रविवार, 24 जनवरी 2016

ये दिन भी अपने थे - 76



पहली होली हम लोग मायके मे मनाते है ।घूम कर आने के बाद पेट दर्द की तकलीफ और ज्यादा बढ़ गई थी ।मै माँ के घर रहने नहीं गई ।मार्च में होली थी तो एक सप्ताह पहले ही रहने चली गई ।हम लोग होली भी मना लिये ।माँ मुझे हमारे फैमिली डाक्टर के पास ले गई ।हम लोग होमियोपैथी लेते थे ।बूढ़ापारा मे डाक्टर बी सी गुप्ता के पास मां ने दिखाया ।तकलीफ और लक्षण देखकर उन्होंने बताया कि यह एसिडीटी की शिकायत है पर अल्सर की शुरुआत लग रही है ।मुझे मिर्च मसाला खाने से मना कर दिया गया ।

दो माह रहने के बाद मायके से ससुराल आई ।ससुराल आते ही मेरी परेशानी बढ़ गई ।लाल खड़ी मिर्च को सिलबट्टे पर पीस कर सब्जी में डाला जाता था ।उसे कैसे अलग से पीस कर डाले ? क्योंकि खड़ी हल्दी और खड़ा धनिया सब पीस कर एक साथ डालते थे ।सब्जी मे तेल भी बहुत रहता था ।दो घरों के बीच के खान पान मे जमीन आसमान का अंतर हो तो ,एक लड़की के लिये बहुत मुसीबत होती है ।सब कुछ संंतुलन बना कर चलना पड़ता है ।लड़की को ही यह सब करना पड़ता है ।मेरी जेठानी ने बहुत प्यार से तंंग करना शुरु किया।

बिना मिर्च के सब्जी बन नहीं सकती थी क्योंकि मसाले अलग कैसे पीसें ? तेल भी कम नहीं हो सकता था क्योंकि मसाले नहीं भुन पाते ? सास का व्यवहार भी अब समझ मे आने लगा था ।मेरी माँ का व्यवहार बहुत ही प्यार करने वाला था ।दूसरों की मदद करने को तैयार रहती थी ।वही हमारी सास बहुत ही स्वार्थी थी ।सास ससुर दोनो को बच्चों से ज्यादा उनके पैसे से प्यार था ।कुछ काम करके खुश रखो या फिर पैसे देकर खुश करो ।

हर बात पर पैसा ही रहता था ।ससुर की पेंशन अच्छी थी घर नूरानी चौक राजातालाब में था। घर पर तीन दुकान बना कर किराये से दिये थे किराना स्टोर चलाने वाले सोनी जी अपनी पत्नी के साथ रहते थे ।एक मेडिकल स्टोर था ।एक होटल था । घर मे गाय थी ।मुर्गी भी पाले थे ।तीन रिक्शा रखे थे जिसे किराये पर देते थे ।पर हर माह की पूरी तनख्वाह दोनों बेटे माँ के हाथ मे देते थे ।

रोज इनकी सायकिल में हवा भरवाते थे ।रोज सुबह पचास पैसे ससुर से मांगते थे क्योंकि भिलाई नगर से सिविक सेंटर तक टेम्पो से जाते थे ।शायद आज के बच्चों ने तो टेम्पो देखा भी नहीं होगा ।तीन चक्के की बड़ी आटो से भी बड़ी होती थी ।यह भिलाई मे सबसे ज्यादा चला करती थी ।यदि ससुर न हों तो पचास पैसे नहीं मिलते थे और उस दूरी को पैदल ही चल कर पूरी करते थे ।रेल का पास बनवाने के लिये साढ़े सत्रह रुपये भी ओवर टाइम करके कमाना पड़ता था ।

ऐसा मैने कभी देखा नहीं था ।हमारे मायके मे एक चमड़े के बैग में पैसा रखा रहता था ।एक डायरी और पेंसिल रखा रहता था ।मै या माँ जो भी जितना भी पैसा निकालते थे उसमे लिख देते थे ।हमको अपने काका को बताने की जरुरत नहीं होती थी ।यहां पर पैसे का हिसाब किताब बहुत ही गोल मोल था ।महिने मे एक साबुन एक छोटी तेल की शीशी सब को दे देते थे ।सब बाकी के शौक चाहे जैसे पूरा करो ।मेरा देवर गांधी मेडिकल कालेज भोपाल मे पढ़ रहा था ।उसे तीन सो पचास रुपये मेरे पति अपने बैंक मे ही अपने तनख्वाह से भेज देते थे ।बाकी पैसा सास को देते थे ।

तनख्वाह वाले दिन साढ़े मात बजे सोने न जाकर दरवाजे पर बैठे रहती थी या फिर अपने कमरे के दरवाजे पर बैठी रहती थी ।सास को लगता था कि अपने कमरे मे जाने के बाद पैसा पत्नी को न दे दे या फिर कम पैसा दे ।जेठ और मेरे पति दोनों ही पैसा दरवाजे पर ही सास के हाथ मे रख देते थे ।मै संयुक्त परिवार मे रही नहीं थी मेरे चाचा उनके बच्चे , बुआ के दो बेटे , मामा के बेटे हमारे साथ रहते थे ।रायपुर मे पढ़ने के लिये आये थे ।मेरे काका उनसे कुछ नही लेते थे बल्कि "विद्या दान परम दान " की सोच रखते थे ।खाना कापी पुस्तक और पेन स्याही सब खरीद कर देते थे।सब एक जैसा खाना खाते थे ।मैने जब यह सब देखा तो और तनाव मे आ गई थी ।

सास दोपहर को फल वाली आती तो चार केले खरीदती थी ।दो बच्चों को और दो स्वयं खा लेती थी ।हम लोगों को पूछती भी नहीं थी ।मेरी जेठानी और मुझे कहती थी कि खाना है तो तुम लोग भी खरीद लो ।यदि कुछ खरीदते तो पति से पूछती कि पैसा कहां से आया तनख्वाह बढ़ गई है क्या ? उनके कहने का मतलब होता था कि पैसा बचा कर रख लिये है तभी कुछ खरीद रहे है ।हर दूसरे महिने या तीसरे महिने मेरे ससुर बैंक जाकर पूछते थे कि तनख्वाह कितनी मिलती है ।सरकारी नौकरी मे थे तब तो उन्हें पता होना चाहिये कि तनख्वाह साल मे एक बार ही बढ़ती है ।

जेठ पी एच ई मे थे तो उनकी कुछ ऊपर की कमाई होती थी ।रात को वे कभी कभी पी कर भी आ जाते थे ।मैने देखा कि मेरे पति भी दस बजे आने लगे थे ।मैने पूछा तो बोले काम अधिक था ।महिने भर बाद बताये कि ओवर टाइम कर रहा था ।तुम मेरी जिम्मेदारी हो तो तुम्हारे लिये भी तो पैसा चाहिये ।और मेरे हाथ मे कुछ पैसे रख दिये याद नहीं है ठीक से पर तीन चार सौ थे करीब ।मेरे तो आंंसू आ गये ।सही है फल खाने की आदत थी पर यहाँ अपने पैसे से खरीदना पड़ता था । दूध भी नहीं देते थे मुझे रोज दूध पीने की आदत थी ।

ठेला वाला शाम को आता था तो हर महिने चूड़ी बिंदी ससुर जी खरीद देते थे ।आलता खरीदते थे ।क्योंकि हमारी सास आलता लगा कर ही रहती थी ।खूब अच्छे से श्रंगार किया करती थी ।ससुर सास का कहना था कि पत्नी को ऐसे ही रहना चाहिये इससे पति की उमर बढ़ती है ।यह सब खरीदने के पीछे उनका स्वार्थ था कि बेटे की उमर बढ़ेगी ।गन्ना खरीद कर बढ़िया दांतो से छिल कर खाती थी ।मौसम के हर फल पर उनका अधिकार था ।पोखरा , सिंघाड़ा , खोखमा , संतरा , अंगूर ,चीकू , के साथ साथ मौसम की सब्जी भी खाती थी ।बस हम दोनों देरानी जेठानी को खरीद लो कह देती थी ।

पोखरा कमल का फल है और खोखमा कुमुदनी का फल है ।यह दोनों फल को छत्तीसगढ़ मे बहुत खाते है और फलाहारी भी बनाते है खोखमा का बीज खसखस के दानों की तरह होता है इसे सुखाकर पीस लेते है और सिंघाड़े के आते की तरह ही फलाहार में उपयोग करते हैं ।कभी कभी अपने पसंद की सब्जी बना लेती थी पर यह साल मे दो तीन बार ही होता था ।मैने वहा कभी नास्ता बना कर रखते नहीं देखी।सब दोनों बहुओं के घर से ही आता था ।

वह एक चीज़ बहुत अच्छी बनाती थी "पिड़िया "। यह छतीसगढ़ का खास कलेवा है ।यह राजीम के "राजिवलोचन "मंदिर मे भोग के रुप मे मिलता है ।यह चांवल के आटे से बनता है । किसी भी त्योहार मे कुछ भी पक्का नास्ता नहीं बनता था ।होली मे उड़द दाल के बड़े , दीपावली मे शक्कर पारा , आलू के रसगुल्ले , और बेसन का सेव बनाते थे ।खीर पूरी जो मेरे मायके में बनते रहती थी वह यहां नहीं बनता था ।

भाजी अक्सर शाम को बनती थी । क्योंकि मुर्गा मटन बनता था ।उस भाजी को कढ़ाई मे ही हमारी जेठानी आठ हिस्से मे बांट कर रख देती थी ।इससे सबको बराबर मात्रा मे सब्जी मिले ।हम तीन लोग ही शाकाहारी थे उन्हें भी कम सब्जी से काम चलाना पड़ता था ।

ऐसा घर और ऐसा परिवार मैने कहीं न सुना था और न देखा था ।इन सब के बीच ताल मेल बैठाना बहुत कठिन हो रहा था ।तनाव बढ़ रहा था तो साथ ही पेट की तकलीफ भी बढ़ रही थी । आज भी मै इसे समझने की कोशिश करती हूँ पर समझ नहीं पाती ।यह पैसा का मोह बुढ़ापे के डर के कारण था कि वास्तव मे मोह ही था ।कभी किसी बेटे बहू के लिये कपड़ा नहीं खरीदे थे ।ननंद के लिये ही खरीदते थे ।हम लोग मायके का ही पहनते थे ।जेठानी कभी कभी खरीद लेती थी तो घर मे तनाव पैदा होता था ।

इस तनावपूर्ण वातावरण मे जीवन गुजर रहा था चार पांच महिने मे ही जितना समझने की कोशिश करती सम्बन्धों के बीच के प्यार को वह उतना ही उलझते जा रहा था ।

ये दिन भी अपने थे - 75



छब्बीस नवम्बर को दोपहर तीन बजे जबलपुर पहुंचे ।बस स्टेंड के पास पवाल होटल मे एक कमरा लिये ।नहा कर तैयार हो गये और घूमने निकल गये ।शीला टॉकीज मे "काला पत्थर " फिल्म लगी थी , हम लोग उसे देखने चले गये । साढ़े दस बजे आकर एक थाली खाना मंगा लिये और खा कर सो गये ।

दूसरे दिन सुबह छै बजे उठ कर तैयार हो गये और भेड़ा घाट जाने के लिये निकल गये ।रास्ते मे समोसा खा कर चाय पीये और दो पैकेट नमकीन और एक पाव रसगुल्ला खरीद कर रख लिये ।मुझे रसगुल्ला बहुत पसंंद है । एक टेम्पो मे बैठ कर धुआंधार देखने चले गये ।प्रति व्यक्ति ढाई रूपये के हिसाब से वह ले जा रहा था ।वहाँ पहुँचने के बाद सीढ़ी से चढ़ कर उपर गये ।

रास्ते मे क्ई धाराये बह रही थी जो जाकर एक जगह मिलती थी ।मिलने के बाद एक मोटी धार नीचे गिर रही थी ।वह स्थान चारो तरफ से संगमरमर की चट्टान से घिरी हुई थी ।पानी की तेज धार जब नीचे गिरती थी तो पानी की छोटी छोटी बूंदे उपर उछल कर धुआं सा बना देती थी ।इस कारण इसे धुआंधार कहते हैं ।कुछ लोग सिक्के फेंक रहे थे जिसे कुछ बच्चे पैसे के लालच मे कूद कर पैसा निकाल भी रहे थे ।दर्शक उन्हें ईनाम मे पैसे दे रहे थे । हम लोग वापस लौटने लगे तब मै बहती नदी मे पैर डुबा कर खेलने लगी ।कुछ पत्थर बटोर ली ।रास्ते मेंं कृष्ण बुद्ध की मूर्ति और शिवलिंग खरीद ली ।

यहाँ पर नमकीन और रसगुल्ला खा लिये ।यहां से एक किलोमीटर की दूरी पर भेड़ाघाट मे चौसट योगिनी है उसे देखने गये । यहां से घाट तक आये और नौकाविहार के लिये निकल गये । प्रति व्यक्ति दो रुपये के हिसाब से घूमा रहा था । बंदर कूदनी तक गये थे ।यहां पर नदी के ऊपर दोनों तरफ की संगमरमर की चट्टाने इतनी पास हो गई है कि बंदर कूद सकता है ।इस कारण इसे बंंदर कूदनी कहते है ।

रास्ते मे पहले नीला संगमरमर था उसके बाद दोनों तरफ गुलाबी संंगमरमर की चट्टाने थी ।उसके बाद तीन रास्ते दिखते है ।इसे भूलभुल्लैया कहते है ।यहां सही रास्ते पर जाने से ही बंदर कूदनी तक जा पाते है ।यहां से पीछे पलट कर देखें तो नीले सफेद और पीले चट्टान दिखते है ।नीले चट्टान पर देखने से लगता है कि सूरज की रोशनी बादलों से छन कर आ रही है ।पीले चट्टानों पर देखने से लगता है कि सूरज का प्रकाश सीधे यहाँ आ रहा है ।सफेद चट्टानों को देखकर लगता है कि सुबह की चमकीली किरणें उस पर पड़ रही है ।

रास्ते मे हाँथी पांव , त्रिमुख ( ब्रम्हा विष्णु महेश ) तथा गणेश जी की गुफा दिखाई देती है ।यहीं पर मध्य की चट्टान पर शिवलिंग बना है। कहते है कि रानी दुर्गावती ने इसकी स्थापना करवाई थी ।इसके बाद बंदर कूदनी है ।पूरे ऊपर तक दूध की तरह सफेद चट्टान है ।यहाँ पर पानी की गहराई छै सौ फीट है ।पानी की गहराई के कारण एक डर सा मन में आ रहा था।नाव भी बहुत धीरे सरक रही थी ।यहाँ से हमारी नाव वापस होने लगी ।अचानक नाव ने सरकना बंद कर दिया नाविक के पसीने छुटने लगे ।उसे देखकर हम सब घबरा गये ।पांच सात मिनट के बाद नाव सरकी और नाविक तेजी से हाथ चलाने लगा ।

हम लोग घाट पर आ गये ।नाव से उतरने के बाद मै बहुत देर तक पानी मे खड़ी रही ।इस एहसास को अपने साथ रखना चाहती थी । सारी इच्छाये पूरी हो गई थी ।बस अब कुछ और देखने की ईच्छा नहीं हो रही थी ।हम लोग बस स्टेंड आते ही डिलक्स बस मे रिजर्वेशन करवा लिये ।रात को साढ़े आठ बजे हम लोग वापस रायपुर के लिये निकल गये।

बचपन से भेड़ाघाट देखने का शौक पूरा हो गया ।घूमने का पूरा चक्र जन्मदिन के नाम पर ही रहा ।यह मेरे पति के तरफ का एक बहुत बड़ा तोहफा था ।मैने जितनी कल्पना की थी कहीं उससे अधिक खूबसूरती को मैने देखा और अपने मन मे संजो कर रख लिया ।

दूसरी बार जब मै जबलपुर गई तो यह सुन्दरता नहीं दिखाई दी बहुत कुछ बदल गया था ।भेड़ाघाट पूरा बारिश के पानी से भरा था ।मै अपने एक सहेली के साथ दूसरे सहेली के घर गई थी ।उस दिन बाढ़ का पानी उतरा था ।जब भेड़ाघाट गये तो कांक्रीट का रोड बना था जो पूरा डुबा हुआ था ।प्रपात पूरा जमीन के ऊपर से बह रहा था ।न वह नदी थी और न वह खूबसूरती ।मैने भगवान को धन्यवाद दिया कि अच्छा हुआ मेरे मन मे वही सुन्दरता बसी रहे ।प्यार का वह एहसास भी बना रहेस।यह हमारी हनीमून यात्रा थी ।एक उपहार था ।

ये दिन भी अपने थे - 74



बाइस नवम्बर को हम लोग सुबह 6.15 पर वी टी स्टेशन पर उतरे थे ।आठ बजे सीटी गेस्ट हाऊस पर एक कमरा लिये ।55 रुपये एक दिन के हिसाब से ।नहा धोकर वही चाय पीये और साढ़े नौ बजे हम लोग घूमने निकल गये ।

गेट वे आफ इंडिया और ताज इंटर कांटिनेंटल देखे ।हम लोग जिस समय पहुंचे उस समय अरब सागर मे बहुत तेज लहरें उठ रही थी ।हल्की बारीश भी हो रही थी।समुद्र का पानी छलक कर गेट वे इंडिया तक आ रहा था ।एक तरफ समुद्र और दूसरी तरफ नये पुराने ताज की खूबसूरती देखने लायक थी ।मैने अपने जीवन मे पहली बार समुद्र देखा था अथाह पानी , क्षितिज तक पानी ।

यहां से हम लोग चर्च गेट रेल्वे स्टेशन गये ।चर्नी रोड की टिकट लेकर लोकल ट्रेन का मजा लिये ।फिर चौपाटी देखे जहां पर रेतीला समुद्री किनारा था और दुकाने थी ।यहाँ पर कचनार के बहुत से पेड़ थे । यहां से तारापोर एक्वेरियम गये ।तब प्रवेश शुल्क पचास पैसा था ।देश विदेश की मछलियों का संग्रह था आक्टोपस ,ब्रिटल स्टार , स्टार फिश ,रे फिश , स्कालियोडान को मै लैब मे शिशियों मे बद देखी थी ।इसे जिवित चलते और खाते हुये देखना बहुत ही रोमांचक था ।

सबसे पहले सी एनीमोन देखे ।इसका रंग गुलाबी था ।बहुत संख्या में थे ।कांंच से अनगिनत सफेद रंग के तंतु दिखाई दे रहे थे।ये चौकोर मुंह पर से हिल रहे थे ।इधर उधर तैर रहे थे ।यह सब दृश्य अपने मन मे लेकर होटल लौट आये ।उस दिन अगहन गुरुवार का उपवास था तो रात को दूध डबल रोटी ही खाये और सो गये ।

दूसरे दिन तेईस नवम्बर था और मेरा जन्म दिन भी था ।उस दिन हम लोग विक्टोरिया गार्डन , जू ,हाजीअली की दलगाह देखने गये ।उस दरगाह के पीछे सागर तक गये वहाँ पानी मे खेलने के बाद ही मै वापस आई ।ऐसा लग रहा था कि बचपन लौट आया है ।यहां से महालक्ष्मी के मंदिर गये और उसके पीछे समुद्र से डुबते सूरज को देखे ।वहाँ से पैदल हैंगिग गार्डन , कमला नेहरु पार्क घूमें , यहां से पूरे मुम्बई की रौनक देखने लायक थी ।लाईट से जगमगाता शहर और खिलौने की तरह दौड़ती अनगिनत कारें फिल्म की तरह लग रही थी ।

चौबीस नवंबर को हम लोग संंग्रहालय देखने गये ।पेंटिंग , चीनीमिट्टी के पॉट ,जानवरों के संग्रह थे ।पतंगो के जीवन चक्र को चित्रों सहित रखा गया था ।पढ़ी हुई चीज़ो को इस तरह से देखना बहुत ही ज्ञानवर्धक लगा ।यहाँ से लोकल से सांताक्रुज रेल्वे स्टेशन गये फिर हवाईअड्डा देखने गये।वहाँ की टिकट चार रूपये थी ।हवाईजहाज को उड़ते और आते हुये भी देखे ।

वहाँ से नेहरु प्लेनेटोरियम गये और " आकाश और मौसम " हिंदी मे देखे। यहाँ की छत गोलाकार होती है ।इसी पर आकाश ,तारे , चंद्रमा ,नक्षत्र , दिखाते है ।मौसम के अनुसार इसके परिवर्तन को देखे साथ ही अंधेरी रात , प्रातःकाल , सांयकाल का भी आनंद लिये ।यहां से शाम को बस से जूहू आ गये और चौपाटी का मजा लिये ।रात को वापस आ गये ।

वापसी मे हमें बस नहीं मिली ।आठ बजे के बाद सीटी बस नहीं चलती थी यह हमें पता नहीं था ।एक व्यक्ति हमारी परेशानी देखकर बोला कि यह बस सीधे फ्लोरा फाऊंटेन छोड़ेगी वहीं इसका स्टापेज है ।हम लोग बिना सोचे बैठ गये थे ।पूरे बस मे हम दो लोग औक दो कंंडक्टर ही थे ।राते मे एक व्यक्ति और चढ़ा। उसे देखकर आश्चर्य हुआ क्योंकि यह ट्रेन वाला वही लड़का था जो मेरे से मेरे पति के न रहने पर बात करता था ।यहां पर वह बात करने की कोशिश कर रहा था जब पूजा तो मेरे पति ने उसे सब बता दिया ।हम लोग एक ही जगह उतर गये ।वहसपूछता रहा कहाँ रुके है पर हम लोग तेजी से निकल गये ।

दूसरे दिन पूरा सामान लेकर होटल छोड़ दिये ।सामान रेल्वे के क्लाक रुम मे रख कर गेट वे आफ इंडिया आ गये ।यहाँ से आठ आठ रुपये की टिकट लेकर लॉच में बैठकर एलीफेंंटा देखने गये । समुद्री मार्ग से छै किलोमीटर पर है । द्वीप पर उतर कर पैदल चलना पड़ा ।पचास पैसे की टिकट लेकर गुफा देखने गये ।यहाँ पर शिव पार्वती की मूर्तियां थी ।त्रिमुखी शिव और अर्धनारिश्वर की मूर्ति थी ।शिव पार्वती के विवाह की मूर्ति थी ।यह सब देखकर हम लोग ढाई बजे वी टी स्टेशन पहुँच गये ।बाहर एक मद्रासी होटल मे खाना खा कर स्टेशन पर ही बैठे रहे ।शाम साढ़े सात बजे की जनता एक्सप्रेस से हम लोग जबलपुर के लिये निकल गये ।

यह मेरी शादी के बाद की पहली लम्बी यात्रा थी ।मुम्बई जिसे फिल्मों के लिये जानते थे , जिसे देखना एक सपने की तरह था उसे देख कर महशूस करके भी सपना लग रहा था ।अब अपने सपने के झरने की ओर जा रही थी ।जिसे मैने चित्रों मे ही देखा था ।

ये दिन भी अपने थे - 73



शादी के बाद के पांच माह ऐसे ही बीत गये ।धीरे से मै सुबह का टिफिन और बाद मे हम सब का खाना बनाना शुरु कर दी थी ।शाम को रोज मुर्गा बनता था कभी मटन बनता था ।सुबह के खाने मे मिर्च मसाला बहुत रहता था ।मै ,मेरे पति और मेरी सास हम तीन लोग ही शाकाहारी थे बाकी सब लोग खाते थे ।

रोज सुबह मेरे ससुर एक पुड़िया मे एक दिन के लायक खड़ा धनिया , खड़ी हलदी और खड़ी लाल मिर्च लेकर आत थे ।नमक भी लोकल वाला आधा किलो ही आता था ।घर मे जेठ का एक चपरासी था गरीबा वह मसाला पिसता था । अवकभी कभी जेठानी पिसती थी ।ननंंद कै मैने पिसते नहीं देखा था ।कभी मै पिसती थी ।खाने मे सब्जी तो मै खा नहीं पाती थी ।दाल रोज बनती थी तो दाल चांंवल खा लेती थी ।

रात को जेठ अपने कमरे मे खाते थे ।जेठानी मछली मटन वाली थाली सुबह बाहर निकाल कल रख देती थीं ।सास उस पर पानी डाल देती थी ।सुबह छै बजे मै टिफिन बनाती तो गंदी बास आती थी क्ई बार मै उल्टी भी कर देती थी ।सुबह चार बजे हमारे ससुर सिगड़ी मे भूसा भर कर जलाते थे और उस पर नहाने का पानी गरम करते थे ।स्वयं नहाने के बाद सास के लिये पानी गरम करते थे ।जलने वाली लकड़ी के कोयले को बाजू मे बने कोयले की सिगड़ी मे भरते थे और दाल चढ़ा देते थे । उसमे दो आलू डाल देते थे बच्चों को नमक डाल कर खिलाते थे ।

छै बजे जब मै उठती थी तो दाल पक कर तैयार रहता था ।भूसे की सिगड़ी मे सब्जी और रोटी बनाती थी ।कभी सास सब्जी कभी काट देती थी कभी मै काटती थी ।रोटी भी तवे परही कपड़े से दबा दबा कर फूला कर सेका जाता था ।ऐसा वातावरण मेरे लिये एकदम नया था ।मैने ऐसा कहीं भी नहीं देखा था।

मेरे दोनोंं पैर के तलवे काले हो गये थे । उल्टियां इतनी हो रही थी कि पेटसमे तकलीफ होने लगी।लाल मिर्च की तीखी सब्जी से मुझे एसीडिटी होने लगी ।हमेशा पेट मे दर्द होने लगा ।दो महिने मे हालत खराब हो गई ।

नवम्बर मे हम लोग घूमने जाने का कार्यक्रम बनाये ।मुझे बचपन से भेड़ाघाट का जल प्रपात देखने का शौक था ।हम लोग घूमने निकल पड़े सुबह की रेल थी । मुझे किसी रेल की जानकारी नहीं थी ।हम लोग जनरल बोगी मे बैठे थे ।मैने सोचा कि पैसा कम होगा इस कारण जनरल मे बैठे है ।मै तो खुश थी कि भेड़ाघाट जा रहे है ।

रेल मे बहुत भीड़ थी ।मेरे पास एक सिंधी व्यक्ति बैठा था । मेरे पति जब कुछ खरीदने उतरते थे तो वह मुझे एक सेब खाने को दे रहा था , मैने मना कर दिया । कभी पानी के लिये कभी समोसे केलिये तो कभी खाना लाने के लिये उतरते थे तो वह हमेंशा मुझे कुछ न कुछ खाने के लिये देने की कोशिश करता था ।रेल मे पेट दर्द शुरु हो गया क्योंकि कब तक बैठे रहती ।लेटने की इच्छा हो रही थी ।आस पास के लोगों को पता चल गया कि मेरे पेट मे दर्द है ।

वह व्यक्ति मुझसे पूछने लगा कि " आप ईलाज के लिये जा रहे हो क्या ?" मैने कहा घूमने जा रहे है ।"हाँ अच्छा है घूमने से मन अच्छा लगता है। "मैने पूछा आप कहाँ जा रहे हैं ? उसने कहा कल्याण जा रहा हूँ ।
आप बाम्बे जा रहे है ?
मै कुछ नही बोली ।पति जैसे ही आये तो मै बोली ये पूछ रहा था कि बाम्बे जा रहे है ? मै चुप थी ।मैने कहा वह कल्याण जा रहा है ।उस समय मेरे पति ने बताया कि हम लोग बाम्बे जा रहे है ।वहां से भेड़ाघाट जायेंगे । अब मुझे घबराहट होने लगी क्योंकि वहां पर लोगों को बेवकूफ बनाते है यह सुनी थी ।

इन्होने कहा कि ऐसा नहीं है। मै एक बार और आ चुका हूँ ताज होटल मे चाय भी पी चुका हूँ ।तुमको यहां घूमना अच्छा लगेगा ।बहुत सी जगह है घूमने के लिये ।रात को मै बैठ नहीं पा रही थी तो उस सिंधी युवक ने कहा आप आराम से सो जाओ , हम लोग सामने सामने बैठ जायेंगे ।वैसा ही हुआ ।रात को नींद तो आई नहीं पर उस युवक की आंखों को समझने की कोशिश करती रही साथ ही बाम्बे मे हमारे सामान को फिल्मों की तरह कोई चुरा न ले यह सोचती रही ।सुबह बाम्बे पहुंच गये ।एक परिचित रास्ते की तरह मेरे पति चलते हुये सिटी गेस्ट हाउस मे मुझे लेकर आ गये ।