज मे ही डूब जाता है ।करीब साढ़े छै बजे  सूरज डूबा इसके बाद हम तीनो तेजी से नीचे उतरे ।जल्द ही" प्रकाश विश्रांति गृह "  पहुंचे ।साढ़े आठ हो चुका था ।यहाँ से खाना खा कर हम लोग हाली डे होम चले गये ।रात को ठंड थी ।आराम से नींद आई ।

दूसरे दिन याने नौ अप्रेल को थकान के कारण आठ बजे नींद खुली ।हमारा गाईड किशन टांगा लेकर दरवाजे पर खड़ा था ।हम नहा कर चाय पीये और साढ़े आठ बजे "प्रकाश विश्रांति गृह" मे गये ।वहां पर मै खाना खाई और दोपहर के लिये टिफिन मे खाना लेकर बड़ा महादेव देखने चल पड़े टांगा चार किलोमीटर जाने के बाद रुक गया ,उसके बाद चार किलोमीटर पैदल ही जाना पड़ा ।

रास्ते मे "हांडी खोह "देखे ।यह मुख्य सड़क से बायें हाथ कि ओर आधा किलोमीटर दूर है ।इसमे एक ओर रेलिंग लगी है और नीचे सीधी कटी चट्टान है ।यह घाटी पंद्रह सौ फीट गहरी है ।इसके भीतर आम के जंगल थे ।महुआ के पेड़ भी बहुत थे ,रास्ते मे और अंदर भी ।इसके नाम के बारे मे बताते है कि "हाँडी " नामक अंग्रेज यहाँ पर घर बना कर रहते थे ।जमीन पर कुछ प्रमाण मिलते हे जैसे घर बना रहा होगा ।उनकी मृत्यु इस खोह मे गिरने से हो गई थी इस कारण इसे "हांडी खोह" कहते  है ।उनको प्रकृति से बहुत प्यार था ।बहुत ही मनोरम जगह थी।

यहाँ से पैदल ही बड़ा महादेव देखने के लिये पैदल ही चलना पड़ा ।बहुत बढ़िया रास्ता है तीन किलोमीटर के बाद लोहे कि रैलिंग लगी है ।यह एक किलोमीटर तक होगा ।उसके बाद बड़ी सी गुफा दिखाई देती है ।अंदर जाने के पहले ऐसा लगता है कि बड़े से हॉल मे घुस रहे है ।अंदर मे बीच मे एक कुंड है जिसमे पानी भरा है और उपर से भी पानी टपक रहा है ।उसकी "टप टप" की आवाज सन्नाटे मे बहुत तेज सुनाई दे रही थी ।गुफा के बाहर दो नल थे वहाँ से पैर धोकर अदर आये थे ।कुंड के चारो ओर लोहे की रेलिंग लगी है ।उसके बाद गुफा के अंत मे एक और खोल था जिसमें प्राकृतिक लिंग है ।यहाँ भी पानी टपक रहा था ।इसके पास मे तीन मूर्तियां है गणेश,शंकर,पार्वती की ।वहाँ की ठंडकता और पानी की टप टप की आवाज बहुत प्यारी लग रही थी ।गुफा के बाहर मे एक तरफ त्रिशूल,शिवलिंग और पीतल की मूर्तिलगी हुई है ।बड़ा महादेव के बाहर मे तीन दुकाने थी।वहाँ जआते ही खाने का आर्डर दे दें  तो खाना बना देते हैं।

इसके आधा किलोमीटर की दूरी पर गुप्त महादेव है ।इसके अंदर जाने का रास्ता बहुत ही सकरा है ।मै अंदर नहीं गई ।यहां का दृश्य बहुत ही मनोरम था ।वापस चार किलोमीटर चल कर टांगे तक आये ।हमारा गाईड बराबर हमारे साथ रहता था ।वह मेरा बहुत ध्यान रखता था ।लौटते मे एक जगह "शैलांजली " देखे जिसका  प्राकृतिक सौदर्य लदेखने लायक था ।इससे थोड़ी दूर पर राजेंद्र गिरी मे राजेंद्र पार्क है।वहाँ पर डा.राजेंद्र प्रशाद द्वारा लगाया एक वट वृक्ष है ।यहाँ से सभी पहाड़ियाँ धूपगढ़,महादेव,चौरागढ़ दिखाई देता है ।रास्ते मे शुक्ला झील या पचमढी झील भी देखे ।इतना प्राकृतिक सौंदर्य देखने के बाल सच मे लगने लगा कि यह स्वर्ग ही है ।शाम को चार बजे हम लोग वापस "हाली डे होम "मे आ गये ।शाम को वहीं पर चाय और डबलरोटी खाये ।रात को खाना खाने बाहर गये और वापस आकर सो गये ।

दूसरे दिन सुबह किशन सुबह से आकर खड़ा हो गया ।साथ मे चार लेकर आया था ।वह मुझे मांजी कहता था ।मेरे पति का भी जुड़ाव हो गया था ।उसे खाने के लिये बोलते और कुछ बीच मे भी खाने बोलते तो वह नहीं खाता था ।मैने पहले दिन झल्ला कर कहा कि जीप से चलेंगे भले पैसा ज्यादा लगे तो वह कहता नही टांगे से घूमना ठीक है जगह जगह खूबसूरती देखते जायेंगे ।उसने बताया कि यहां पर धूप मिलता है ,बिलकुल शुद्ध रहता है ।जो लोग निकालते है वही लोग पर्यटक को बेचते है ।मैने उसे आधा किलो लाने के लिये बोली ।वह शाम को भी हमारे खाने के समय तक रहता था और बोल कर रखा था कि जीस चीज की जरूरत हो बोल देगे मै ला दूंगा ।मेरे पति को किसी से काम कराने की आदत नही थी ।वह इंतजार करते रहता और ये अपना काम स्वयं करते थे ।एक दिन टार्च का सेल लाने गये तो वह दुकान मे मिल गया और बोलने लगा आप आराम करते मै ला देता ।बस ये मुस्कुरा दिये थे ।किसन धूपगढ़ में मेरे साथ फोटो भी खिचवाया ।

दस अप्रेल को हम लोग सायकिल से घूमने निकल गये ।यहाँ से चार पांच किलोमीटर पर" बी फाल" था ।यहां बहुत मधुमक्खी के छत्ते है इस कारण इसे "बी फाल"कहते है ।चार किलोमीटर पर बी कुंड या जमुना कुंड है ।हम लोग
इससे नीचे उतर गये।बहुत खूबसूरत है ।जल प्रपात के नीचे गये ।यहाँ पर बहुत से एन्थोसिरोस और फर्न थे ।चट्टानों पर लाइकेन भी रे ।मॉस सूख चुके थे । हम लोग वापस ऊपर यमुना कुंड मे आ गये।यहाँ से सायकिल से वापस आ गये ।बारह बजे थे ।खाना खाने के बाद हम लोग फिर से सायकिल से पांडव गुफा देखने चले गये ।यह गुफा दो किलोमीटर की दूरी पर है ।साधारण सी गुफा है ।इसके पास से ही मुख्य सड़क अप्सरा विहार और रजत प्रपात के लिये गई है ।

इस बार सायकिल से साथ मे किसन भी था।पहले "रजत प्रपात "देखने गये ।यह पांच किलोमीटर की दूरी पर है ।यहां पर पानी बहुत ऊंचाई से नीचे खाई मे गिरती है ।यह एक चाँदी के पतले डंडे की तरह दिखाई देती है ।इस कारण इसे रजत प्रपात कहते है ।यहीं से अप्सरा विहार के लिये रास्ता गया है ।यहाँ पर पानी दस फीट ऊपर से नीचे गिरता है ।नीचे एक तालाब सा बन गया है ।यहाँ पर उतर कर हांथ पैर धोये और बहुत सी फोटो खिंचे ।सायकिल से दूसरे रास्ते से वापस आ गये । तीश बजे तक वापस आ गये ।किसन के लिये यह आश्चर्य जनक घटना थी ।वह बता रहा था कि विदेशी लोग सायकिल से कभी कभी जाते है पर भारत के लोग को पहली बार सायकिल से जाते देखा हूँ ।पूरे रास्ते मे वह मुझे ही देख रहा था ।मै भी पहली बार सायकिल फर बैठी थी ।मै सायकिल नही चलाती इस कारण पति की सायकिल मे पीछे बैठ कर ही घूम रही थी ।

ग्यारह तारीख को  हम लोग  जटाशंकर घूमने गये ।सुबह आठ बजे ही निकल गये ।पास मे ही है ।रास्ते मे बड़ी बड़ी चट्टानें हैं।एक ही रास्ता है जो सीधे जटाशंंकर तक जाता है ।रास्ते मे पत्थर को काटकर शंकर जी की मूर्ती बनाई गई है ।इससे आगे जाने पर हनुमान जी की मूर्ति बनी हुई  है ।इसके आगे का रास्ता नीचे की ओर गया है ।लोहे की गैलरी बनी है इसी से नीचे उतरते है बाहर मे शंकर  जी की मूर्ती है और अंदर गुफा जैसे है ।वहाँ पर पानी टपकते रहता है और सैकड़ो की संख्या मे ,गुच्छों मे शिवलिंग निकले हुये है ।इसे देखकर वापस आ गये ।अब हमारा घूमना खतम हो चुका था ।किसन हमारे आस पास ही घूम रहा था  हमारे बीच कुछ तार जुड़ रहे थे ।वह एक आदमी  को लेकर आया था ।उसके पास धूप था ।पच्चीस रूपये मे आधा किलो धूप दिया ।बहुत सा चिरौंजी लेकर किसन खड़ा था ।कई बार पूछने पर भी पैसा नही बताया ।हम ँओग मुफ्त मे नहीं रखते बोले तब बोला बेटा समझ कर तो रख सकते हो ।अब तो लेना ही था ।वह बोला "मुझे फोटो भेजना मांजी के साथ वाली ।" हम लोग हाँ बोल कर चले गये ।

शाम को हमारे जीजाजी के मित्र से मिलने चले गये ।यशवंत डेकाटे जी की जुड़वां बेटी है वर्षा और ऋतु ।हम लोग मिल कर आये और शाम को उनके घर खाना खाने गये ।रात को पैकिंग कर लिये और आराम से सो गये ।सुबह दस बजे हम लोग डेकाटे के आफिस गये उनसे मिलने गये ।फिर दो बजे की बस नहीं जा रही थी तो पाच बजे की बस से पिपरिया आ गये ।आते समय फिर किसन बस स्टेंड पर मिलने आया ।हम लोग रास्ते मे सोचते रहे किसन कितनी बार मिलने आया ।पिपरिया मे रात को होटल मे रूके जहां पर पहली बार मै सैंकड़ों खटमल एक साथ देखी ।रातभर जागते रहे ।सुबह दस बजे की रेल से जबलपुर आ गये ।जबलपुर तीन बजे पहुँचे ।बस स्टेंंड मे ही रूके रहे और रात साढे आठ बजे की सुपर डिलक्स बस से रायपुर आ गये ।

रायपुर आने के बाद फोटो निकलवाये ।एक सार फिर किसश याद आने लगा ।ऐसा लगा कि कोई आपना वहाँ छूट गया है।उसकी आँखे याद आ रही थी ।जो हमेंशा कम पैसे मे अच्छे से घुमाने की सोचता था ।वह तीन दिन मे हमारे  करीब आते गया ।आने वाले दिन भी खड़ा था ।आने के पहले दिन की रात को भी खाने के समय वहीं होटल में खड़ा था ।हम लोग उसकी फोटो होटल के पते पर भेज दिये ।होटल वाले ने पहुंचने की सूचना दी ।पर हमे वह बच्चा हमेंशा याद आता रहा ।उसकी मूंछे भी नहीं आई थी ।उसे  हमसे लगाव इस कारण भी रहा हो कि कोई घूमने आये तो उसे हम उसका नाम बतायें ।पर उसने एक बार भी ऐसी बात नहीं की पर ये जरूर बोला कि आप लोग फिर आइये मै कुछ औऱ जगह घुमाऊंगा ।अभी चौरागढ़ छुटा है ।एक गाईड जो अपना सा लगा किसन।

ये दिन भी अपने थे - 83

अलग चौके मे मैं व्यस्त थी ।उसके साथ साथ स्वेटर बनाने मे व्यस्त रहने लगी ।मै स्वेटर बहुत बनाती थी ।परिवार के लोगों का स्वेटर बनाती रहती थी ।तबियत खराब होने के कारण नौकरी मे नहीं जा पा रही थी ।तब मैने समय काटने के लिये स्वेटर को ही चुना ।टेलरिंग का डिप्लोमा था तो घर के पूरे कपड़ों की सिलाई करती थी ।जेंट्स कपडे ज्यादा सिलती थी ।काका के और भाई के कपड़े सिलती थी ।यह बात जस मेरे पति टो चली तो वे भी अपने पेंट शर्ट मुझसे सिलाने लगे थे ।

मेरे पति बड़ी तन्मयता से हाथ से स्वेटर बनाते मुझे देखते थे ।एक दिन शाम को बच्चे मुझे नीचे बुलाने लगे ।मै नीचे उतर कर आई  इनको बैठक मे देखते ही घबरा गई कि पता नही अब क्या बात हो गई? और मै दरवाजे पर ही इनको देखते खड़ी हो गई ।मेरे ससुर को एक बात को तीन चार बार बोलने की आदत थी ।वे बोलने लगे "देखो एक अजूबा घर मे आया, अपने आप स्वेटर बनाया। " मै तो सुन कर मुस्कुराने लगी पर कुछ समझी नहीं ।बच्चे बोलने लगे इधर देखो चाची ।मै जमीन पर देखी तो एक लम्बी सी लोहे की मशीन थी ।खुली रखी थी ।उसमे बहुत से लोहे के फंदे फंसाने के हुक थे ।करीब एक मीटर लम्बी थी और सात इंच चौड़ी ,चार इंच ऊंची थी ।

मेरे पति बहुत प्यार से बता रहे थेऔर मेरे ससुर बार बार बोल रहे थे" अब चाचा के पास बहुत पैसा हो गया ,अब चाचा के पास बहुत पैसा हो गया ।" मेरे पति ने तुरंत कहा कि लोन से लिया हूँ । अब सब चुप हो गये और चलो खाना खाते हैं करके चले गये।मशीन को उपर लाकर रख लिये ।हम लोग भी खाने बैठ गये ।मैने कहा कि क्यो खरीदे ? तो बोले कि तुमको स्वेटर बनाने का शौक  है इस कारण ।
मैने कहा कि वह तो मै बना रही हूँ ।"आपने इतना पैसा क्यो खर्च किया ।"बोले कि जल्दी स्वेटर बना लेना ।फिर बताये कि कल से सीखने जाना है ।एक माह फ्री मे सिखायेंगे।कल तुम्हें छोड दूगा ।बाद मे अकेले जाना ।

दूसरे दिन मुझे दिखाने ले गये ।शाम को रिक्से से मै आ गई ।सीटी कोतवाली के पास ही सिंगर की दुकान थी ।यह मशीन उसी कम्पनी की थी ।उस दिन  मुझे पता चला कि यह मशीन पूरी आटोमेटिक  है ।एक दिन मे पूरा एक फुल स्वेटर बनाया जा सकता है ।धीरे धीरे एक माह मे एक रंग की डिजाइन ,कई रंग की डिजाइन बनाना सीख गई ।शॉल स्वेटर ,मफलर सब बनाना आ गया ।उसके बाद मै हाथ से बनाने वाले स्वेटर का पिछला हिस्सा मशीन से बनाने लगी ।लोगों को पता चला तो परिवार के लोगों ने ऊन भेजना शुरु कर दिया ।कई लोगों ने सलाह दी की पैसे लिया करो ।उस समय रायपुर मे एक ही के पास स्वेटर बनाने की मशीन थी ।साइंस कालेज मे मलेवार सर थे उनकी पत्नी के पास ।मेरे शादी के समय मेरे लिये स्वेटर उनसे बनवा कर दिया गया था ।

मेरा काम बढ़ने लगा था ।मेरी वित्तीय हालत देखकर लोग पैसा ले लो बोलने लगे ।साइंस कालेज ,महिला महाविद्यालय ,और कृषि महाविद्यालय से आर्डर आने लगे ।रायपुर मे स्वेटर बनाने का रेट डेढ़ रुपये गोला था तो मैने सवा रुपये के रेट से पैसा लेना शुरु किया ।एक गोला याने पच्चीस ग्राम होता था ,अभी भी गोले का वजन वही है ।अब मै आठ बजे पति के जाने के बाद  स्वेटर बनाने बैठ जाती थी ।दस बजे चाँवल पकाती थी ।खाना खाकर फिर बनाने बैठ जाती थी ।थोड़ा भात बचाकर रख लेती थी उसे दोपहर को खाती थी । शाम को पांच बजे तक बनाते रहती थी ।उसके बाद नीचे सास ससुर जेठानी के पास बैठती  थी बच्चों से बात करती थी ।शाम छै बजे कोयले की सिगड़ी जलाकर खाना बनाना शुरु करती थी ।सात बजे तक खाना तैयार हो जाता था उसके बाद पत्रिका पढ़ते रहती थी ।

साढ़े सात बजे पति के आने के बाद खाना खाकर पूरे दिन के काम का लेखा जोखा रखती थी ।वे बहुत खुश हो जाते थे ।अब पैसे भी आने लगे थे ।पैसों से कुछ बर्तन खरीदने लगी थी ।घर के सामने ही एक ठेले मे बर्तन बिकने के लिये आता था । अब घर मे फोल्डिंग चेयर भी आ गया ।एक रेक , एक बड़ा ट्रंक जिसमे कुछ सामान रख सकूं ।एक कमरा जिसमे पूरी गृहस्थी थी ।खाना भी वहीं बनता था ।अब स्वेटर की मशीन भी एक टेबल पर फंसा कर रखी थी ।

अब काम इतना बढ़ गया कि एक दिन में दो स्वेटर बनाती  थी।अब सिलाई करने के लिये अपनी ननंद को रखी ।सास भी शाम को बैठकर ऊन की लच्छियों के गोले बनाने लगी ।एक गोले का चार आना और एक फुल स्वेटर कि सिलाई का पांच रूपिया देती थी ।अब घर मे मेरे प्रति प्यार बढ़ रहा था क्योंकि वह तो पैसे की दुनिया थी । सभी के लिये फोकट मे स्वेटर भी बना दी थी ।

कोई भी स्वैटर बनवाने आता था तो दरवाजे पर ही खड़े होकर बात करते थे । वहीं पर मै नाप लेती थी ।पैसा लेती थी ।स्वेटर बनने के बाद वहीं पर लाकर देती थी ।दरवाजे पर ही लोग नाप कर देखते थे और जो बोलना होता था बोलते थे ।एक बार एक ऊन वाले का स्वेटर बनाई थी ।वह शाम को आया कि अब हम लोग हरियाणा जाने वाले हैं ,स्वेटर बन गया हो तो दे दो ।मै स्वेटर को लेकर आई ।वह अपनी सायकिल से नीचे नही उतरा ।वह स्वेटर को पहन कर देखा और ननंद से बात करने लगा ।मुझे लगा अब पैसा देगा ।वह बात ही करते करते अचानक तेजी से निकल गया ।चौक के पास पहुंचते  ही हम लोगों को टाटा किया और तेजी से निकल गया ।

रात को इस बात की घर पर बहुत चर्चा हुई ।मेरी सास.बहुत गालियां दे रही थी ।ससुर भी कहने लगे ईमानदारी भी को चीज होती है ।आजकल बेईमानी बहुत बढ़ गई है ।सास ने हिदायत दी कि पहले पैसा रखो तब पहन कर देखना बोलना ।जेठ तो बोलने लगे कि अब सुबह मेरे सामने स्वेटर देना ।धंधा अच्छा चल रहा था ।नाम भी होने लगा था । अब तो रायपुर मे भी लोग सुनकर आने लगे थे ।

इस तरह की घटना होती रही ।एक ने स्वेटर के ऊन और बनवाई का भी पैसा नही दिया ।गांव भेजते थे तो आर्डर आता था ,ऊन खरीद कर बना कर भेजते थे पर पैसा नही आता था ।अंदर से पीड़ा होती थी कि इतनी मेहनत करती हूँ उसके बाद ऐसी घटना हो जाती है ।गीता मे कहा गया है कर्म का फल मिलता है पर मै तो सब के साथ अच्छा कर रही हूँ तो मेरे साथ बुरा क्योंं हो रहा है ।ईश्वर ऐसे ही परीक्षा लेते होगें।सहने कि क्षमता कितनी है ?सहने के बाद कैसी प्रतिक्रिया देते हैं ? मेरे पति ने भी कहा कि शायद यह किसी को देने का होगा जाने दो ,अपने काम पर ध्यान दो ।एक ने चिल्हर नहीं होने का बहाना बना कर साठ रुपये लेकर चला गया ।उस समय चालिस रुपये पौंड ऊन की कीमत थी ।एक पौंड ऊन मे एक फुल स्वेटर बनता था ।

भगवान की जैसी ईच्छा सोचकर काम करती रही ।नौकरी छोड़ने का दुख नहीं रहा ।एक क्षेत्र मे मै अपना पैर जमा रही थी ।धंधा करना आसान नहीं होता ।उसके लिये जिसका परिवार शिक्षा से जुड़ा हो ।पर मैने यह कर दिखाया था ।

ये दिन भी अपने थे - 82

हम लोग घूमने का कार्यक्रम बनाने लगे ।बहुत सोचने के बाद हम लोग पूरी जाने का सोचे।तैयारी करने लगे थे कि मेरे मन मे आया कि सास ससुर को भी ले जाते है ।आखिर माँ बाप हैं ।फिर पति ने कहा कि मुन्नी को भी ले चलते है ।आखिर बहन है ।शादी के बाद घूम पायेगी कि नहीं ? इन्होने नीचे सास ससुर और मुन्नी से भी चलने को कहा । सब तैयारी मे लग गये ।

रास्ते में खाने के लिये रोटी सब्जी सास ने बनाया था।मैं कुछ सूखा नास्ता और फल बिस्कुट रख ली थी ।चौका अलग हो चुका था ।यह यात्रा हमें पास ला रही थी ।पूरा खर्च हम लोग कर रहे थे तो सास ससुर बहुत खुश थे । घर से सब सुबह निकले और रेलवे स्टेशन पहुँच गये ।मेरी ननंद पहली बार ट्रेन मे बैठी थी । रायपुर से पुरी तक के रास्ते की हरियाली मन को मोह रही थी ।सभी खेत एक से थे बस अंतर था तो मेड़ पर लगे पेड़ो मे पलाश,बबूल,सीरसा, की जगह नारियल के पेड़ आ गये थे ।सागोन सभी जगह की शोभा बड़ा रहे थे।

सुबह  भुनेश्वर पहुँच गये । पास में ही भुनेश्वर  होटल था ।पांच मिनट पैदल चलने के बाद आ गया ।हम लोग वहाँ दो कमरा किराये पर लिये ।नहा कर तैयार हो गये ।उसी दिन बस से पूरी मंदिर के दर्शन के लिये निकल गये ।

पुरी पहुँचने के बाद पैदल मंदिर तक गये ।पूरा मदिर आराम से देख लिये ।वहाँ पर एक कल्प वृक्ष है ।उसमे मैने बच्चे के लिये एक धागा बांधा ।मंदिर का पट बंद हो चुका  था ।पंडा ने कहा कि पैसे दो तो अंदर से दर्शन करा देंगे ।पति ने उसे पचास रुपये दिये । वह पंडा हम लोगों को बाजू के दरवाजे से अंदर ले गया ।हम लोग जगन्नाथ भगवान के सामने खड़े थे ।वहाँ पर आरती हो रही थी ।एक थाल मे भोग रखा था ।जगन्नाथ भगवान की मूर्ति के सामने हम लोग बिल्कुल छोटे से लग रहे थे ।अच्छे से दर्शन हो गया ।अंदर में काउंटर से सूखा प्रशाद खरीदे । बाहर निकल कर महाप्रशाद खरीदे । वापसी मे लोहे के स्तंभ के पास बैठ कर मेरी सास ने कहा कि भगवान अब एक बेटा बेटी हो जाये तो फिर दर्शन करने आयेंगे ।तुरंत मेरे ससुर ने कहा कि चलो एक बार आ गये अब क्या बार बार आयेंगे चलो ।मेरी सास बहुत जोर से हँस दी ।

मंदिर से निकलने के बाद हम लोग पूछते हुये हिंद महासागर की ओर बढ़ गये ।दो बजे से आगे घड़ी का काटा सरक चुका था ।रास्ते में एक साधारण से होटल मे हम लोग खाना खाने बैठ गये ।वहाँ पर एक बड़े से थाल मे मछली साफ करके  रखे थे ।मेरी सास ने कहा कि हमारे खाने के बाद इसे छौकना ।उसने हाँ कह दिया ।खाने बैठे वैसे  ही मछली छौक दी पर मेरी सास तो खा ली पर मै गंध की वजह से नहीं खा पाई ।खाना पत्तल पर परसा गया था । मेरी सास ने पूरा पत्तल उठा कर रख ली और मुझे हाथ धोने के लिये भेज दी ।हम सब समुद्र की ओर बढ़ गये ।रास्ते मे एक घर के बाहर चबूतरा बना था ।सास वहाँ पर बैठ गई तो हम लोग भी बैठ गये ।वहां पर वह मुझे पत्तल के खाने को खाने के लिये बोली ।वहीं पर मै बैठ कर खाना खाई ।ऐसा महशूस हो रहा था कि भिखारी हैं ।मुझे बहुत खराब लग रहा था ,पर सब मेरे बाजू मे खड़े हो गये थे कि रास्ते चलने वाले न देखें ।उसी समय घर के लोग बाहर आ गये और मुस्कुराने लगे ।स्वर्गलोक जा रहे हो ? हम लोग चुप रहे ,कुछ समझ मे नहीं आया ।हम लोग आगे बढ़ गये ।

समुद्र के किनारे पहुँच चुके थे ।अथाह पानी अरब सागर की याद दिला रहा था ।पर यहां बहुत से सीप और छोटे छोटे शंख बिखरे थे ।मै उसे बीनने मे लग गई ।सास अपने कपड़े के थैले से नारियल निकाली ,कुछ फूल भी रखी थी ।फिर ससुर जी से  पैसे ली ,एक रुपये का सिक्का और सब लोगों को हाथ लगाने बोली ।सबने उसे छुआ फिर सास ने उसे समुद्र की लहरों मे फेक दिया ।फूल और नारियल को लहरों के साथ आते जाते देखते रहे और वह आंखो से ओझल हो गया ।शाम होने लगी थी ।सूरज क्षितिज की ओर पहुँच चुका था ।उस डुबते सूरज की लालिमा से समुद्र की गहराई का आभास होने लगा ।उसकी विशालता को मन मे लेकर लौट चले ।बस स्टेंड पहुंच कर भुनेश्वर के लिये बस पकड़ कर भुशेश्वर पहुच गये ।

मै बहुत से सीप और शंख लाई थी उसे कमरे के कोने मे रख दी थी ।रात को नींद मे भी मुझे समुद्र दिखाई दे रहा था ।सुबह नींद खुली तो लग रहा था कि रात भर समुद्र के किनारे मे ही घूम रही थी ।दूसरे दिन बस से कोनार्क गये ।समुद्र के किनारे बना यह मंदिर अद्भुत है ।वहाँ के एक होटल मे खाना खाये और मंदिर की तरफ चले गये ।मंदिर को सूर्य मंदिर कहते है ।यहाँ पर पूजा नहीं होती है । मंदिर के बाहर की तरफ सूर्य भगवान की मूर्ति बनी है ।सूर्य की पहली किरण एक मूर्ति के पैरों पर पड़ती थी तो पश्चिम की किरणे दूसरी तरफ की मूर्ति के पैरों पर पड़ती हैं ।मंदिर बब़े बड़े आठ चक्के पर बना है ।चक्के के ऊपर खुदाई से मूर्तियां बनी हुई है।मंदिर के बाहर मिथुन मूर्तियां बनी हुई हैं ।मंदिर का मुख्य द्वार बंद कर दिया गया है ।मंदिर के अंदर नहीं जा सकते है ।समुद्र उस मंदिर से दूर है ।मंदिर के बाहर भी मंडप बने हैं ।इसे देखकर हम लोग चाय पी कर बस से पीपली गये ।बस वहीं तक जा रही थी ।

पीपली मे एक टेबल क्लाथ खरीदे ।वहा पर बहुत से घरों मे एप्पलिक वर्क का काम होता था ।कुटीर उद्योग अच्छे से फल फूल रहा था ।पीपली एक गांव है ।उस गांव के लोग एप्पलिक वर्क का काम करते है ।इस कारण इस काम को  पीपली वर्क भी कहते है ।चादर ,टेबल क्लाथ, वाल हैंगिग ,लैम्प शैड ।कुशन कवर इत्यादी बनाते हैं ।

यहाँ के होटल मे चाय पी कर बस के लिये खड़े हो गये ।अब आठ बज गये थे ।जो भी बस आती  वह विपरीत दिशा की ओर जाती थी ।एक ने बताया कि अब भुनेश्वर के लिये बस नहीं मिलेगी ।हम लोग घबरा रहे थे ।इतने मे एक मेटाडोर आई ।कुछ सामान छोड़ने के बाद वह वापस भुनेश्वर जा रही थी ।उसमे कुछ लोग बैठ रहे थे ।एक लड़का बोला कि ये लोग भुनेश्वर जायेंगे बैठा लो ।सभी लोग मजदूर थे तो हम लोग बैठने मे झिझक रहे थे ।वह लड़का बोला माँ बैठो नहीं तो यही रास्ते मे रात को सोना पड़ेगा ।

मेरे पति ने पूछा कि कहां छोड़ोगे? तो वह लड़का बोला होटल मे छोड़ देगा ।वह बस किराया के बराबर पैसा ले लिया ।कुछ लोग खड़े थे।कुछ लोग  बैठ गये ।एक आदमी मेरे ननंद के पास खड़ा था ,बार बार ननंद से टकरा रहा था  तुरत एक लड़के ने हम लोगों को बैठा दिया और सबसे बोलने लगा कि टूरिस्ट है ।"जगह दो जगह दो, माँ हैं"।सब चुप हो गये और हम लोग बहुत मजे से बैठकर आ गये ।हम लोगों को खाना खाना था इस कारण पति ने कहा कि रोड मे छोड़ दो तो वह सुन नहीं रहा था ।वह बोला  नहीं आप को होटल मे ही छोड़ुंगा ।वही पर आप लोग खाना खा लेना । हमको बोला गया है कि  होटल मे छोड़ना  जो वहीं छोड़ुंगा ।हमें जिसने इस गाड़ी मे बैठने के लिये कहा था उसने इससे कहा था कि ठिक से होटल मे छोड़ना तो वह उसी की बात को मान कर  हमें रास्ते मे छोड़ना को तैयार नहीं हुआ ।

मेटाडोर मे अंत मे हम लोग  ही बचे थे ।हम सब लोग बोले तब वह हमे होटल के पास एक दूसरे होटल मे छोड़ा।हम लोग खाना खा कर पैदल होटल पहुँच गये ।तेईस नवम्बर को मेरा जन्मदिन बहुत अच्छे से बीत गया।उस दिन मेरी ननंद का जन्मदिन भी रहता है ।हम दोनों बहुत खुश थे । तीसरे दिन नंदनकानन बगीचा और चिड़ियाघर देखने गये ।बाटेनिकल गार्डन गये ।शाम को होटल आ गये ।चौथे दिन याने पच्चीस तारीख को बस से भुनेश्वर घुमे ।लिंगराज मंदिर ,राजारानी मंदिर देखे ।दो गुफा देखे ।रात को निकल कर दूसरे दिन रात तक रायपुर आ गये ।

उड़ीसा के लोग याद आते रहे ।बहुत सरल लोग मिले ।होटल का मैनेजर भी बहुत अच्छा था ।पीपली की घटना याद आती रही  इतने अच्छे लोग जिन्होने प्यार से बैठाया , हमे अपने होटल के पास छोड़ा ।चाहते तो ज्यादा पैसा ले सकते थे पर ऐसा नहीं हुआ ।हर समय हमें अच्छे लोग मिले ।एक यादगार यात्रा थी ।यह हमारे सास ससुर और मुन्नी के साथ की आंतिम यात्रा थी ।बच्चे के साथ याने नाती नातिन के साथ एक बार और आने का वायदा किया था सास ने ।

ये दिन भी अपने थे - 81

मैने उच्च वर्ग शिक्षक के लिये फार्म भरा था ।उसमे कुछ पद व्याख्याता के लिये भी थे ।मेरे साक्षात्कार का दिन भी आ गया । मेरे पति तो साथ मे नहीं गये थे ।मेरे पिताजी  डी एस सी आफिस तक छोड़ने गये थे ।उस समय पेंंशन बाड़ा था उसके आगे की बहुत सी जगह खाली थी ।इसी खाली स्थान पर डी एस सी आफिस था ।उसके आगे कि जगह खेत के रुप मे खाली थी ।

मध्यप्रदेश था ।छत्तीसगढ़ तब बना नहीं था ।वहाँ बहुत से लोग थे ।मेरे साथ बी एड किये लोग भी थे ।कुछ रिस्तेदार भी थे ।मेरे चाचा का लड़का आया था और मेरे बुआ की बेटी भी आई थी ।वहाँ पर चाय के अलावा कुछ नहीं मिलता था ।साक्षात्कार चलते रहा लोग खाने के लिये इधर उधर घूम रहे थे ।तब बेचने के लिये वे लोग डबलरोटी और भजिया लेकर आये थे ।लोग यही खा रहे थे ।मै दस बजे खाना खाकर गई दी पर एसीडिटी की वजह से भूख लगने लगी थी ।मैने अपने चाचा के बेटे राजेंद्र से कहा कि कुछ खाने के लिये ले आ ।वह गया और डबलरोटी का छोटा पैकेट लेकर आया ।मै चाय तो नहीं पी पर सुखा डबलरोटी खा ली और पानी पी ली ।

एस की पारी आते तक शाम होने लगी था ।कुछ लोग पेड़ के नीचे लेट गये मै भी लेटी थी ।मेरी बुआ की लड़की सरस्वती की एक माह की बच्ची थी ।हम दोनों उसे पारी पारी से पकड़ते थे ।वह पहले गई तो उसके बच्चे को मै अपने गोद मे रखी थी ।उतने मे ही हमारे साथ बी एड करने वाला एक लड़का पांडव आया और बच्चे को मेरे गोद से उठा लिया ।एक हाथ से बच्चे के सिर को और एक हाथ पर अपना रुमाल रख कर नीचे के हिस्से को रख कर घूमाने लगा ।बीच बीच मे मुझे देखता था ।

सरस्वती बाहर आई और मै अंदर गई ।वह गुड़िया कहाँ है पूछी तो मैने कहा कि वह पांंडव के पास है ।वह बाहर अपने बच्चे को खोज रही थी क्योंकि वह भी पांंडव को पहचान ली थी ।मै बैठी थी तब पांडव कई चक्कर लगाया था तब मै उसके बारे मे सरस्वती को बताई थी ।कैसे वह पान खाते हुये धोती कुरता पहन कर बाबू मोशाय बन कर कालेज आता था तो कभी विवेकानंद बन कर आता था ।शर्ट पेंट पहनना तो वह यहींं सिखा था ।

मुझसे तीन प्रश्न ही पूछे गये थे ।मेरा प्रेक्टीकल मे प्रथम  स्थान  था तो मुझे परेशानी नहीं हुई ।मैं साक्षात्कार देकर वापस आई तब सरस्वती पांंडव की तरफ देख रही थी ।वह अपने रूमाल को लपेट रहा था ।मै उसके पास गई ।वह तो मुस्कुरा रहा था पर मुझे हँसी आ रही थी कि कितना उल्लू है ।वह बोला आपकी बेटी ने मेरे हाथ पर ही ची ची कर दी ।उसका चेहरा देखने लायक था ।मैने कहा " ये मेरी बेटी नही है मेरी बहन की बेटी है ।उसका नम्बर आया यो इसे मैं पकड़ी थी ।मेरे से तुम ले लिये ।" अब तो और भी देखने लायक चेहरा हो गया था ।

उसी समय सरस्वती आ गई ।उसने बच्चे को लिया और उसके रूमाल से ही चीची साफ करके किनारे फेक दी मैने कहा तुम्हारा रुमाल खराब हो गया सॉरी ।उसने कोई बात नहीं कह तो दिया पर सदमे में आ गया ।वह मेरा बच्चा है सोच कर पकड़ा और ची ची को भी अपने रुमाल मे पोछ कर पकड़े रहा ।हम दोनों बहने उस पर हंसते रहे और बाहर निकल गये ।वह हमें ठगी निगाहों से देखता रहा ।

शायद इसी तरह लड़के ठगे जाते है और लड़किया मजाक करती रहती है ।लड़की और लड़के के बीच आकर्षण रहता है और इसी चक्कर मे दोनों ही ठगे जाते हैं ।

कुछ दिनों मे लिस्ट निकल गई ।मुझे अभनपुर के पास ग्राम खोरपा मे नौकरी मिली ।मायके और ससुराल दोनों जगह मे सब खुश थे ।मै अपने काका के साथ जाकर जॉयन कर ली ।मै सायकिल और गाड़ी नहीं चलाती हूँ ।काका ने अभनपुर से एक बैलगाड़ी बंधा दिये थे ।मै अभनपुर तक बस से जाती थी उसके बाद बैल गाड़ी से जाती थी ।घर आते तक रात हो जाती थी ।

जेठानी ने काम के लिये बोलना शुरू कर दिया था ।मै पांच बजे उठ कर खाना वैगरह बना देती थी फिर स्कूल जाती थी ।स्कूल से आने के बाद सास ससुर को परसने का ही काम रहता था ।जिस दिन तनख्वाह मिली उस दिन मै बहुत खुश थी ।अब पैसा हमारे पास रहेगा ।रात को मैने अपने पति से बताया कि अब हमारे पास पैसा है तो कभी बाहर भी खा सकते  है ।वे मुस्कुरा कर सो गये ।सुषह नीचे ससुर से कुछ बात हो रही थी ।वे ऊपर आ कर बोले कि पैसा ससुर को दे देना ।मेरा गाल छूकर चले गये ।उनके जाने के बाद पूरा पैसा मैने अपने ससुर को दे दिया ।उसके बाद मैने कहा कि मुझे कुछ पैसे आने जाने के लिये चाहिये ।मुझे सिर्फ पचास रूपये  दिये और चले गये ।

मै बहुत दुखी मन से गई ।धीरे धीरे तबियत और खराब होने लगी पांच छै माह के बाद मै छुट्टी ले ली ।उसके बाद तो मै मेडिकल पर आ गई ।धीरे धीरे तीन साल चला और मैने काका के डांटने के बाद नौकरी छोड़ दी ।एक दिन काका ने कहा कि" तुम साइंस टीचर हो, तुम्हारे नहीं जाने से बच्चों का नुकसान होता है ।नौकरी छोड़ दो ।"मैने स्तीफा दे दिया ।एक एम एस सी लड़की का कैरियर ऐसे ही खतम हो गया ।

मेरे पति इसलिए खुश थे कि इतना काम करने के बाद भी पैसा तुम रख नही सकती हो तो नौकरी करने का क्या फायदा ।बस इसी तरह मै घर पर रह कर अल्सर की पीड़ा को झेलती रही ।मैने एक बार फिर कोशिश की कि नगर निगम के स्कूल मे नौकरी मिल जाये ।उस समय भी पहुंच वालों को ही नौकरी मिलती थी ।मेरे सामने ही मेरी एक सहेली को नौकरी मिल गई ।बी एस सी तृतीय श्रेणी मे थी ।उसने बी एड भी नहीं किया था ।दिल कांच की तरह टुटते जा रहा था ।

इस बीच बाहर घूमने का कार्यक्रम भी बना लिये थे ।जीवन की लड़ाई लड़ते रही ।मन की वेदना दिल को कमजोर कर रही थी ।दिल का सम्बंध पेट से होता है ।पेट भी अपना रंग दिखा रहा था ।धीरे धीरे शरीर कमजोर होते जा रहा था ।डाक्टर ने कहा कहीं बाहर घूम कर आ जाओ अच्छा लगेगा।

01-05-2016 देशबन्धु - अवकाश अंक