रविवार, 26 जुलाई 2020

कोरोना एक संकेत

आज कोरोना वायरस की महामारी फैली हुई है। इसके लिये पूरा विश्व काम कर रहा है। करेगा ही सोशल मिडिया है जो एक सेकेंड में किसी भी समाचार को पूरे विश्व में पहुंचा देता है। सबको अपने जिन बचाने के लिये कुछ तो करन पड़ता है। कोरोना वायरस चीन का आयातित है। चीन से तो सालों से सस्ती चीजें आ रही थी। यहां तक की हमारे पूजा के सामान, दीपावली के सजावट के सामान होली के रंग भी वहीं.से आते हैं। सस्ता होने के कारण लोग यही खरीदते हैं। हमारे यहां का सामान रखा रहता है।
हमारे देश से अलग खानपान होने के कारण भी चीन को जाना जाता है। मांसाहारी हैं चीन के लोग, ये लोग पके मांस के साथ कच्चा मांस भी खाते हैं। चमगादड़ का सूप और सांप के खाने से कोरोना फैल गया। बहुत ही तेजी से फैलने लगा। यह दूसरे देश तक पहुंच गया। सभी जगहों में मांस खानि बंद कर दिये।अंडा भी बंद हो गया। यह छूने से भी फैलता है तो लोगों ने हाथ मिलाना बद कर दिया। उस समय भारत सबसे आगे रहा क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने सबको हाथ जोड़ कर नमस्ते करना शुरु कर दिया। विश्व में भारत की धाक तो जम गई पर भारत की संस्कृति को सब जानने और पहचानने लगे।
कोरोना में सूखी खांसी और बुखार रहता है साथ में सांस लेने में तकलीफ भी होती है। इसके रोकथाम के लिये कोई दवाई भी नहीं है और न कोई टीका है। बस सब जगह को किटाणुरहित करना है ,अपना हाथ हर दो घंटे में धोते रहना है। इसके 245850 मामले विश्व में सामने आये हैं जिसमें से 10047 लोगों की मौत हो गई है। भारत में भी चार केस आये हैं। जब भी संक्रमित व्यक्ति मिलता है उसे आयसोलेशन में 15 दिन तक रखा जाता है। दो बार उसकी जांच होती है। नये सामानों के साथ कई अस्पताल के कमरे तैयार किये गये हैं। आज भी इसक लिये दवाई खोज रहे हैं।
आसाढ़ के महिने में बीमारियां ज्मादा फैलती है और भरी गर्मी में भी। मलेरिया ,फ्लू और हैजा ही फैला करता था।मुझ वह दिन आज याद आ रहे हैं जब हैजा फैला करता था और माता फैलती थी तब एक जिले से दूसरे जिले में जाना मना रहता था।
आज से पचास साल पहले तक किसी भी बीमारी की महामारी फैलती थी तो दवाई तो रहती थी, बचाव का टीका भी लगता था। हम लोग कई बार रायपुर और दुर्ग के बीच बहने वाली नदी के पहले टीका लगवाये हैं। उसके बाद एक पर्ची मिलती थी उसे नदी के उस पार दिखाते थे। उसके बाद ही दूसरे शहर में जा सकते थे। सामान भी लाना ले जाना मना रहता था, सामान याने धान चना गेहूं सब्जियां।
तब और अब में बहुत अंतर आ गया है। आज सोशल मिडिया के कारण कोई भी समाचार एक सेकंड में पूरे विश्व में फैल जाती है।
इस कोरोना का समाचार भी फैल गया पर इसका बचाव नहीं है। इसे 15 दिन के लिये अलग रखा जाता है और किटाणुरहित करते रहते हैं। अब मलेरिया की दवाई कारगर साबित हो रही है। हमारे यहां जगन्नाथ भगवान आसाढ़ में बीमार पड़ जाते हैं। इनको पंद्रह दिन अलग रखा जाता है।उनके दर्शन नहीं होते हैं। भोग में काढ़ा चढ़ाते हैं। यही बांटा जाता है। इसका मतलब यही है किभारत में इन सबकी दवाई तो है ही और सावधानी भी है।आज का पंद्रह दिन का आयसोलेशन जगन्नाथ भगवान की तरह ही लग रहा है। शायद यह काढ़ा ही इस बीमारी का इलाज हो। भारत में आज सब मंदिर बंद हो गये हैं भीड़ से बीमारी फैलती है यह बात सबको समझ में आ गई है। झाड़ फूक और गांव बांधने वाले नजर नहीं आ रहे हैं। न तो पजा पाठ तंत्र मंत्र भी हम सबसे दूर है। बल्कि मंदिर बंद हो गये। जागृति बहुत आ गई है। भारत आज सबका अगुवा बनने जा रहा है। सभी के चेहरे पर कोरोना के भय के साथ खुशी भी है।

प्रकृति अपना संतुलन बना लेती है। मनुष्य स्वार्थी हो रहा है। अपने स्वार्थ के लिये बड़े बड़े पेड़ काट रहा है। खेतों पर कांक्रिट के जंगल बन रह हैं। मानव जनसंख्या बढ़ रही है। जीवों की संख्या कम हो रही है। जीवों में कई प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। तरह तरह की बीमारियां हो रही है। बाढ़ आ रही है, सुनामी का प्रकोप भी लोगों ने झेला है। कहीं सूखा कहीं वर्षा , असमय बारीश और ओले गिर रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं इन सारी बातों से यही पता चलता है कि प्रकृति अपना कोप दिखा रही है। भूकम्प से हजार जाने चली जाती हैं। इन सबसे सैकड़ो जान तो जा रही है, पौधों और जीवों की प्रजातियां भी समाप्त हो रही है। यह कोरोना वायरस भी इसी का एक हिस्सा है।आज मानव मांसाहारी से दूर हो रहा है।अब लोगों को समझ रहा है कि पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। अभी तक बरीश होना और कोरोना का फैसला यह भी संकेत दे रहा है कि भी और भी जाने जायेंगी। प्रकृति का कोप बाकी है।

कुछ हसीन पल

कुछ हसीन पल से आप लोग सोच रहे होंगें की कौन सा हसीन पल? जीवन में तो बहुत से हसीन पल है।सही बात है। मैं बचपन के उस हसीन पल की बात कर रही हूं जब सबको गर्मी की छुट्टियों का इंतजार रहता था। छुट्टी में सब गांव जाते थे या फिर अपने मामा के गांव जाते थे। मैं भी अपने मामा के गांव जाती थी। मेरे बराबर उम्र की मेरे मामा की बेटी थी। उससे छोटी भी एक बहन थी, हम लोग बहुत मजे करते थे। बेर खाना ,ईमली का लाटा बना कर खाना। बासी के साथ लाल मिर्च और लहसुन की चटनी खाना। कनकी का पेज पीना और दोपहर कर सोकर उठे तब बोरे खाना।

लड़कियों को बांस की काड़ियों में रंग बिरंगा धागा भर कर पंखा बनाना सिखाते थे तो लड़के गिल्ली डंडा खेलते थे। गांव में गर्मियों में एक काम और करते थे, बेर को मूसर से कूट कर पाऊडर बनाते थे। गुठली अलग हो जाती थी। पाऊडर को नमक मिर्च डाल के थोड़ा और कुटतठिया बनाते थे। गुठली को मैं रखती थी और दोपहर भर बैठ कर गुठली को फोड़कर चिरौंजी निकालती थी। शाम को लोटे में ठंडा पानी लेकर उसमें नमक डाल कर चिरौंजी को डालकर शरबत बनाते थे। पीते समय जब चिरौंजी आती थी तो उसे चबाते थे और नमक वाला पानी पीते थे। " यमी यमी" उसका स्वाद आज भी जीभ में हैं।

अब आती है इमली के लाटा बनाने की बात। हम लोग ईमली को फोड़ कर छिलका अलग करते थे। यह सब खेलते खेलते करते थे। फिर उसके बीज निकलते थे। उसके बाद का काम माँ करे या फिर मामी करे। उसको कूट कर उसमें नमक मिर्च और थोड़ा सा गुड़ डालकर लाटा बनाती थी। बांस की छोटी छोटी लकड़ी में लॉलीपाप की तरह चिपका देते थे। लिखते हुये भी मुंह में पानी आ रहा है। ईमली की चटनी के साथ कभी कभी बोरे भी खाते थे। इस लाटा को चाटते हुये घूमते रहते थे। दोपहर को तालाब चले जाते थे तो आम के पेड़ से आम भी तोड़ कर ले आते थे। पानी में खेलने का मजा ही कुछ और है। यह सब छूटते चला गया पर गांव में रहने वाले अब भी मजे लेते हैं।अब

अब गांव में भी टी वी आ गया है। सबके पास मोबाइल हो गया है। गांव के बियारा में अब राचर नहीं गेट लग गया है। अब ट्रेक्टर से बोवाई और कटाई ,मिंजाई भी हो जाती है। अब धान ओसाने का दृश्य बहुत कम देखने में आता है।दौरी में मिंजाई भी कम जगहों पर होता है। शहरीकरण ने बहुत कुछ बदल दिया है। इसके साथ ही साथ नये अविष्कार के साथ साथ वैश्विकरण ने खान पान ही बदल दिया है।

आज वह बचपन लौट कर नहीं आ सकता। वह खानपान और रहनसहन भी नहीं दिखाई देता है। हमने बचपन में जो जीवन जिया है वह अब जी नहीं सकते। हमने विकास के नाम पर विदेशी जीवन शैली को अपना रहे हैं। आज हम च्विंगम, टॉफी, कुरकुरे, चिप्स, कैडबरीस अपने बच्चों को देते हैं। हाथ में मोबाइल हैं खाने में पिज्जा, मोमोस, चाऊमीन है। आज ईमली बाजार से लाते हैं तो पानी पुरी के लिये। उसका लाटा तो बना नहीं सकते तो बच्चे कहां से देखेंगे।इसका मजा तो बाजार से लिये टॉफी में मिल जाता है। कच्ची ईमली ,चटपटी ईमली के नाम से भी लाटा मिलना है पर हाथ से बना कर खाने का अपना मजा था। ईमली भी घर की ही रहती थी। बेर की मुठिया आज भी वैसी ही है। मैं राजिम गई थी तो वहां एक गुजराती परिवार के यहां गये थे। उसने बहुत से नाश्ते के साथ बेर की चपटी चपटी एक रूपये के सिक्के के आकार की मुठिया लाकर.दी। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि इतना बढ़िया साफ सुधरा बेर की टिक्की मिल रही है तो उसने करीब बीस मेरे लिये रख दी। आज बेर भी बाजार से खरीद कर लाते हैं वह भी मीठा नहीं रहा तो मजा नहीं आता है। फिर गुठली भी कितनी निकलेगी? जितनी भी गुठली निकले मैं उसे फोड़कर उसकी चिरौंजी खाती ही हूं। गांव में बड़े बड़े बेल तोड़कर लाते थे तो उसे भी दोपहर को खाते थे और उसकी खोटली से इक्कीस बार पानी पीते थे। कुछ बड़े हुये तो यह सब अंधविश्वास सा लगने लगा। बाद में पता चला कि बेल खाने के बाद एक गिलास पानी पीना ही चाहिये क्योंकि बेल पेट में जाकर फूलता है तो उसे पानी की जरुरत होती है। हमारे बुजुर्ग इस बात को जानते थे तभी तो जितना बड़ा बेल का टुकड़ा खाथे थे उसकी खोतली में ही इक्कीस बार पानी पीते थे।

गर्मी में खोइला भी बहुत खाते थे। सेम, कद्दू, , भटा, चना भाजी, पटवा भाजी, जिमिकांदा खाते थे। समय ने तो बदल दिया इसकी जगह हरी सब्जियों ने ले लिया। अभी कोरोना की महामारी फैलने के कारण 21 दिन का लॉकडाऊन हुआ था तब सबको ये सूखी सब्जियां याद आ रही थी। सच है पुराने खानपान पौष्टिक तो हैं ही पर बदलते समय दिखाई नहीं देते हैं। कभी बाड़ी में सब्जी न हो तो सूखी सब्जियां काम आती थी।

पानी ठंडा करने का अनोखा तरीखा भी था। हम लोग एक एक लोटा अपने लिये रख लेते थे। खपरे वाला पटाव का मकान होता था। हम लोग लोटे में पानी भरकर उसके मुंह में कपड़ा ढक कर उलटा कर देते थे और उसे छानही की लकड़ी पर बांध देते थे। लोटा उल्टा लटका रहता था। एक घंटे के बाद पानी एकदम हो जाता था। उसे दोपहर को पीते थे और बचे पानी का शरबत बना कर पीते थे। शाम को और पानी टांग देते थे। इस पानी को रात को पीते थे। ये सब बातें आज याद आ रही है। आज बच्चों के खाने का तरीका बदल गया है पर उस स्वाद को जरुर लेत है जो खट्टी इमली के रुप में मिलती है।ठंडे पानी के लिये फ्रीज है।सूखी सब्जियों का स्वाद नही लिया है पर चना जरुर खाते हैं।
आज घूमने के लिये गार्डन है। पहले घूमने गाँव जाते थे तो आम के बगीचे,नहर और तालाब का मजा लेते थे। मामी नानी के हाथ का बना तरह तरह की चीजें खाया करते थे।आज तो किसी के घर रहने ही नहीं जाते हैं।
आज बच्चे मोबाइल और टी वी में बंध कर रह गये हैं।मिकी माऊस, डोलाल्ड डक की पुस्तकें पढ़ते थे उसे आज के बच्चे टी वी पर मोबाइल पर देख रहे हैं। पहले इंसान इंसान से जुड़ा रहता था पर आज घर में चार.लोग हैं तो सबके बीच एक दूरी रहती है।एक कमरे में बैठ कर भी एक दूसरे से कोई सम्बंध नहीं रहता है। अकेले बैठे बैठे उस सुनहरे पल को सिर्फ याद कर सकते है पर उसमें जी नहीं सकते है।

मातृभाषा में शिक्षा

26 को संविधान बना था, जिसमें मातृभाषा में शिक्षा देनी चाहिये यह संविधान है। छत्तीसगढ़ राज्य बना एक नवम्बर सन् 2000 में, उस समय छत्तीसगढ़ी भाषा को माध्यम बनाने के लिये कोई आदेश.नहीं निकला। राजभाषा आयोग बना तो इसका उद्देश्य था छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रचार प्रसार करना परन्तु यह भी पुस्तक प्रकाशन और साल में दो कार्यक्रम तक ही सिमटा रहा। कार्यक्रम में भी विषयों की कमी झलकती रही। छत्तीसगढ़ी भाषा के लिये हर कक्षा में हिंदी के साथ चार छत्तीसगढ़ी के पाठ रख दिया गया। यह पाठ भी ठीक से पढ़ाया नहीं जा रहा है इसका कारण है बहुत से का छत्तीसगढ़ी नहीं समझना।छत्तीसगढ़ में सभी राज्य के लोग आकर बस गये हैं ,कुछ व्यापार करने के लिये आये हैं तो कुछ लोग सिर्फ नौकरी करने आये हैं। जो व्यापार के लोग आये हैं वे तो छत्तीसगढ़ी सीख गये क्योंकि यह उनकी जरुरत है पर जो नौकरी करने आये हैं वे छत्तीसगढ़ी नहीं सीखना चाहते है।
बहुत से आंदोलन करके छत्तीसगढ़ी भाषा के माध्यम की मांग कर रहे है। नंदकिशोर शुक्ला जी संविधान की कापी लेकर मंत्रियों को बता रहे हैं। लोगों को जगा रहे है। इसके साथ महिला क्रांतिसेना आंदोलन में लगी है। ये लोग दिल्ली में भी धरना दिये थे। दिल्ली में भी मंत्रियों से मिलकर अपनी बात रखे। विधानसभी तक बात पह़ुंचाई गई। पिछली सरकार के रहते भाषा को लेकर कोई काम नहीं हुआ।
नई सरकार आई तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति दिखने लगी। तीज त्यौहार की रौनक ऐसी दिखाई देने लगी की इसकी खूशबू दूसरे राज्यों तक पहुंच गई। खान पान तो अब सबकी थाली में दिखने लगी है। पर भाषा ?
गणतंत्र दिवस के दिन मुख्यमंत्री भूपेष बघेल जी ने छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक स्तर का माध्यम बनाने की घोषणा कर दिये। अगले शिक्षा सत्र से अब प्राथमिक स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा में पढ़ाई होगी। माध्यम छत्तीसगढ़ी ही होगी। एक आदेश और निकाला गया 27 जनवरी को। आंगनबाड़ी केन्द्र में अब स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जायेगी। मातृभाषा और बोली में शिक्षा देने से बच्चे का सम्पूर्ण होता है। बच्चों में समझने की शक्ति जल्दी विकसित होती है। वंनाचल क्षेत्र में अनुसूचित क्षेत्र में वहां की ही भाषा बोली से पढ़ाई कराई जयेगी। इसके पहल के लिये "महिला एवं बाल विकास" विभाग के सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी जी ने सभी कलेक्टरों को पत्र लिख कर बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाने के लिये कहा। आंगनबाड़ी के माध्यम से मानसिक ,शारीरिक और सामाजिक विकास की नींव डालने के लिये मातृभाषा में अनौपचारिक शिक्षा दी जायेगी। पठन सामाग्री का स्थानीय भाषा में शिक्षा देने की तैयारी शुरु हो गई है। स्कूली शिक्षा में छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हल्बी, भतरी, सरगुजिहा,कोरवा, पांडव, कुडुक और कमारी में पढ़ाई होगी।
छत्तीसगढ़ राज्य को बने बीस साल हो गये हैं । इन बीस सालों में आज गाँव गाँव तक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल गये हैं। जहां स्कूल नहीं खुले हैं वहां पर बड़े बड़े स्कूल की बसें आती हैं बच्चों को ले जाने के लिये। आज बहुत से घरों में बटलर हिंदी बोली जा रही है। छत्तीसगढ़ी को लोग पीछे छोड़ रहे थे जो छत्तीगढ़ राज्य बनने के बाद अच्छे से ओलने लगे हैं।आज की युवा पीढ़ी आज भी छत्तीसगढ़ी बोलने के कतराती है ऐसे समय में संविधान के अनुच्छेद की बात बता कर या फिर मातृभाषा में शिक्षा के नाम पर छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई शुरु करने की प्रतिक्रिया क्या होगी।लोग शासन का आदेश समझ कर पढ़ने लगेंगे पर सरकारी स्कूलों में बच्चों की कितनी संख्या रहेगी? यह सब विचारणीय तो है। आज साहित्यकारों के छत्तीसगढ़ी साहित्य को पढ़ने वाले नहीं मिलते हैं। इन साहित्य को पढ़ने वाले तो मिलेगे। साथ ही पूरा पाठ्यक्रम भी छत्तीसगढ़ी में तैयार होगा। मानकीकरण का काम भी अधूरा है।एक समय था पचास साठ साल पहले जब घरों में हिंद बोलना सीखाते थे। यह इस लम्बे दौर में घरों का वातावरण पूरी तरह से हिंदीमय हो गया है। गाँव तक हिंदी पहुंच गई थी अब अंग्रेजी पहुंच रही है। अब लौट कर छत्तीसगढी की ओर आना कितना सही होगा। मुझे तो बचपन की याद आ रही है जब हमारे घर में छत्तीसगढ़ी बोलना मना था। हम राष्ट्र भाषा हिंदी की ओर बढ़ रहे थे।गांव जाते थे तब भी हमारे सार सब हिंदी बोलते थे।शादी के बाद मैने छत्तीसगढ़ी बोलना शुरु किया।इतनी अच्छी छत्तीसगढ़ी हो गई की उससे लेखन और संपादन भी करने लगी। बीस साल से हम छत्तीसगढ़ी से भाग रहे थे अब उस छत्तीसगढ़ी को हर जुबान पर लाना है। पढ़ना है, बोलना और लिखन भी है। संविधान की बात को बीस साल पहले लागू कर दिये रहते तो आज तीन पीढ़ी तैयार हो जाती।

बलात्कार

आज के अखबार में एक वेटनरी डाक्टर प्रियंका रेडी के साथ बलात्कार का समाचार पढ़ने के बाद निर्भया की याद आ गई। इतनी ही क्रूरता उसके साथ भी की गई थी। उसे दर्द सहने के लिये छोड़ दिया गया था। पर प्रियंका को और दर्द देने के लिये पहले गाड़ी में बांध कर तीस किलोमीटर घसीटा गया उसके बाद मिट्टी तेल डाल कर जला दिया गया। दोनों ही इतने कष्ट देने के बाद भी जीवित रहीं ये होती है नारी, जो एक बच्चे को नौ माह अपने कोख में रख कर मरने लायक पीड़ा सह कर एक बच्चे को जन्म देती है। एक पुरुष योनि से बाहर आता उसका सम्मान नहीं करता है उसकी धज्जी उड़ाता है। वह कई रुपों में हमारे आमने आती है माँ , बहन ,भाभी, नानी दादी और पत्नी। यह पत्नी ही है जिसे छूने का अधिकार समाज देता है। उसके लिये तो हर नारी पूज्यनीय होती है।
अविकसित समाज से एक विकसित समाज बना। जहां शरीर को ढक कर रखा जाता है। माँ बहन बेटी से प्यार भरा रिश्ता रहता है। आज भी जो कबीले विकास की दौर से बाहर हैं वहां भी ऐसा नहीं होता है। उनके कबीले की मर्यादा है। आधे कपड़े पहने सभी महिलायें घूमती हैं पर ऐसी गंदी नजर नहीं होती है। एक द्रौपति के लिये महाभारत हो गया। एक सीता के लिये लंका जल गई और पूरा परिवार मर गया। आज ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। संविधान के नियम भी शिथिल हैं। किसी को भी फांसी नहीं मिल रही है। एक मोमबत्ती पकड़ कर सैकड़ो लोग शांति से संवेदना प्रगट कर रहे हैं। इससे क्या होगा?
मुझे अपनी पुरानी डायरी याद आई जिसमें मैं रायपुर की 1970 की घटना के बारे में लिखी हूं। उस समय मैं नवमीं में पढ़ रही थी। आचार्य तुलसी का प्रवचन चल रहा था। उन्होने माता सीता पर कुछ गंदी बात कह दी थी। उस समय पूरे रायपुर में दंगा हुआ। लूटपाट और बंद करवाया गया। हम लोग दानी स्कूल में थे और कर्फ्यू लग गया। लड़के करीब बारह बजे स्कूल बंद करवाने आई। प्राचार्य से बहुत सी बहस के बाद छुट्टी दे दी गई। जो लड़कियां रिक्शे से आती थी उनके लिये लड़कों ने रिक्शा तय किया और जो पैदल आये थे वे पैदल ही निकल गये। मेरा घर ईदगाहभाठा में विवेकानंद आश्रम के पीछे था तो मैं डर रही थी। मेरे साथ पंकज तिवारी की बेटी वीणा तिवारी थी। हम लोग सत्ती बाजार जहां उस समय गुंडे दादा लोग रहते थे अक्सर चाकूबाजी होते रहती थी उसे पार करके जाना था। ब्राम्हण पारा चौक पर हमेंशा लड़कों का झुंड रहता था। हम लोग करीब दस बारह.लोग निकले तो श्याम टॉकिज के चौक पर लड़के थे तो हम लोग घबरा गये और श्याम टॉकिज में चले गये। वहां के मैनेजर ने कहा कि आराम से सिनेमा देखो तीन बजे तक सब शांत हो जायेगा तब जाना। पैसा नहीं लेगें। हम लोग अंदर बैठ गये पर घबराहट इतनी थी कि सिनेमा का नाम आज तक याद नहीं आया। वहां से निकले तो फिर बाहर चौक में लड़के खड़े थे। वे लोग पूछे कि अभी तक कहां थे? हम लोग सिनेमा देख रहे थे बोले तो वे लोग नाराज होकर बोले तुम लोगों को घर पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है तो तुम लोग सीधे घर जाना। उसने एक हांका लगाया " लड़कियां जा रही है, ठीक से आगे भेजो" हम लोग सत्तीबाजार आ गये वहां भी लड़के ऐसा ही हांका लगाये। हम लोग कंकालीपारा आ गये वहां से ब्राम्हणपारा चौक आ गये। यहां से मैं अकेली हो गई थी और मेरा घर साइंस कालेज के रास्ते पर था। मैं चुप खड़ी थी तभी एक लड़का आकर कहां जाना है? पूछता है। मैं ईदगाहभाठा बोली तो चलो छोड़ कर आता हूं बोला और हिंदूस्पोर्टिंग मैदान तक छोड़ दिया। वहां से मैं अकेले घर पहुंची। माँ तो दरवाजे पर ही बैठी थी। सब बच्चे घर आ गये थे मैं ही नहीं पहुंची थी। माँ सोच रही थी कि किसी सहेली के घर पर रूक गई होगी। सब कुछ ठीक रहा दूसरे दिन के अखबार में लड़को के बारे में छपा था। स्कूल दो दिन बंद रहा। बाद में जब स्कूल गये तो हमारी प्राचार्य ने भी लड़को की तारीफ की। हम.लोग कालेज से भी पढ़ कर निकल गये। कई बार मांगो को लेकर छात्र नेता दंगा करते रहे पर किसी भी लड़की के साथ छेड़खानी नहीं हुई। यहां तक मैने देखा की इंदिराजी की हत्या के समय भी इतने दंगे हुये पर किसी लड़की या महिला के साद बदसलूकी नहीं हुई।
कल की घटना को लेकर दिल्ली की एक लड़की अनु दुबे संसद के बाहर एक गत्ता लेकर धरने पर बैठ गई। गत्ते पर लिखा था"अब डर डर कर जीना नहीं चाहती" कितनी पीड़ा थी उसके मन में। संवेदना से भरी अनु सायलेंसर से जले अपने हाथ से तुलना कर रही थी प्रियंका के जलने की घटना को। उसकी पीड़ा को आत्मसात कर रही थी। उसे महिला पुलिस थाने ले जाकर बहुत मारी। चप्पन जूते से भी मारी। एक नारी की संवेदना दूसरी नारी के लिये यह थी। बहुत दुख हुआ कि सात साल में निर्भया के दोषी को फांसी नहीं मिली। घटनायें लगातार हो रही है। संसद में भी लोग संवेदना प्रगट कर रहे है, सजा की मांग कर रहे हैं। यह काला दिन किसी डायरी में लिखा जारे ऐसा मुझे नहीं लगता पर दस्तावेजिकरण भी जरुरी है। डायरी ही ऐसी जगह है जहां हम तारीख के अनुसार घटनाओं को लिखते हैं। समाज में बदलाव आये इसके लिये क्या करें ?यह सोचना बहुत जरुर है। शिक्षा की कमी है या संस्कार की कमी है। विकास ने इसे निगल लिया या हम ही इसे भूल गये। आज ऐसा न हो कि सोनोग्राफी के सेंटर पर लिखा हो "पुरुष भ्रूण हत्या अपराध है। " एक माँ यह कहरही है की मेरे बेटे को फासी दे दो, दूसरी माँ कह रही है मेरे बेटे को भी जिंदा ला दो। एक औरत के मन में दहेज क प्रति इतनी घृणा हो जायेकी वह नारी भ्रूण को मार दे तो आज ऐसा समय आ गया है माँ और आप दोनों सोच रहे है कि हमारा बेटा भी कहीं बलात्कारी तो नहीं हो जायेगा? समाज को सतर्क होने की जरूरत है। आज बेटियां अर्थी को कंधा दे रही हैं, अग्नि दे रही है, पिंडदान कर रही हैं तो आज बेटों की क्या जरुरत है? दो माह से लेकर सत्तर साल तक की नारी क्रूरता की शिकार हो रही है। आज समाज परिवर्तन मांग रहा है। इन घटनाओं का भी दस्तावेजिकरण जरुरी है। यह डायरी ही है जिसने सन् 1970 की को भी याद दिला दी। आने वाले समय में इस क्रूरता को भी याद कर समाज अपने आप को सुधारने की कोशिश जरुर करेगा।

बारीश की मुसीबतें

बारीश तो मुसीबतें ही लेकर आती हैं। एक बार कुत्ते के चार बच्चे बारीश में भीग रहे थे। बार बार मुंह ऊपर करके रो रहे थे।
एक भी पेड़ नहीं जिसकी छांव में बैठ सकें।आजकल तो दरवाजे नहीं लोहे के गेट होते हैं।वह पिल्ले हर घर के दरवाजे पर जाकर कूं कूं करते और आसमान की तरफ देखते।मै तभी बाहर निकली। मेरे घर के आंगन में आ गये। दरवाजे के नीचे के छज्जा था वहां बैठ गये।पर ये क्या ? बारीश तेज हो गई और आ़गन में पानी भर गया। मुझे कुत्ते पसंद नहीं है। अब तो वे मुझे देखने लगे और मैं उनको।वे वरामदे में चढ़ने लगे तो मैने आने दिया।
अचानक मेरे मुंह से निकला" है ईश्वर इतना पानी गिरा रहे हो तो इन जानवरों के लिये जगह भी दो। ये तो बोल भी नहीं सकते हैं, कहां जायेंगे।" अचानक जोर से बिजली कड़की " तड़तड़ तड़तड़" चारो पिले आपस में चिपक कर रोने लगे। आज इस कठिन समय में चारो सा थे। इंसान होता तो पहले अपने लिये सोचता पर ये चारो का साथ छूट नहीं रहा था। शाम को पानी बंद हो गया।एक रोटी के चार टुकड़े करके दे दी। तीन घंटे मेरे वरामदे में रहे पर मुझे और रोटी बनाने की याद भी नहीं आई। पानी बंद होते ही वे भाग कर गेट के पास चले गये। मैने गेट खोल दिया। एक पिल्ला जाना नहीं चाह रहा था तो बाकी तीन भी अंदर आ गये।बहुत मुश्किल से ये लोग बाहर गये। एक जगह रूके लोग भी पानी बंद होते ही अपने रास्ते चले जाते हैं । जब तक खड़े रहेंगे तरह तरह की बातें करेंगे। ये कुत्ते तो उन इंसानों से बेहतर है जो साथ नहीं छोड़े। बहुत देर के बाद वे अलग अलग रास्ते गये पर उनके बीच दोस्ती जरुर हो गई।रह.रह कर मुझे देखते रहते हैं। सोचते होंगे की इंसानों के बीच में भी कोई एक ही इंसान होता है।सच है आज इंसान चांद पर जाकर भी अपने बगल वाले के दिल तक नहीं पहुंच पाया है।

मजदूर की मजबूरी

देश में कोरोना माहमारी के फैलाव को रोकने के लिये लॉकडाउन किया गया। जो जहां थे वहीं रह गये। 22 मार्च को 14 घंटे का कर्फ्यु लगा। उसके बाद 24 मार्च से 14 अप्रेल तक 21 दिन का लॉकडाउन लग गया। सब काम बंद हो गये । कारखाना बड़े बड़े मील ,होटल, मॉल, बस, सिनेमाघर यहां त रेल के पहिये भी थम गये। दैनिक वेतन वालों की परेशानी शुरु हो गई। जिनके पास पैसा था वे सामान या राशन भी नहीं खरीद सकते थे। उस समय बहुत सी समाज सेव संस्थायें सामने आकर काम करने लगे।सभी राज्यों में खाना बटने लगा। कोई भी भूखा न रहे।लोग अपने घरों से भी खाना बना कर कुछ लोगों को बांटने लगे। धर्म सम्प्रदाय कहीं भी बीच में नहीं था। मंदिर गुरुद्वारा चर्च सब कुछ बंद हो गया। ऐसे समय में डाक्टर और नर्स भगवान की तरह दिनरात काम करने लगे थे।इनको धन्यवाद देने के लिये सब अपने अपने घरों की बाल्किनी, छत और आँगन में घंटी बजाये। इस 21 अप्रेल के बाद फिर से लॉकडाउन फेस दो शुरु हो गया। अब मजदूरों की परेशानी शुरु हो गई। उनको इस फैलती बीमारी से अपना घर याद आने.लगा। पैसे तो थे पर होटल बंद है दुकान बंद है तो एक एक सामान के लिये तरसते नजर आये।अपने घर अपनी मिट्टी में लौटना चाहते.थे पर.रेल बस सब बंद था।
यह फेस दो 15 अप्रेल से 3 मई तक 19 दिन का था। अब ये लोग पे घर जाने की मांग करने लगे। तभी कोटा में पढ़ाई कर रहे बच्चों को उनके अभिभावकों की मांग पर ए सी बस से लाया गया। यह सब देख पढ़ कर मजदूओं की मांग बढ़ने लगी। सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया बस खाने के पैकेट बांटते रहे।कुछ लोग पुराने कपड़े बांटने.लगे यह बहुत ही शर्मनाक था। मजदूरों को यह बात अच्छी नहीं लगी। उनका कहना था पैसा हमारे पास है, हमें तो बस घर भेजा जाये।
तीसरा फेज 4 मई से 17 मई तक के लिये लग गया। अब मजदूरों पैदल ही अपने गाँव की ओर चलना शुरु कर दिया। 1000 किलोमीटर की यात्रा पर लोग चल पड़े। रास्ते मे कुछ लोगदुर्घटना में मर गये।एक बच्ची प्यास में दम तोड़ दी। किसी ने बच्चे को जन्म दिया। ये लोग रेल बस की मांग करते रहे पर सरकार ने कुछ नहीं किया। ट्रक में ,मेटाडोर में.भर कर ये लोग एक राज्य से दूसरे राज्य जाने लगे। कुछ ने तो ट्रक वाले को तीन हजार दिया और किसी ने तीस हजार दिया। कुछ लोग बहुत सक्षम है कुछ लोग गरीब हैं पर पैसा सबके पास है। कुछ लोग पुराने कपड़े दे रहे है वे लोग इस बात से बहुत दुखी है। वे चाहते हैं हमें कुछ मत दो पर घर पहुंचा दो। घर पहुंचने की पीड़ा है सब में। आज इतना पैसा कमा चुके हैं कि अभी आराम से खा सकते हैं।कुछ को जरूरत है पर सब संतुष्ट हैं।

सरकार ने भेदभाव किया, इन मजदूरों को गरीब भूखे नंगे समझ कर खुला छोड़ दिया पैदल आने के लिये। वहीं कोटा से बच्चों को लाने के लिये ए सी बस भेजी गई। रायपुर से गुजरते हुये जब मैं इन लोगों को देखी तो मन पीड़ा से भर गया। तेलीबांधा चौक से आगे जोरा की तरफ तेजी से जाते हुये रोज देख सकते हैं।सामान के नाम पर एक थैला रखे हैं बस। रेल बंद है सोच कर पटरी पर ही सो गये। माल गाड़ी ने उन्हें रौंद दिया। उनके पास रखी रोटी पटरी पर बिखरी हुई थी। जिस रोटी के लिये अपना गांव छोड़कर दूसरे राज्य गये किसे पता था कि खुशहाल जिंदगी पर एक बार फिर इस रोटी के ही लाले पड़ेंगे। काम नहीं है पैसा है पर रोटी नहीं है। "आज जन्मभूमि आ रहे हैं वह बुला नहीं रही है पर हमें उसका महत्व समझ में आ गया है। अब हम अपनी भूमि की ओर ही जायेंगे।" कभी कभी लगता है कि यह हमारा देश हैं जो राज्यों में बटा है और उनके बीच कोई प्यार और संवेदना नहीं है। रायपुर के टाटीबंध में सभी तरफ के मजदूर आ रहे हैं जहां पर सिक्ख समाज खाना कपड़ा चप्पल दे रही ह।लोग दो तीन से भूखे हैं और प्यार.से खा रहे हैं।दो बजे रात को करीब दो.सौ मजदूर वहां पहुंचे।सभी प्यासे थे।दो लड़के रात को एक टैंकर में पानी भर कर मोटर साइकिल से खिंचते हुये टाटीबंध तक लाये। ट्रेक्टर नहीं मिला था। सब पानी पीकर खुश हो गये।वह पानी सुबह तक चलता रहा। यह छत्तीसगढ़ है जहां पर प्यार संवेदना कूट कूट कर भरी है , साम्प्रदायिकता दूर दूर तक दिखाई नहीं देती है। अभी पांच जून को 179 मजदूर बंगलुरु से लये गये है। पहिली बार इन लोगों ने हवाई जहाज को करीब से देखा और उस पर चढ़े भी। यह पहल अच्छी है पर अभी तक अपने साधनों से 2.60 लाख मजदूर आ चुके हैं।अब इस समय का दस्तावेजीकरण जरुरी है। दस्तावेज के लिये डायरी से अच्छी जगह हो ही नहीं सकती जिसके पन्ने समय के साथ साथ पलटते हैं।
आज हमारे मजदूर जन्मभूमि के महत्व को समझ गये हैं।कोरोना की विदाई के साथ अपनी लालसा की विदाई कर देंगे। जय मातृभूमि।

संघर्ष में खोता जीवन

सुशांत सिंह राजपूत अपने संघर्ष पूर्ण जीवन से हार गया। ऐसा क्यों? उसने जो चाहा सब तो मिलते चला गया। नहीं मिली तो कुछ फिल्में और नहीं मिला तो आगे बढ़ने का रास्ता। यह अंधेरा तो कुछ समय के लिये ही होता है। क्या कभी ऐसा हुआ है की सूरज न निकला हो? मौत का कारण अवसाद और तनाव बताया जा रहा है। पांच छै महिने से ईलाज चल रहा था। हंसता हुआ बच्चा सुबह आराम से जूस पीकर लटक गया, चौतीस साल की उम्र में ऐसा करना बहुत ही विचारणीय घटना है।

सुशांत का जन्म 21 जनवरी 1986 को पटना में हुआ था। स्कूली शिक्षा पटना के सेंट केरेंस स्कूल में हुई थी। उसके बाद दिल्ली चले गये। दिल्ली के कुलाची हंसराज मॉडल स्कूल में स्कूली शिक्षा पूरी किये। मेकेनिकल इंजिनियर बनते बनते तीन साल में पढ़ाई छोड़कर डांस की तरफ चले गये। सुशांत बैक डांसर थे। वे कोरियोग्राफर श्यामक डावर के पास डांस सीखे। उनके छात्र थे। उसे देखकर बालाजी टेलिफिल्म्स वालों ने सुशांत को धारावाहिक " किस देश में है मेरा दिल " में काम करने के लिये ले लिया। उसके बाद जी टी वी में " पवित्र रिश्ता " में काम किया। धीरे धीरे काम बढ़ना शुरु हो गया। इसके बाद रियलिटी शो" जरा नच के दिखा - 2" और" झलक दिखला जा -4". में भी दिखे थे।

इसके बाद सुशांत फिल्म की तरफ कदम बढ़ाये।" काय पो चे " पहली फिल्म थी जिससे फिल्मी दुनिया में कदम रखे।इसमें शुद्ध देशी रोमांस था। उसके बाद केदारनाथ और छिछोरे में काम किये। धोनी फिल्म में सुशांत की अलग ही पहचान बनी। आखरी फिल्म " दिल बेचारा "24 जुलाई को डिजिटल प्लेटफार्म पर रिलिज होगी।

इतने कम उम्र में सुशांत को बहुत कुछ मिल गया था। जिस ऊंचाई पर पहुंचना था वहां पर पहुंच ही रहे थे। रातो रात स्टार तो बहुत कम लोग ही बन पाते हैं। बहुत बढ़िया डांसर था, खिलाड़ी था। मेहनती, टैलेंटेड, दिलेर और खिलाड़ी था। वे कोरियोग्राफर श्यामक डावर के शिष्य थे। सुशांत 2006 में कामन वेल्थ खेल में भी डांस कने का मौका मिल चुका था मशहूर डायरेक्टर अलन अमीन से सुशांत ने मार्शल आर्ट सीखा था।

हर इंसान के जीवन में परिस्थितियां एक सी नहीं रहती हैं। समय बदलता है ,जीवन में उतार चढ़ाव आता है। कुछ लोगों ने सुशांत को काम देने से मना कर दिया। वह मध्यमवर्गीय परिवार का था तो कुछ अभिनेत्रियां साथ में काम नहीं करना चहती थी। धीरे धीरे सुशांत को निराशा ने घेरना शुरु दिया। कुछ लोगों का कहना था की सुशांत छै माह से अवसाद और तनाव से गुजर रहा था। उसका इलाज चल रहा था।

सुशांत के पास बहुत पावर वाला टलिस्कोप था । उसे शनिग्रह से वलय को देखना बहुत अच्छा लगता था। उसे तारों की दुनियां बहुत पसंद थी। सुशांत ने चाँद पर जमीन खरीदी थी, ऐसा करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। खुशियों की दुनिया में विचरण करने वाला व्यक्ति एकाएक जीवन से हार जाये ,समझ से बाहर है। कई कार ,बंगला और पैसा बस कुछ उसके पास था पर जीवन में कुछ ज्यादा पाने की लालसा ने उसे जमीन से दूर कर दिया।

एक किसान जब कर्ज और अकाल की मार को सह नहीं पाता है तो फांसी लगा लेता है। पति पत्नी के बीच के झगड़े में बच्चों को मार कर फांसी में लटक जाते हैं। पुलिस लोगों की सुरक्षा के लिये रहती है पर थोड़े से तनाव में कोई एक अपने को गोली मार लेता है। यदि
हम यह सब मरे वालों की बात न करें तो.बेहतर हैं। बहुत से अपने जीवन से हारे लोग भी जी रहे हैं। कल जो लोग बड़े थे वे आज छोटे हैं। फिल्म क्षेत्र में बहुत ही महत्वाकांक्षी लोग ही आत्महत्या किये हैं वरना बहुत से लोग सामान्य जीवन जी रहे हैं। एक बार अमिताभ बच्चन जी भी कर्ज में डूब गये थे पर उनको एक फिल्म मिलते ही सब तनाव समाप्त हो गया। सुशांत के पास टैलेंट के नाम पर क्या नहीं था? डांस, मार्शल आर्ट, थियेटर फिल्म, फिर तारों की दुनियां। एक पढ़ा लिखा बुद्धीमान लड़का माँ को याद करता रहा और शायद उसी मां से मिलने तारों के पास चला गया। वह भूल गया कि उसके पीछे शोहरत और लोगों का प्यार उसे याद करेगा।

यह घटना आज की युवा पीढ़ी के लिये एक सीख है। जीवन जीने के लिये होता है। जीवन में कठिनाइयां आते रहती है। हमें उससे लड़ना है। अपने लिये नये नये रास्ते खोजना है और आगे बढ़ना है। प्रकृति ने जीने के लिये बनाया है। यह यादें आज डायरी के इस पन्ने पर अंकित हो गई। जो हमेंशा याद दिलायगी कि कैसे एक होनहार कलाकार जो अभी बच्चा ही था ,बिना किसी सहारे के अपनी मेहनत से ऊंचाई को छूने ही वाला था कि लोग उसे गिराने में लग गये। नमन है ऐसे कलाकार को।